Rupee vs Dollar: डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये से नुकसान है तो नफा भी, जानिए कहां फायदा और कहां झटका

Impact of weak rupee on Indian economy: रुपये की गिरावट से भारतीय एक्सपोर्ट को फायदा मिल सकता है, लेकिन कच्चे माल का महंगा होना और चीन से सस्ते सामान का आना इस फायदे को खत्म कर सकता है। जानिए आपकी जेब और देश की इकोनॉमी पर इसके असर का पूरा गणित।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड10 Dec 2025, 10:33 PM IST
 डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी से भारत को कैसे मिल रही है मदद? (सांकेतिक तस्वीर)
डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी से भारत को कैसे मिल रही है मदद? (सांकेतिक तस्वीर)(HT)

Rupee vs Dollar export benefits: रुपये की गिरावट से भारतीय निर्यात को फायदा मिल सकता है, लेकिन कच्चे माल का महंगा होना और चीन से सस्ते सामान का आना इस फायदे को खत्म कर सकता है। जानिए आपकी जेब और देश की इकोनॉमी पर इसके असर का पूरा गणित।

रुपये की कीमत में गिरावट हमेशा बुरी खबर नहीं होती। फिलहाल रुपये का जो हाल है, वह भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए किसी अच्छे अवसर से कम नहीं है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। महंगे इंपोर्ट और चीन से आ रहे सस्ते सामान इस खुशी को कम कर सकते हैं। आइए समझते हैं कि कमजोर रुपया भारत के लिए कैसे मददगार है और कहां यह मुसीबत बन सकता है।

कमजोर रुपये से भारत को फायदा! आखिर कैसे?

जब रुपया कमजोर होता है, तो डॉलर में भारतीय सामान सस्ता हो जाता है। इससे विदेशी बाजार में भारतीय एक्सपोर्ट को बढ़ावा मिलता है। साथ ही, यह अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले टैरिफ से होने वाले नुकसान की भी कुछ हद तक भरपाई करता है।

भारत के लिए एक और अच्छी बात यह है कि यहां खुदरा महंगाई 1% से नीचे आ गई है। वहीं, अमेरिका में महंगाई 2-3% पर टिकी है। कम कीमतें और कमजोर करेंसी मिलकर भारतीय एक्सपोर्ट के लिए 'डबल बूस्टर' जैसा काम कर रहे हैं।

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रुपये की कमजोरी से भी भारत को मिल रही है मदद (AI Generated Graphic)
(Google Notebeook LM)

आयात महंगा होने से बढ़ेगी मुसीबत

करेंसी में गिरावट का असली नुकसान इंपोर्ट के वक्त होता है। रुपया कमजोर होने से विदेशी सामान खरीदना महंगा हो जाता है। भारत अपनी इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल और कई जरूरी सामान बाहर से मंगाता है।

भारत ग्लोबल वैल्यू चेन पर काफी निर्भर है। जब कच्चा माल महंगा हो जाता है, तो कमजोर रुपये से एक्सपोर्ट में जो फायदा मिलता है, वह खत्म होने लगता है। अलग-अलग सेक्टरों पर इसका असर अलग-अलग होता है।

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चीन पर निर्भरता और डंपिंग का खतरा

भारत इंडस्ट्रियल सामान के लिए चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर है। आंकड़े बताते हैं कि हमारी निर्भरता कितनी ज्यादा है।

ऑर्गेनिक केमिकल्स: 43.2%

इलेक्ट्रिकल मशीनरी और पुर्जे: 42.9%

न्यूक्लियर रिएक्टर्स और मैकेनिकल उपकरण: 40.3%

चीन में अभी चीजों के दाम गिरे हुए हैं और वहां डिमांड कम है। इस वजह से चीनी कंपनियां अपना सामान बहुत सस्ती दरों पर दूसरे देशों में भेज रही हैं, जिसे 'डंपिंग' कहा जाता है। चीनी माल का यह सस्ता प्रवाह कमजोर रुपये के प्रभाव को कम कर देता है। इससे भारतीय घरेलू निर्माताओं को नुकसान हो रहा है, क्योंकि वे चीन की इस कम कीमत का मुकाबला नहीं कर पाते।

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट क्या कहती है?

एक्सपोर्ट और करेंसी का रिश्ता काफी पेचीदा है। वर्ल्ड बैंक की एक स्टडी में दिलचस्प बात सामने आई है। अगर कोई कंपनी अपना 30% से ज्यादा कच्चा माल इंपोर्ट करती है, तो कमजोर करेंसी से उसके एक्सपोर्ट को होने वाला फायदा गायब हो जाता है।

एक्सपोर्ट में आगे रहने के लिए सिर्फ करेंसी ही नहीं, ग्लोबल ग्रोथ और प्रोडक्टिविटी भी मायने रखती है। 69 देशों की लिस्ट में भारत की कॉम्पिटिटिवनेस रैंकिंग 41वीं है। इसकी मुख्य वजह कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर और सरकारी कामकाज में अक्षमता है।

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सुधार के लिए सरकार के प्रयास

हालात सुधारने के लिए सरकार लगातार कोशिश कर रही है। 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' यानी कारोबार को आसान बनाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इसमें लेबर कानूनों में बदलाव को नोटिफाई करना शामिल है। इसके अलावा, फाइनेंशियल सेक्टर के कुछ हिस्सों में विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे खोले गए हैं और टैक्स का बोझ भी कम किया गया है।

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