60% तक बढ़ा शुल्क, खतरे में बासमती का कारोबार! क्या सरकार करेगी हस्तक्षेप?

Basmati Rice Export: बासमती चावल किसान एवं निर्यातक विकास मंच ने निर्यात शुल्क पर सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। शुल्क मनमाना और अपारदर्शी होने से व्यापारियों पर वित्तीय बोझ बढ़ा है। छोटे निर्यातक सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

Anuj Shrivastava( विद इनपुट्स फ्रॉम भाषा)
अपडेटेड27 Apr 2026, 03:53 PM IST
बासमती चावल पर संकट
बासमती चावल पर संकट

Basmati Rice Export: बासमती चावल किसान एवं निर्यातक विकास मंच (बीआरएफईडीएफ) ने सरकार से कुछ निर्यात शुल्क पर तत्काल हस्तक्षेप करने का सोमवार को आग्रह किया।बीआरएफईडीएफ ने इन शुल्क को मनमाना और अपारदर्शी करार दिया जिससे कई व्यापारियों के लिए निर्यात व्यावसायिक रूप से अव्यवहार्य हो गया है।

मंच के अनुसार, युद्ध-जोखिम अधिभार 800 डॉलर से 6,000 डॉलर प्रति कंटेनर तक रहा है, जो अक्सर बिना पूर्व सूचना के लगाया जाता है या माल भेजे जाने के बाद संशोधित किया जाता है। कुछ मामलों में कुल शुल्क माल के मूल्य के 60 से 70 प्रतिशत तक होता है। बीआरएफईडीएफ की चेयरपर्सन प्रियंका मित्तल ने एक बयान में कहा कि निर्यातकों से उन परिस्थितियों के लिए असीमित वित्तीय बोझ उठाने को कहा जा रहा है जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है।

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'ट्रांसशिपमेंट' केंद्रों रोक दिए गए कंटेनर

पश्चिम एशिया संकट के कारण शिपिंग कंपनियों ने एकतरफा रूप से माल को जेबेल अली (संयुक्त अरब अमीरात), सोहर तथा सलालाह (ओमान) जैसे बंदरगाहों की ओर मोड़ दिया है। कंटेनर को 'ट्रांसशिपमेंट' केंद्रों पर आगे की आवाजाही की स्पष्टता के बिना रोक दिया है और कुछ मामलों में उन्हें मूल बंदरगाहों पर वापस भेज दिया है।

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सरकार से हस्तक्षेप की मांग

निर्यातकों का कहना है कि इन फैसलों की पूरी वित्तीय लागत उन्हें ही उठानी पड़ रही है जबकि इन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। बीआरएफईडीएफ ने मांग की कि मंत्रालय शुल्क को केवल दी गई सेवाओं से जोड़े, शिपिंग कंपनियों को विवादित शुल्क से जोड़कर कंटेनर रोकने के बजाय उन्हें जारी करने के लिए बाध्य करे और भू-राजनीतिक व्यवधानों के दौरान माल ढुलाई के लिए स्पष्ट नियामकीय दिशानिर्देश बनाए।

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मंच ने स्वीकार किया कि भारत के महानिदेशालय शिपिंग ने निर्यातकों की शिकायतों को औपचारिक रूप से दर्ज किया है और उन्हें अंतर-मंत्रालयी समूह को भेजने के लिए 'ट्रैकिंग नंबर' दिए हैं लेकिन जमीनी स्थिति अब भी बेहद चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। मंच के अनुसार, छोटे निर्यातक सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। बड़े वैश्विक शिपिंग संचालकों और व्यक्तिगत व्यापारियों के बीच सौदेबाजी की शक्ति में बड़ा असंतुलन है, जिससे कई निर्यातकों के पास विकल्प सीमित रह गए हैं। कुछ का कहना है कि बढ़ते शुल्क के कारण उन्हें माल छोड़ने तक पर विचार करना पड़ रहा है।मित्तल ने कहा कि यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ऐसी प्रथाएं एक मिसाल बन सकती हैं जो भारत के समुद्री व्यापार ढांचे में विश्वास को कमजोर कर सकती हैं।

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