
जापान में एक शब्द है- 'मोत्तैनाई' (Mottainai)। इसका अर्थ है- किसी मूल्यवान वस्तु को व्यर्थ फेंक देने पर महसूस होने वाला गहरा खेद। वर्ष 2000 में जापान ने इसी भावना को विधिक आधार दिया- एक सुदृढ़ सामग्री-चक्र समाज की स्थापना के लिए मूल अधिनियम (Basic Act for Establishing a Sound Material-Cycle Society) के रूप में। और 2003 में इस पर आधारित पहला राष्ट्रीय 'मौलिक योजना' लागू हुई जिसे तब से हर कुछ वर्ष में परिष्कृत किया जाता रहा है। इस नीति का मूल विचार सरल था- हर उत्पाद को उसके पूरे जीवनकाल तक उपयोग में लाना, पुनर्स्थापित करना और पुनर्चक्रित करना एक सामूहिक प्रतिबद्धता है।
भारत में भी यही चेतना किसी न किसी रूप में रही है- खेतों में कृषि अवशेषों से खाद और ईंधन बनाने की परंपरा में, घरेलू वस्तुओं को बार-बार उपयोग में लाने की आदत है। अंतर बस यह रहा कि जापान ने इस सोच को एक सुसंगत नीतिगत और आर्थिक ढांचे में ढाला। भारत अब शायद और अधिक दृढ़ता और व्यापक पैमाने के साथ वही कर रहा है।
बजट 2026-27 के सर्कुलर इकोनॉमी प्रावधानों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है। यह कोई नई योजनाओं की सूची नहीं है। यह उस सोच का आधिकारिक स्वीकारोक्ति है कि भारत का 'कचरा' वास्तव में एक अप्रयुक्त राष्ट्रीय संसाधन है। जो देश इस संसाधन को पहले पहचानेगा, पहले उसका मूल्य निकालेगा, वह न केवल पर्यावरण की दृष्टि से आगे होगा, बल्कि आर्थिक प्रतिस्पर्धा में भी।
यूरोपीय देशों में जब सर्कुलर इकोनॉमी की नींव रखी गई, तो उसका सबसे प्रभावी पहलू यह था कि अपशिष्ट प्रबंधन को विकेंद्रीकृत रखा गया। बड़े केंद्रीय संयंत्रों पर निर्भरता की जगह पंचायत और नगर स्तर पर छोटी-छोटी संग्रह एवं प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की गईं। भारत का बजट 2026-27 का ढांचा इसी सोच के अनुरूप है।
जब स्वच्छ भारत मिशन(ग्रामीण) के तहत ग्राम पंचायत स्तर पर अपशिष्ट प्रबंधन ठेके दिए जाते हैं, और गोबर्धन योजना के माध्यम से गांव-गांव में बायोगैस संयंत्र खड़े होते हैं, तो यह उसी विकेंद्रीकृत दर्शन को भारतीय संदर्भ में साकार करना है। भारत की लोकतांत्रिक पंचायती राज व्यवस्था इसके लिए एक स्वाभाविक और सुदृढ़ आधार प्रदान करती है।
दक्षिण कोरिया ने 1990 के दशक में जितना 'फेंको, उतना चुकाओ (Pay-as-you-throw)' नीति अपनाई। इसमें हर नागरिक अपने कचरे की मात्रा के अनुसार शुल्क देता है। इसका मूल विचार यह था कि जब तक कचरे का आर्थिक बोझ केवल उद्यमी या सरकार पर है, व्यवहार परिवर्तन सीमित रहता है। कचरे का वास्तविक मूल्य तब उभरता है जब उसे उत्पन्न करने वाला भी उसकी कीमत समझे।
भारत में विस्तारित निर्माता दायित्व (EPR) ढांचे का विस्तार इसी दिशा में एक सुविचारित कदम है, जहां निर्माता कंपनियां अपने उत्पाद के जीवनचक्र के अंत की जिम्मेदारी उठाती हैं और पंजीकृत संग्रह केंद्रों को भुगतान करती हैं। एक ग्रामीण ई-कचरा उद्यमी के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि बाजार ढूंढने की जरूरत नहीं, बाजार कानूनन उसके पास आता है।
