
What is undersea cable: दुनिया तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तरफ बढ़ रही है और भारत इस बदलाव के केंद्र में नजर आ रहा है। इसी कड़ी में गूगल ने भारत को लेकर कई बड़े ऐलान किए हैं। समुद्र के भीतर नई केबल बिछाने से लेकर करोड़ों डॉलर के एआई चैलेंज तक, यह पहल भारत की डिजिटल ताकत को नई ऊंचाई दे सकती है।
गूगल के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) सुंदर पिचाई ने ‘एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ के दौरान बताया कि गूगल भारत, अमेरिका और दक्षिणी गोलार्ध के अन्य हिस्सों को जोड़ने के लिए समुद्र के नीचे केबल बिछाने की एक नई पहल की घोषणा की। इस पहल को ‘इंडिया-अमेरिका कनेक्ट इनिशिएटिव’ नाम दिया गया है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के बाद पिचाई ने कहा कि एआई हमारे जीवनकाल का सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव साबित हो सकता है और भारत जैसे देशों के लिए यह नई संभावनाओं के दरवाजे खोल सकता है।
गूगल ने ‘एआई फॉर साइंस इम्पैक्ट चैलेंज’ के तहत 30 मिलियन डॉलर की घोषणा की है। इसका मकसद वैज्ञानिक शोध और नवाचार को बढ़ावा देना है। इस पहल से उन शोधकर्ताओं को समर्थन मिलेगा जो एआई की मदद से नई खोजों पर काम कर रहे हैं।
पिचाई ने विशाखापत्तनम में प्रस्तावित 15 अरब डॉलर के एआई केंद्र का भी जिक्र किया। इस केंद्र में गीगावाट-स्केल कंप्यूट सुविधा और अंतरराष्ट्रीय समुद्री केबल हब शामिल होगा। इसके तैयार होने के बाद देशभर के व्यवसायों और लोगों को उन्नत एआई सेवाओं का फायदा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर बनेंगे।
गूगल ने ‘कर्मयोगी भारत’ के साथ साझेदारी कर 800 जिलों के दो करोड़ से ज्यादा लोक सेवकों को क्लाउड सपोर्ट देने का फैसला किया है। यह सुविधा 18 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होगी।
इसके अलावा, ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’ के साथ मिलकर 10,000 स्कूलों के 1.1 करोड़ छात्रों को जनरेटिव एआई, रोबोटिक्स और कोडिंग की ट्रेनिंग दी जाएगी।
विद्यार्थियों और शुरुआती करियर वाले पेशेवरों के लिए हिंदी और अंग्रेजी में ‘गूगल एआई प्रोफेशनल सर्टिफिकेट प्रोग्राम’ शुरू किया गया है। साथ ही, गूगल डीपमाइंड और भारत सरकार के बीच राष्ट्रीय साझेदारी कार्यक्रम के तहत समझौता हुआ है, जिससे उन्नत एआई क्षमताओं तक पहुंच और आसान होगी।
पिचाई ने बताया कि भारत में ‘जेमिनी’ ऐप तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और यह 10 भाषाओं में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि एआई पारदर्शी, जिम्मेदार और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक होना चाहिए ताकि लोग तकनीक पर भरोसा कर सकें।
पिचाई ने एक्स पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी तस्वीरों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने स्वास्थ्य, कृषि और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में एआई को हर स्तर पर लागू करने पर चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने भी भारतीय विद्यार्थियों और पेशेवरों के साथ गूगल के सहयोग की सराहना की।
समुद्री केबल से लेकर शिक्षा और रिसर्च तक, गूगल की ये घोषणाएं दिखाती हैं कि भारत एआई के मामले में वैश्विक स्तर पर मजबूत भूमिका निभाने की तैयारी में है। आने वाले समय में यह पहल डिजिटल विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकती है।
समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली केबलें, जिन्हें सबसी (subsea) या सबमरीन केबल कहा जाता है, समुद्र तल पर रखी फाइबर-ऑप्टिक तारें होती हैं जो देशों के बीच डेटा और इंटरनेट ट्रैफिक को तेजी से भेजती हैं। यह केबल दुनिया भर में इंटरनेट का लगभग 99% हिस्सा संभालती हैं और महाद्वीपों को डिजिटल रूप से जोड़ती हैं। इन केबलों से ही ई-मेल, वीडियो कॉल, क्लाउड सर्विस, सोशल मीडिया और कई ऑनलाइन सेवाएं काम करती हैं। गूगल और अन्य टेक कंपनियां इसी नेटवर्क का उपयोग कर अंतरराष्ट्रीय डेटा कनेक्टिविटी बढ़ा रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 500 से ज्यादा व्यावसायिक समुद्री केबल मौजूद हैं, जो महाद्वीपों, बाजारों और घरों को जोड़ती हैं। ये केबल मोटाई में लगभग बगीचे की पाइप जितनी होती हैं, लेकिन इनकी कुल लंबाई करीब 17 लाख किलोमीटर है यानी पृथ्वी को कई बार लपेटा जा सके।
केबल बिछाने से पहले समुद्र की सतह का सर्वे किया जाता है ताकि कम जोखिम और कम पर्यावरणीय असर वाला रास्ता चुना जा सके। फिर खास जहाज बड़े-बड़े रील से फाइबर केबल को समुद्र की गहराई में धीरे-धीरे बिछाते हैं।
समुद्र तल पर बिछीं ये तारें टूटती भी हैं। भूकंप, समुद्र के अंदर भूस्खलन या ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक वजहें तो हैं ही, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि करीब 80% नुकसान इंसानी गतिविधियों से होता है। जहाज के लंगर या मछली पकड़ने वाले जाल अक्सर केबल को नुकसान पहुंचा देते हैं। इसलिए इनपर निगरानी रखना या चेक करते रहना बहुत जरूरी है।
आज ये केबल वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुकी हैं। अगर इनमें रुकावट आती है तो उसका असर कारोबार, आपात सेवाओं, सुरक्षा व्यवस्था और अरबों लोगों के इंटरनेट पर तुरंत दिखता है। पहले इन केबलों से सिर्फ टेलीग्राफ संदेश भेजे जाते थे, फिर टेलीफोन नेटवर्क आया और अब हाई-स्पीड इंटरनेट फाइबर-ऑप्टिक के जरिए चलता है। आज समुद्र की तलहटी में बिछी इन केबलों से हर सेकंड सैकड़ों टेराबिट डेटा गुजरता है।
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