
Barrel Meaning: पेट्रोल और डीजल ऐसी चीजें हैं, जिसके दाम लगातार बढ़ते ही रहते हैं। अगर कभी कम होते भी हैं, तो हमारी जेब पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ता। अक्सर लोग कहते हैं कि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की कीमत कम हो रही हैं, तब भी हमारे देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम नहीं होतीं। वैसे भी इन दिनों कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की हर तरफ चर्चा हो रही है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद कर दिया है। इसका नतीजा यह है कि दुनिया तेल संकट के मुहाने पर खड़ी है।
इस मार्ग से दुनिया भर में लगभग 20% कच्चे तेल की सप्लाई होती है। बैरल (Barrel) तेल मापने की एक अंतरराष्ट्रीय यूनिट है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की मात्रा बताने के लिए किया जाता है। 1 बैरल क्रूड ऑयल सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि कई ऐसी जरूरी चीजों का स्रोत होता है, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होती हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 19वीं सदी में अमेरिका में दुनिया का पहला व्यवसायिक तेल का कुआं खोदा गया था। 27 अगस्त 1859 को कर्नल एडविन ड्रेक ने इसकी शुरुआत की थी। जिन कुओं से तेल निकला वहां तेल के स्टोर की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसके बाद लकड़ी के कंटेनरों का तेल भरने और ट्रांसपोर्टेशन के लिए इस्तेमाल किया गया। जिनका इस्तेमाल पहले व्हिस्की, सिरका, मछली आदि रखने में किया जाता था। लकड़ी के कंटेनरों का तो चुनाव हो चुका था, लेकिन फिर भी व्यापारियों को परिवहन और व्यापार करने में परेशानी हुई। क्योंकि इसकी माप तय नहीं थी।
कोई कंटेनर बड़ा हो जाता कोई कंटेनर छोटा हो जाता। जिसके कारण कीमतों को तय करने में काफी परेशानी हो रही थी। साल 1866 में तय किया गया कि एक बैरल यानी लकड़ी के कंटेनर में 42 गैलन कच्चा तेल रखा जाएगा। इसी माप के आधार पर फिर लकड़ी के कंटेनर तैयार किए जाने लगे। साल 1872 में पेट्रोलियम प्रोडक्ट एसोसिएशंस ने बैरल को कच्चे तेल के मापक के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद से आज तक कच्चे तेल को बैरल में ही मापा जाता है।
तेल इंडस्ट्री की शुरुआत के समय अमेरिका में कच्चे तेल को लकड़ी के बैरल में स्टोर और ट्रांसपोर्ट किया जाता था। उसी दौरान 42 गैलन (लगभग 159 लीटर) का बैरल एक मानक माप बन गया। अमेरिका में तय किया गया यह माप धीरे-धीरे पूरी दुनिया में अपनाया गया और आज भी ग्लोबल ऑयल मार्केट में बैरल के हिसाब से ही कीमत तय होती है।
क्रूड ऑयल यानी कच्चा तेल जमीन के नीचे मिलने वाला एक प्राकृतिक और सीमित (Non Renewable) ईंधन है, जो लाखों साल पुराने पौधों और समुद्री जीवों के अवशेषों से बनता है। इसे रिफाइन करके पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, जेट फ्यूल और प्लास्टिक जैसी चीजें बनाई जाती हैं। बता दें कि भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है।
कच्चे तेल का एक भी कतरा बेकार नहीं जाता है। इससे कई चीजें निकलती हैं। एक बैरल का सबसे बड़ा हिस्सा पेट्रोल के रूप में निकलता है। एक बैरल में 70 से 75 लीटर पेट्रोल (Gasoline), 40 से 45 लीटर डीजल (Diesel), 15 से 20 लीटर एविएशन फ्यूल (Jet Fuel), 8 से 10 लीटर केरोसिन, 5 से 7 लीटर LPG / गैस और 5 से 6 लीटर डामर (Bitumen) और तारकोल निकलता है।
इसके अलावा प्लास्टिक, सिंथेटिक कपड़े (पॉलिएस्टर, नायलॉन), रबर (टायर, जूते), पेंट और वार्निश, फर्टिलाइजर (खाद), कॉस्मेटिक्स (क्रीम, मेकअप), मोम (वैक्स) और कैंडल जैसी कई चीजें निकलती हैं। कुल मिलाकर प्रोसेस के बाद अलग-अलग प्रोडक्ट्स बनते हैं, जिनका कुल वॉल्यूम कभी-कभी थोड़ा ज्यादा भी हो सकता है। यह रिफाइनिंग प्रोसेस पर निर्भर करता है।
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