यह ईपीआर ढांचा वास्तव में सर्कुलर बिजनेस मॉडल का वह 'छुपा हुआ इंजन' है जिसे अधिकांश लोग नजरअंदाज कर देते हैं। एक ग्रामीण ई-कचरा संग्रह केंद्र जो सैमसंग या शाओमी के ईपीआर कॉन्ट्रैक्ट के तहत काम करता है, उसके पास बाजार ढूंढने की जरूरत नहीं, बाजार कानूनन उसके पास आता है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे जब सरकारी तेल कंपनियां E20 एथेनॉल खरीदने के लिए बाध्य हैं, तो छोटे एथेनॉल उत्पादक के लिए ग्राहक खोजने की नहीं, बल्कि उत्पादन की क्षमता बढ़ाने की चुनौती है। नीति आधारित बाजार की यह गारंटी उद्यमशीलता के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से कम करती है, और यही वह कारण है जिसकी वजह से ये अवसर विशेष रूप से पहली पीढ़ी के ग्रामीण उद्यमियों के लिए उपयुक्त हैं।
नीदरलैंड्स का उदाहरण एक और महत्वपूर्ण सबक देता है। वह देश आज यूरोप की सर्वोच्च 'सर्कुलर मटेरियल यूज रेट' वाले देशों में है। उसके कुल उत्पादन में द्वितीयक (रीसाइकल्ड) कच्चे माल का हिस्सा असाधारण रूप से ऊंचा है। इसके पीछे का रहस्य तकनीक नहीं, नीतिगत निरंतरता है- वर्षों तक हरित निवेश को वित्तीय प्रोत्साहन और पर्यावरण अनुकूल उद्यमों को कम ब्याज दर पर ऋण देना।
भारत में MSE GIFT, CGTMSE की विस्तारित सीमा और सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड इसी दिशा में हैं। अंतर बस यह है कि यहां नीति नई है, इसलिए अवसर भी ताजा हैं। लेकिन जो बात भारत को इन सब देशों से अलग और अनुकूल स्थिति में रखती है, वह है संसाधनों की निकटता। ग्रामीण उद्यमी के पास कच्चा माल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है, परिवहन लागत न्यूनतम है, श्रम की उपलब्धता है और अब सरकारी वित्तीय सहायता भी। यह संयोग दुर्लभ है और इसे पहचानना जरूरी है।
इस संदर्भ में जैविक खाद और बायोमास ब्रिकेट जैसे व्यवसाय केवल 'छोटे उद्योग' नहीं हैं, वे वास्तव में भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के दो बड़े संकटों का एक साथ समाधान हैं- पराली जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण, और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता। जब एक उद्यमी किसानों से पराली खरीदकर ब्रिकेट बनाता है, तो वह किसान को अतिरिक्त आय देता है, प्रदूषण रोकता है, कोयले का विकल्प देता है, और इन सबके बदले में एक व्यवहार्य व्यापार भी खड़ा करता है। इसे 'मल्टी-वैल्यू चेन' कहते हैं, और यह सर्कुलर इकोनॉमी की सबसे परिपक्व अभिव्यक्ति है।
