Subsidized Fertilizer Rationalization: अब जितनी जमीन, उतना ही मिलेगा सब्सिडी वाला खाद, जानें ऐसा क्यों कर रही है सरकार?

Fertilizer Subsidy Pilot Scheme: सब्सिडी वाली खाद की कालाबाजारी रोकने और मिट्टी बचाने के लिए सरकार ला रही है एक पायलट योजना। अब जमीन के हिसाब से ही मिलेगी खाद। क्या इस कदम से थमेगी भारी आयात की मजबूरी?

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड10 Dec 2025, 04:23 PM IST
क्या किसान की जरूरत से ज्यादा खाद ले जाने की आदत रोकेगी सरकार? (AI Generated Graphic)
क्या किसान की जरूरत से ज्यादा खाद ले जाने की आदत रोकेगी सरकार? (AI Generated Graphic)(Google Notebook LM)

Fertilizer Black Market: केंद्र सरकार जल्द ही एक महत्वपूर्ण पायलट परियोजना शुरू करने जा रही है, जिसका उद्देश्य किसानों को मिलने वाले सब्सिडी वाले उर्वरकों की मात्रा को उनकी भूमि जोत से जोड़ना है। इस पहल के पीछे मुख्य कारण बढ़ते हुए सब्सिडी बिल को नियंत्रित करना, साथ ही उन अत्यधिक सब्सिडी वाले मिट्टी के पोषक तत्वों की कालाबाजारी से रोकना है। वर्तमान में, किसानों को प्रति वर्ष लगभग 60 मिलियन टन अत्यधिक सब्सिडी वाले उर्वरक की आपूर्ति की जाती है, जिसका लगभग 18% आयात के माध्यम से पूरा होता है।

सब्सिडी का बढ़ता बोझ: आंकड़ों की कहानी

उर्वरकों पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी का खर्च लगातार बढ़ रहा है। 2024-25 के वित्तीय वर्ष में सरकार का यूरिया सब्सिडी खर्च 1.91 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। यह भारी भरकम खर्च न केवल राजकोष पर दबाव डालता है, बल्कि इस बात का भी संकेत देता है कि उर्वरकों का उपयोग अक्सर उनकी वास्तविक कृषि आवश्यकता से अधिक हो रहा है।

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जितनी जमीन, उतना ही मिलेगा सब्सिडी वाला खाद (AI Generated Graphic)
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क्या है सरकार का मुख्य उद्देश्य?

रसायन और उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा ने राज्यसभा में इस पायलट प्रॉजेक्ट के लक्ष्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि इस परियोजना का उद्देश्य किसानों की भूमि जोत और उनके द्वारा मांगे गए उर्वरक की मात्रा के बीच एक सीधा संबंध स्थापित करना है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि अगर किसी किसान को 10 बोरी उर्वरक की जरूरत है, लेकिन वह 50 बोरी ले रहा है, तो इस विसंगति पर ध्यान देना आवश्यक है। यह नई पहल उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के व्यापक सरकारी प्रयासों का हिस्सा है।

असंतुलित उपयोग का मिट्टी और सब्सिडी पर असर

पोषक तत्वों का असंतुलित उपयोग एक गंभीर समस्या है। यह न केवल मिट्टी के क्षरण (soil degradation) का कारण बन रहा है, बल्कि सरकारी सब्सिडी खर्च में भी बेतहाशा वृद्धि कर रहा है। हालांकि, सरकार के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं। अगस्त में उर्वरक मंत्रालय ने संसद को बताया था कि 2023-24 में 14 राज्यों में उनकी संयुक्त उर्वरक खपत में 1.51 मिलियन टन की कमी आई है, जो पिछले तीन वर्षों के औसत से कम है।

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आयात में रिकॉर्ड उछाल: कब थमेगी निर्भरता?

सब्सिडी की समस्या के साथ-साथ, उर्वरक आयात में एक रिकॉर्ड वृद्धि देखने को मिली है। अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच भारत ने पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 136.6% अधिक यूरिया का आयात किया। यह वृद्धि उर्वरक आयात में कुल 137% की वृद्धि का हिस्सा है। डायमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) का आयात 69.1% बढ़ा, जबकि इसका उत्पादन 7.4% घट गया है। वहीं, नाइट्रेट फॉस्फोरस (एनपी) और नाइट्रेट फॉस्फोरस पोटेशियम (एनपीके) उर्वरकों का उत्पादन 12.6% बढ़ा, फिर भी इनका आयात 80.6% बढ़ा है। सिर्फ म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) का आयात 22.1% घटा है।

बढ़ती मांग का कारण: अच्छी बारिश और वैश्विक संकट

यह आयात वृद्धि मुख्य रूप से खरीफ (मानसून) बुवाई के मौसम के बाद हुई। इस दौरान, चीन ने यूरिया और अन्य मृदा पोषक तत्वों के निर्यात पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी थी, जिससे भारत में उर्वरकों की भारी कमी हो गई थी। इस कमी को दूर करने के लिए भारत ने सितंबर में पिछले साल के इसी महीने की तुलना में छह गुना अधिक यूरिया का आयात किया। उर्वरक उद्योग संघ (FAI) के अध्यक्ष एस. शंकरसुब्रमण्यन के अनुसार, अच्छी बारिश के कारण देश में उर्वरकों की खपत में भी बड़ी वृद्धि हुई है।

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आत्मनिर्भरता की ओर कदम: घरेलू उत्पादन में वृद्धि

अच्छी खबर यह है कि भारत यूरिया के लिए अपनी घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है। वित्त वर्ष 2024 में भारत का घरेलू यूरिया उत्पादन 31.4 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। दो नए यूरिया संयंत्रों के जल्द ही चालू होने की उम्मीद है, जिसके साथ ही भारत मृदा पोषक तत्वों के निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाएगा। हालांकि, जब तक यह आत्मनिर्भरता पूरी तरह हासिल नहीं हो जाती, तब तक पायलट प्रॉजेक्ट जैसे कदम कालाबाजारी और सब्सिडी बिल को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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