
Defence budget history from 1947 to 2025: आजाद भारत का सैन्य बजट पिछले 75 सालों में बड़े बदलावों का गवाह रहा है। बंटवारे की चुनौतियों से शुरू हुआ यह सफर आज 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प तक पहुंच गया है। कभी हम अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर थे, लेकिन आज भारत दुनिया के 100 से ज्यादा देशों को हथियार बेच रहा है। आइए जानते हैं कि कैसे 1962, 1971 और कारगिल जैसे युद्धों ने हमारे बजट की दिशा बदली और कैसे आज भारत डिफेंस सेक्टर में एक ग्लोबल पावर बनने की ओर अग्रसर है।
भारत का पहला डिफेंस बजट साल 1948-49 में पेश हुआ था। उस समय बंटवारे और पहले कश्मीर युद्ध की चुनौतियों के बीच सेना के लिए 92.74 करोड़ रुपये रखे गए थे। देश 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ था। तब 15 अगस्त, 1947 से 31 मार्च, 1948 यानी कुल साढ़े सात महीने के लिए ही रक्षा बजट तय किया गया था। अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य बलों के बंटवारे का काम पूरा चुका था, लेकिन सांप्रदायिक दंगों और पाकिस्तान की कश्मीर पर बुरी नजर ने रक्षा बजट में कटौती के उम्मीद पर पानी फेर दिया था।
एक तरफ कश्मीर में सैन्य ऑपरेशन जारी था, दूसरी तरफ सितंबर 1948 में हैदराबाद का भारत में विलय करवाने के लिए भी तत्कालीन निजाम के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना पड़ा था। इन्हीं सब वजहों से अगले वर्ष 1948-49 का रक्षा बजट 121.08 करोड़ रुपये हो गया। हालांकि, उसके अगले साल यानी 1949-50 में हालात थोड़े संभलने पर इसे घटाकर 34.35 करोड़ रुपये कर दिया गया। 1950 के दशक में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार का फोकस आर्थिक विकास पर था, इसलिए डिफेंस पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 1.8% ही रहा।
चीन के साथ 1962 के युद्ध ने भारत की आंखें खोल दीं। इस हार के बाद डिफेंस बजट में भारी उछाल आया। वित्त वर्ष 1961-62 का रक्षा बजट 266.72 करोड़ रुपये था। यह अगले वर्ष 162-63 में 301.93 करोड़ रुपये हुआ। लेकिन 1963-64 में भारत का रक्षा बजट दोगुने से भी ज्यादा 867 करोड़ रुपये हो गया। इस तरह, साल 1962 में जो रक्षा खर्च जीडीपी का 2.1% था, वह 1964 तक बढ़कर 4.5% पर पहुंच गया।
इसके बाद 1965 और 1971 के युद्धों ने सरकार को रक्षा बजट 3% से ऊपर बनाए रखने पर मजबूर कर दिया। 1975-80 के बीच परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत के साथ यह आवंटन तेजी से बढ़ा। वित्त वर्ष 1979-80 में रक्षा क्षेत्र के लिए 2,755 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित किया गया जो संशोधित होकर 3,010 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। फिर अगले वर्ष 1980-81 के लिए 3,037 करोड़ रुपये का रक्षा बजट पेश हुआ।
1991 के आर्थिक संकट के दौरान सैन्य खर्च में थोड़ी गिरावट देखी गई और यह जीडीपी का 2.5% रह गया। लेकिन 1998 में पोखरण-II परमाणु परीक्षण के बाद बजट में 14% की बढ़ोतरी की गई और यह 57,000 करोड़ रुपये हो गया। इसके ठीक बाद 1999 में कारगिल युद्ध हुआ, जिसमें भारत का हर दिन करीब 650 करोड़ रुपये खर्च हो रहा था।
इस युद्ध ने भारत को अपनी खुफिया और सुरक्षा एजेंसी को आधुनिक बनाने का सबक दिया। 1998-99 में 30,840 करोड़ रुपये का प्रस्ताव था, लेकिन रिवाइज्ड बजट 41,200 तक पहुंच गया। अगले वर्ष 199-2000 में 45,694 करोड़ रुपये का रक्षा आवंटन प्रस्तावित था जो वित्त वर्ष 2000-2001 के लिए बढ़कर 70,947.79 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
साल 2008 में हुए 26/11 मुंबई आतंकी हमलों ने भारत की आंतरिक सुरक्षा की कमियां उजागर कीं। इसके बाद 2009-10 के अंतरिम बजट में रक्षा खर्च में करीब 35% की बड़ी बढ़ोतरी की गई। वित्त वर्ष 2008-09 के लिए रक्षा बजट के लिए 1,05,600 करोड़ आवंटित किया गया था जो अगले वर्ष 2009-2010 में बढ़ाकर सीधे 1,41,703 करोड़ रुपये कर दिया गया, ताकि आतंकवाद से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।
साल 2014 में 'मेक इन इंडिया' की शुरुआत ने रक्षा क्षेत्र की तस्वीर बदल दी। डिफेंस सेक्टर में एफडीआई की सीमा 26% से बढ़ाकर 49% कर दी गई। इसका नतीजा यह हुआ कि 2014-15 में जो डिफेंस प्रोडक्शन 46,429 करोड़ रुपये था, वह 2023-24 में रिकॉर्ड 1.27 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। आज भारत धनुष गन, तेजस लड़ाकू विमान और आईएनएस विक्रांत जैसे स्वदेशी रक्षा उत्पादन कर रहा है।
भारत अब केवल हथियार खरीदता नहीं, बल्कि बेचता भी है। 2013-14 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट मात्र 686 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 23,622 करोड़ रुपये हो गया है। सरकार ने 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये के निर्यात और 3 लाख करोड़ रुपये के उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
इतनी प्रगति के बावजूद भारत अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है। पिछले साल 2025-26 के लिए डिफेंस बजट 6,81,210.27 करोड़ रुपये रखा गया, जो जीडीपी का 1.9% है। एक्सपर्ट्स और संसदीय समितियों का मानना है कि आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए इसे जीडीपी के 3% तक ले जाने की जरूरत है।
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