सस्टेनेबल पैकेजिंग के क्षेत्र में भी भारत एक अनूठी स्थिति में है। यूरोप और अमेरिका के बड़े FMCG ब्रैंड्स पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग के लिए भारी प्रीमियम देने को तैयार हैं और भारत के पास वह कच्चा माल है जो उन्हें चाहिए- पराली, गन्ने की खोई, केले का तना। यह एक निर्यात अवसर है जिसे अभी तक उस पैमाने पर नहीं पहचाना गया जिसका वह हकदार है। जो ग्रामीण उद्यमी आज इस क्षेत्र में प्रमाणन और गुणवत्ता नियंत्रण पर ध्यान देकर कदम रखेंगे, वे न केवल घरेलू बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक स्थायी स्थान बना सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन शायद वित्तीय ढांचे में है। CGTMSE के तहत बिना संपत्ति गिरवी रखे ऋण की उपलब्धता- यह केवल एक बैंकिंग सुधार नहीं, यह सामाजिक न्याय का एक कदम है। पहली पीढ़ी का वह उद्यमी जो अपनी कल्पना के बल पर कुछ बनाना चाहता है, लेकिन जिसके पास बैंक को दिखाने के लिए जमीन का पट्टा नहीं है, अब उसके सामने भी रास्ता खुला है। यही वह बिंदु है जहां नीति केवल आर्थिक नहीं, परिवर्तनकारी बनती है।
UNCTAD ने अपनी 2024 की रिपोर्ट चक्रीय लहर पर सवाल उद्यमी (Entrepreneurs Riding the Wave of Circularity) में यह रेखांकित किया है कि सर्कुलर इकोनॉमी 2030 तक वैश्विक स्तर पर 70 लाख से अधिक नए रोजगार सृजित कर सकती है और 4.5 लाख करोड़ डॉलर तक की आर्थिक वृद्धि की संभावना रखती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस परिवर्तन का सबसे असरदार वाहक बड़े कॉर्पोरेशन नहीं, बल्कि छोटे और मध्यम उद्योग (एसएमई) और स्टार्टअप हैं, जो स्थानीय चुनौतियों को रचनात्मक व्यावसायिक समाधानों में बदलते हैं।
ध्यान रहे कि इस रिपोर्ट में भारत के 'कबाड़ीवाला कनेक्ट' को एक प्रेरक उदाहरण के रूप में उद्धृत किया गया है, जो डिजिटल तकनीक के माध्यम से अनौपचारिक कचरा संग्रहकर्ताओं को औपचारिक पुनर्चक्रण प्रणाली (रीसाइक्लिंग सिस्टम) से जोड़ता है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की जमीनी उद्यमशीलता पहले से ही वैश्विक सर्कुलर इकोनॉमी की चर्चा में अपनी जगह बना चुकी है।
तो फिर प्रश्न यह नहीं कि क्या ये अवसर वास्तविक हैं, प्रश्न यह है कि हम इन्हें कितनी तेजी से जन-जन तक पहुंचाते हैं। उद्यम पंजीकरण की सरलता, ईपीआर प्रमाणन की सुलभता, जिला उद्योग केंद्रों की सक्रियता, और स्वयंसहायता समूहों की नेटवर्किंग क्षमता, ये सब मिलकर उस अंतिम मील की दूरी तय कर सकते हैं जो नीति और उद्यमी के बीच अभी भी बाकी है।
विकसित भारत 2047 की जो कल्पना है, उसे साकार करने वाले नायक किसी बड़े शहर के बड़े कॉर्पोरेट हॉल में नहीं बैठे, वे किसी गांव में बायोगैस का सपना देख रहे हैं, किसी कस्बे में पुराने मोबाइल जोड़कर नया व्यापार खड़ा कर रहे हैं, किसी खेत की मेड़ पर पराली देखकर उसमें ब्रिकेट नहीं, संभावनाएं देख रहे हैं। बजट 2026-27 ने उन्हें नीति दी है, फंडिंग का रास्ता दिया है, और एक भरोसेमंद बाजार दिया है। अब उस सपने को जमीन पर उतारने की, और उन्हें उतारने में मदद करने की, बारी हम सबकी है।
लेखक भालचंद्र मुरारका चॉइस कंसल्टेंसी सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ हैं जिन्हें इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में एक दशक से ज्यादा का अनुभव है। ऊपर लिखे विचार उन्हीं के हैं।
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