
Indian Currency: अमेरिकी डॉलर के सामने रुपया दिनों दिन रसातल की ओर जा रहा है। हर नए दिन नए रिकॉर्ड टूट रहे हैं। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 90 के नीचे फिसलकर 90.14 के रिकॉर्ड लो-लेवल पर पहुंच गया। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी संभावित मुश्किलों की जोरदार घंटी है। लगातार डॉलर खरीद रहे इंपोर्टर्स, भारत–अमेरिका ट्रेड डील में देरी और वैश्विक बिकवाली ने रुपये को धड़ाम कर दिया है।
रुपया बुधवार को शुरुआती कारोबार में रुपया US डॉलर के मुकाबले 20 पैसे गिरकर 90.07 पर आ गया। विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने बताया कि अमेरिकी डॉलर मांग की मजबूत मांग से निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई और वे सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। अंतरबैंक विदेशी करेंसी मार्केट में रुपया, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.15 पर खुला जो पिछले बंद भाव से 10 पैसे की गिरावट दर्शाता है। रुपया 2025 की शुरुआत से 5 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है। इस साल एक्सचेंज रेट में काफी गिरावट आई है, लेकिन ताजा झटका अक्टूबर महीने में निर्यात में 12 फीसदी की गिरावट से लगा है। यह गिरावट मुख्य रूप से अमेरिका को होने वाले निर्यात में कमी के कारण है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये में हालिया भारी गिरावट की एक वजह अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील में प्रगति का न होना है। इसके अलावा, घरेलू बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी रुपये को कमजोर कर दिया है। जानकारों का कहना है कि भारत के लिए यूएस फेड रिजर्व का निर्णय काफी अहम रहने वाला है, क्योंकि इसी से रुपये की दिशा और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के रुख का निर्धारण होगा। हालांकि, आने वाले दिनों में रुपये पर दबाव बना रह सकता है। रुपये को आरबीआई की संभावित रेपो रेट कटौती, मजबूत जीडीपी वृद्धि दर और घरेलू बाजार में बेहतर लिक्विडिटी से कुछ समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
रुपये के लगातार कमजोर होने से सोशल मीडिया पर डॉलर के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा को लेकर एक पुराना मिथक फिर से ताजा हो गया है। कुछ लोग उस दौर को याद कर रहे हैं जब एक रुपया एक डॉलर के बराबर होता था। हालांकि, वास्तव में ऐसा कभी नहीं हुआ था। आज़ादी के समय, रुपया पाउंड स्टर्लिंग से जुड़ा था, सीधे डॉलर से नहीं। 1947 में निहित एक्सचेंज रेट लगभग 3.3 रुपये प्रति डॉलर थी। आजादी के बाद के वर्षों तक, एक्सचेंज रेट प्रशासनिक रूप से तय थी। 1950 में रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 4.76 रुपए पर था, और 1966 में सूखे और भुगतान संतुलन की कमी के बाद इसका मूल्य तेजी से गिरकर 7.50 रुपए पर आ गया।
फिर, उदारीकरण के दौर के दबावों के कारण, एक गंभीर बाहरी संकट के बीच, 1990 में यह दर लगभग 17.5 रुपये से बढ़कर 1991 में 22.7 रुपये हो गई। साल 2000 और 2010 के दशक में, करेंसी और भी कमजोर होती चली गई। साल 2000 में 45 रुपये के पार और 2013 के “टेपर टैंट्रम” के दौरान लगभग 56.6 रुपये के स्तर पर पहुंच गया। यह टेपर टैंट्रम, अल्पकालिक आशंकाओं के कारण पैदा हुआ बाज़ार का एक आतंक था कि फेडरल रिजर्व बॉन्ड को खरीदन बंद कर देगा।
साल 2025 की शुरुआत से ही इंडियन करेंसी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 5 फीसदी से ज्यादा टूट चुकी है। ट्रेड डील में देरी, विदेशी बाजारों में बिकवाली और घरेलू अनिश्चितताओं ने मिलकर रुपये को कमजोर किया है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि रुपया 90 की सीमा तोड़ सकता है, लेकिन इतनी तेज गिरावट की उम्मीद किसी ने नहीं की थी। अब यह 90 की सीमा भी टूट चुकी है।
किसी भी देश की करेंसी का तेजी से गिरना उसकी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं होता है। भारत जैसे देश, जहां 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात होता है, वहां रुपये की गिरावट महंगाई को तेज करने का बड़ा कारण बन सकती है। डॉलर महंगा होते ही पेट्रोल-डीजल खरीदने में ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ेगी, जिसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स कॉस्ट और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर दिखेगा।
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