
Companies Act changes India: सरकार कंपनी कानून (Companies Act) में बड़े बदलाव करने जा रही है। दो लोगों ने बताया कि इस कानून को बिजनेस और डिजिटल फ्रेंडली बनाने के लिए संसद के शीत सत्र में बिल लाने की तैयारी है। इन बदलावों का मकसद भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाना है। साथ ही, वर्ल्ड बैंक के 'बिजनेस-रेडी' इंडेक्स में भारत की रैंकिंग सुधारना भी एक बड़ा लक्ष्य है।
इस मामले से वाकिफ एक व्यक्ति ने बताया कि कई अहम बदलावों पर विचार हो रहा है। इनमें कुछ खास तरह के विलय की प्रक्रिया को तेज करना शामिल है। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक तरीके से डॉक्यूमेंट्स भेजना, अपराधों का ई-जजमेंट (e-adjudication) और ट्रिब्यूनल के दखल के बिना रजिस्टर से हटाई गई कंपनियों को दोबारा चालू (administrative restoration) करना आसान बनाया जाएगा।
एक प्रस्ताव स्टार्टअप्स, अनलिस्टेड कंपनियों और पेरेंट-सब्सिडियरी कंपनियों के बीच मर्जर को तेजी से मंजूरी देने से जुड़ा है। इसके लिए शेयरहोल्डर वोटिंग के नियमों में बदलाव किया जाएगा। अभी कंपनी एक्ट के सेक्शन 233 के तहत ऐसे मर्जर के लिए 90% शेयरहोल्डर्स की मंजूरी जरूरी होती है। इस नियम को आसान बनाने का विचार है।
एक और प्रस्ताव फिजिकल डॉक्यूमेंट्स की जरूरत को कम करने से जुड़ा है। मौजूदा कानून के मुताबिक, कंपनियों को सरकार या शेयरहोल्डर्स को फिजिकल या इलेक्ट्रॉनिक, दोनों मोड में डॉक्यूमेंट्स भेजने की इजाजत है। लेकिन अगर कोई शेयरहोल्डर फिजिकल कॉपी मांगता है, तो कंपनी को फीस लेकर इसका इंतजाम करना पड़ता है। संशोधन के बाद कुछ खास क्लास की कंपनियों के लिए सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक फॉर्मेट में डॉक्यूमेंट्स भेजना ही काफी होगा।
दूसरे व्यक्ति ने बताया कि इन संशोधनों से नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) की शक्तियों को भी मजबूत किया जा सकता है। NFRA को 'प्रोफेशनल या अन्य कदाचार' के अलावा दूसरे मामलों में भी ऑडिटर्स के खिलाफ एक्शन लेने का अधिकार मिल सकता है। तब एनुअल रिटर्न दाखिल नहीं करने जैसी गड़बड़ियों पर एनएफआएर ऐक्शन ले पाएगा।
हालांकि, पार्टनरशिप फर्मों को एक ही छत के नीचे लीगल, सेक्रेटेरियल, अकाउंटिंग, ऑडिटिंग जैसे कई सर्विसेस देने की इजाजत देने वाले प्रस्तावों पर सरकार ने अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है। इस पर पब्लिक से मिले फीडबैक की जांच की जा रही है। एक व्यक्ति ने कहा, 'एक एक्सपर्ट कमेटी इस फीडबैक को देखेगी और इस पर फैसला लेगी।' मिंट ने कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री को ईमेल से प्रश्न पूछे थे, जिसका जवाब नहीं आया।
वित्त और कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल अपने बजट भाषण में कहा था कि सिद्धांतों और भरोसे पर आधारित एक लाइट-टच रेगुलेटरी फ्रेमवर्क प्रोडक्टिविटी और रोजगार को बढ़ावा देगा। सरकार का मकसद एक आधुनिक, लचीला और पीपल-फ्रेंडली रेगुलेटरी सिस्टम बनाना है।
कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) के डायरेक्टर-जनरल चंद्रजीत बनर्जी ने कहा कि रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को डिजिटल युग के हिसाब से अपग्रेड करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, 'जनरल मीटिंग के लिए कम से कम 21 दिन पहले नोटिस देने का नियम अब बेमानी है, क्योंकि आज के डिजिटल युग में जानकारी निवेशकों तक तेजी से पहुंच जाती है। इसे घटाकर 7 दिन किया जा सकता है।' बनर्जी ने यह भी कहा कि एनुअल रिपोर्ट और फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स की फिजिकल कॉपी की प्रिंटिंग और डिस्पैच को ऑप्शनल बनाया जाना चाहिए।
बनर्जी ने डेटा प्राइवेसी से जुड़ी चिंताओं को भी उठाया। उन्होंने कहा कि एक्ट में ऐसे खुलासों की जरूरत है जो इंडिविजुअल डेटा प्राइवेसी से समझौता करते हैं। शेयरहोल्डर्स के मांगने पर कर्मचारियों की सैलरी जैसी सेंसिटिव जानकारी पब्लिक डोमेन में आसानी से उपलब्ध हो जाती है। बनर्जी ने कहा, 'इससे कर्मचारियों को दूसरी कंपनी से नौकरी का ऑफर और डेटा के गलत इस्तेमाल का खतरा बढ़ता है। इससे टैलेंट को मैनेज करना और बनाए रखना मुश्किल होता है।' उन्होंने सुझाव दिया कि कर्मचारियों की प्राइवेसी की रक्षा के लिए उनकी सैलरी बताने की जरूरत को या तो खत्म कर दिया जाए या इसमें बड़ी ढील दी जाए।
CII के बनर्जी ने एक और अहम मुद्दे पर ध्यान दिलाया। मौजूदा नियम के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति पर कुछ खास अपराधों के लिए 1,000 रुपये या उससे ज्यादा का जुर्माना लगा है, तो उसे कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर, होल-टाइम डायरेक्टर या मैनेजर नियुक्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, 'शेड्यूल V में दी गई 1,000 रुपये की इस लिमिट को मौजूदा हालात को देखते हुए काफी बढ़ाया जाना चाहिए, क्योंकि आजकल ज्यादातर कानूनों में जुर्माना इस लिमिट से कहीं ज्यादा है।'
एक्सपर्ट्स का मानना है कि कंपनी कानून में सुधारों से इन्वेस्टमेंट सेंटिमेंट को बढ़ावा मिलना चाहिए। टैक्स और कंसल्टिंग फर्म AKM ग्लोबल के पार्टनर (टैक्स), अमित माहेश्वरी ने कहा, 'सुधारों का मकसद कंप्लायंस को आसान बनाकर, अप्रूवल में तेजी लाकर, गवर्नेंस के नियमों को सरल बनाकर और छोटे अपराधों को अपराध की कैटेगरी से बाहर करके भारत की आंट्रप्रेन्योरियल एनर्जी को अनलॉक करना होना चाहिए।'
माहेश्वरी ने कहा, 'निवेशकों की सुरक्षा मजबूत करने और कॉरपोरेट गवर्नेंस स्टैंडर्ड्स को बढ़ाने से बिजनेस इकोसिस्टम में भरोसा और पारदर्शिता बढ़ेगी।' उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी का लाभ उठाकर और स्टार्टअप्स एवं MSME के लिए अलग-अलग कंप्लायंस फ्रेमवर्क लाकर कॉरपोरेट सिस्टम को ज्यादा फ्लेक्सिबल और इनक्लूसिव बनाया जा सकता है। इससे सभी सेक्टर्स में इनोवेशन और इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा मिलेगा।
अमित माहेश्वरी ने कहा कि एक डिजिटल रूप से सक्षम और ग्रोथ पर फोकस करने वाला कंपनी एक्ट जो टैक्स, इनसॉल्वेंसी और सिक्योरिटीज कानूनों के साथ तालमेल रखता हो, रेगुलेटरी अनिश्चितता को कम करेगा और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को बनाए रखने, निवेशकों का भरोसा गहरा करने और एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इस तरह के सुधार बहुत जरूरी हैं।
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