Food’s weight in new CPI: नई CPI सीरीज से फूड वेटेज 37% तक हो जाएगा कम, देश के राज्यों में अलग-अलग पड़ेगा महंगाई का असर

Food’s weight in new CPI: 2024 को बेस ईयर मानकर एक नई कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) सीरीज आज (12 फरवरी 2026) जारी होने वाली है। मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के सेक्रेटरी सौरभ गर्ग ने इसके जारी होने से पहले इस पर चर्चा की।

Jitendra Singh
पब्लिश्ड12 Feb 2026, 03:37 PM IST
Food’s weight in new CPI: नए मानक में महंगाई बढ़ सकती है।
Food’s weight in new CPI: नए मानक में महंगाई बढ़ सकती है।

Food’s weight in new CPI: सरकार पहली बार रिटेल महंगाई के आंकड़े नए फॉर्मूल के हिसाब से जारी करने की तैयारी में है। आज (12 फरवरी) शाम 4 बजे रिटेल महंगाई के आंकड़े आ सकते हैं। इन आंकड़ों में जनवरी में लगातार तीसरे महीने रिटेल महंगाई की दर बढ़ने की आशंका है। सरकार जनवरी, 2026 से ही नई कीमतों पर आधारित डाटा सीरीज की शुरुआत करेगी।

नए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) सीरीज में एक बड़ा बदलाव होने की उम्मीद जताई जा रही है। इसमें फूड वेटेज 37% तक कम हो सकता है। यह बदलाव मेथड में बड़े बदलाव को दिखाता है, जिससे भारत के अलग-अलग राज्यों में महंगाई दर पर अलग-अलग असर पड़ने की उम्मीद है। खाने की चीज़ों के वजन में कमी, बदलते आर्थिक माहौल और कंज्यूमर के व्यवहार को ज़्यादा सही तरीके से समझने की दिशा में एक स्ट्रेटेजिक कदम है।

महंगाई दर पर असर डालने वाले फैक्टर

फूड वेटेज में इस बदलाव के कई असर हो सकते हैं। कैलकुलेशन के तरीकों में बदलाव, जिसमें सर्विसेज़ पर बढ़ता जोर शामिल है, महंगाई तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसके अलावा, एक खास बात जिस पर ध्यान देना चाहिए वह है CPI स्ट्रक्चर में सोने का बढ़ता वेटेज, जो कुल महंगाई कैलकुलेशन पर और असर डालेगा। ये वैरिएबल मिलकर तय करेंगे कि किन राज्यों में महंगाई बढ़ सकती है और किन राज्यों में महंगाई में कमी आ सकती है।

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नई सीरीज में पका हुआ भोजन और स्नैक्स को फूड कैटेगरी से हटाकर ‘रेस्टोरेंट और कैफे सर्विसेज’ नाम के नए सब-कैटेगरी में डाल दिया गया है। इससे बाहर खाने और सेवाओं से जुड़ी महंगाई को अलग से दिखाया जा सकेगा। लेकिन इससे पुरानी और नई CPI सीरीज की सीधी तुलना करना आसान नहीं रहेगा।

हर राज्य में अलग-अलग हो सकता है महंगाई का असर

जगह के हिसाब से महंगाई का असर भी अलग-अलग हो सकता है। केरल और बिहार जैसे राज्यों में उनकी खास आर्थिक स्थितियों और कंज्यूमर के खर्च करने का पैटर्न अलग है। बिहार जैसे राज्यों में खाद्य कीमतें स्थिर रहती हैं। इस वजह से महंगाई की दरों में उतार-चढ़ाव हो सकता है। ऐसे में कुछ राज्यों को महंगाई से राहत मिल सकती है, जबकि दूसरों को लगातार कीमतों का दबाव झेलना पड़ सकता है।

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बड़े आर्थिक असर

नई CPI सीरीज में बदलाव का असर न सिर्फ़ रोजाना इस्तेमाल करने वाले कंज्यूमर्स पर पड़ेगा, बल्कि बड़ी आर्थिक पॉलिसियों पर भी पड़ेगा। सेंट्रल बैंक और सरकारी संस्थाएं अक्सर मॉनेटरी पॉलिसी बनाने के लिए सही इन्फ्लेशन मेट्रिक्स पर निर्भर करती हैं। इसलिए, CPI में एडजस्टमेंट से इंटरेस्ट रेट्स और इन्फ्लेशन टारगेटिंग स्ट्रेटेजी का रिव्यू हो सकता है। जैसे-जैसे इकॉनमी इन बदलावों के हिसाब से ढलेगी, सभी सेक्टर्स पर इसका असर पड़ेगा, जिससे लगातार मॉनिटरिंग और एडजस्टमेंट की जरूरत पर फोकस बढ़ेगा।

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महंगाई कैसे बढ़ती-घटती है?

महंगाई का बढ़ना और घटना प्रोडक्ट की डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करता है। अगर लोगों के पास पैसे ज्यादा होंगे तो वे ज्यादा चीजें खरीदेंगे। ज्यादा चीजें खरीदने से चीजों की डिमांड बढ़ेगी और डिमांड के मुताबिक सप्लाई नहीं होने पर इन चीजों की कीमत बढ़ेगी। इस तरह बाजार महंगाई की चपेट में आ जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो बाजार में पैसों का अत्यधिक बहाव या चीजों की शॉर्टेज महंगाई का कारण बनता है। वहीं अगर डिमांड कम होगी और सप्लाई ज्यादा तो महंगाई कम होगी।

CPI से तय होती है महंगाई

एक ग्राहक के तौर पर आप और हम रिटेल मार्केट से सामान खरीदते हैं। इससे जुड़ी कीमतों में हुए बदलाव को दिखाने का काम कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी CPI करता है। हम सामान और सर्विसेज के लिए जो औसत मूल्य चुकाते हैं, CPI उसी को मापता है।

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