
मुंबई: भारत के सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में दक्षिणी राज्यों का योगदान सबसे अधिक बना हुआ है। वित्त वर्ष 2024-25 में इनका योगदान लगभग 31 प्रतिशत रहा, जो उत्तरी क्षेत्र के 30 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है। यह जानकारी रूबिक्स डेटा साइंसेज की ताजा रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ द स्टेट्स; असेसिंग स्टेट लेवल परफॉर्मेंस: ड्राइविंग इंडियाज इकोनॉमिक ट्रांजिशन' में सामने आई है।
इस रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2014-15 से 2024-25 तक के एक दशक का विश्लेषण किया गया है। इसमें जीडीपी में योगदान, प्रति व्यक्ति आय, पूंजीगत व्यय (कैपेक्स), निर्यात, सामाजिक क्षेत्र पर खर्च, कर्ज के प्रवाह और पर्यटन सहित 10 प्रमुख आर्थिक संकेतकों के आधार पर राज्यों के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया गया है।
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की निरंतर प्रगति अब इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्यों के बीच वृद्धि कितनी मजबूत, टिकाऊ और संतुलित रहती है। रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण के चार राज्य तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान देने वाले शीर्ष 10 राज्यों शामिल हैं।
इनका संयुक्त हिस्सा वित्त वर्ष 2014-15 के 25 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 27 प्रतिशत हो गया है। इससे पता चलता है कि दक्षिणी राज्यों की आर्थिक भूमिका मजबूत हो रही है। ये राज्य वृद्धि के मामले में भी आगे रहे और दशक के दौरान औसत वृद्धि दर के आधार पर शीर्ष 10 राज्यों में शामिल रहे।
कर्नाटक ने 7.8 फीसदी की औसत वास्तविक वृद्धि दर (रियल ग्रोथ रेट) के साथ पहला स्थान हासिल किया। इसके बाद तेलंगाना (7.1 फीसदी), आंध्र प्रदेश (6.9 फीसदी) और तमिलनाडु (6.8 फीसदी) रहे। इस व्यापक वृद्धि से मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और टेक्नॉलजी आधारित क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन का पता चलता है।
रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र अब भी भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा योगदान देने वाला राज्य है। हालांकि इसका हिस्सा वित्त वर्ष 2014-15 के 15 फीसदी से कम होकर वित्त वर्ष 2024-25 में 13 फीसदी रह गया है। बड़े राज्यों में गुजरात सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में एक बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2014-15 से वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान इसने 7.9 फीसदी की औसत वास्तविक वृद्धि दर हासिल की है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत के वस्तु निर्यात में गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु का संयुक्त योगदान लगभग 61 फीसदी है। क्षेत्रीय स्तर पर वस्तु निर्यात अब भी पश्चिम और दक्षिण में अत्यधिक केंद्रित है। पश्चिम ने वित्त वर्ष 2017-18 और वित्त वर्ष 2024-25 दोनों में लगभग 48 फीसदी के साथ अपना दबदबा बनाए रखा है। वहीं दक्षिण की निर्यात में हिस्सेदारी इस दौरान लगभग 26 फीसदी से बढ़कर करीब 33 फीसदी हो गई है। इससे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग उत्पाद जैसे क्षेत्रों में इसकी बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट कैपिसिटी की जानकारी मिलती है।
रूबिक्स डेटा साइंसेज के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहन रामास्वामी ने कहा, 'भारत की वृद्धि की कहानी मूल रूप से राज्यों के स्तर की कहानी है। यह दशक आधारित विश्लेषण बताता है कि हम ऐसे मोड़ पर हैं, जहां वृद्धि अपने पारंपरिक केंद्रों से आगे फैल रही है, लेकिन कंसन्ट्रेशन का जोखिम अब भी बना हुआ है। उभरते राज्य निवेश की मौजूदा गति को टिकाऊ औद्योगिक क्षमता में कितने प्रभावी तरीके से बदलते हैं। यही भारत के विकास का अगला चरण निर्धारित करेगा।'
सरकारी खर्चों की बात करें तो क्षेत्रीय स्तर पर भारत का पूंजीगत व्यय मुख्यतः उत्तर में केंद्रित है, जहां बड़े औद्योगिक और बुनियादी ढांचा आधारित राज्य निवेश के समग्र प्रवाह को आगे बढ़ा रहे हैं। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात, इन तीन राज्यों में वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान देश के कुल पूंजीगत व्यय का लगभग 30 फीसदी हिस्सा गया।
हालांकि शीर्ष 10 राज्यों में ही कुल पूंजीगत व्यय का लगभग 67 फीसदी फीसदी हिस्सा जा रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि संतुलित विकास को बढ़ावा देने के लिए पिछड़े क्षेत्रों में सरकारी और निजी निवेश का व्यापक विस्तार जरूरी है। औद्योगिक कर्ज भी पश्चिम और उत्तर में केंद्रित रहा। इसमें इन दोनों क्षेत्रों का हिस्सा 34-34 फीसदी रहा। यानी देश के कुल औद्योगिक कर्ज का दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं दो क्षेत्रों में गया।
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