
भारत में लॉजिस्टिक्स सेक्टर तेजी से बदल रहा है। ई-कॉमर्स के बढ़ते कारोबार, सरकार की नई नीतियों और पर्यावरण को लेकर बढ़ती चिंता के बीच अब कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर तेजी से रुख कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में लॉजिस्टिक्स सेक्टर में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग काफी तेजी से बढ़ सकती है। दरअसल, लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईंधन की बढ़ती कीमतें हैं। पेट्रोल और डीजल के दाम लगातार ऊंचे बने रहने से परिवहन की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों को सस्ता विकल्प दे रहे हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों को चलाने की लागत पारंपरिक डीजल वाहनों के मुकाबले काफी कम होती है। इससे कंपनियां लॉन्ग टर्म में अच्छी सेविंग कर सकती हैं।
भारत में EV इनोवेशन की एक बड़ी लहर लोकल मैन्युफैक्चरिंग से आने की उम्मीद जताई जा रही है। हाल ही के बजट 2026–27 में लिथियम-आयन सेल, बैटरी कंपोनेंट्स और जरूरी मिनरल्स पर कस्टम ड्यूटी में छूट बढ़ाई गई है। इससे मैन्युफैक्चरिंग लागत कम होती है और सीधे तौर पर इस लोकल प्रोडक्शन स्ट्रेटेजी को सपोर्ट मिलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में लॉजिस्टिक्स सेक्टर में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेगी। सरकार की नीतियां, कंपनियों की रणनीति और बढ़ता ई-कॉमर्स बाजार इस बदलाव को और तेज कर सकता है।
सरकार भी इलेक्ट्रिक वाहनों पर अपना फोकस बढ़ा रही है। भारत सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030 तक नई गाड़ियों की बिक्री में 30 फीसदी इलेक्ट्रिक वाहन शामिल हों। हालांकि इस बड़े लक्ष्य हासिल करने में कई तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं। इसमें गाड़ियों की ज़्यादा कीमत, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और सप्लाई चेन जैसी अड़चने शामिल हैं। टाटा मोटर्स और हीरो इलेक्ट्रिक जैसे घरेलू प्लेयर्स EV स्पेस में भारी निवेश कर रहे हैं। बजट 2026-27 ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जारी रखकर OEMs को और सपोर्ट किया गया है। इससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
ड्रिवन की सह संस्थापक और सीबीओ,अल्पना जैन का कहना है कि भारत में कमर्शियल इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की माांग बढ़ सकती है। इसकी वजह ये है कि इलेक्ट्रिक वाहन पर्यावरण के लिहाज से बेहतर हैं। इसके साथ काम की जरूरत भी बढ़ रही है। फ्लीट ऑपरेटर अब यह देखते हैं कि कुल खर्च कितना होगा, गाड़ियां कितनी देर तक चलती रहेंगी (अपटाइम) और पैसा सही जगह कैसे लगाया जाए। ऐसी तमाम चीजों पर जब विचार किया जाता है तो इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग में इजाफा हो सकता है। बस और भारी ट्रक के मामलों में यही पैमाना लागू होता है। ईवी को सिर्फ वाहन नहीं, बल्कि एक बुनियादी ढांचा मानना होगा। इससे ईंधन और मेंटेनेंस में बचत होगी। भारत भी इस बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार है।
भारत में ई-कॉमर्स का विस्तार तेजी से हो रहा है। बड़ी कंपनियां जैसे एमेजॉन, फ्लिपकार्ट और अन्य डिलीवरी प्लेटफॉर्म हर दिन लाखों ऑर्डर डिलीवर कर रहे हैं। इन कंपनियों को तेज और कम लागत वाली डिलीवरी के लिए बड़ी संख्या में वाहनों की जरूरत होती है। ऐसे में अब कई ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियां अपने बेड़े में इलेक्ट्रिक वाहनों को शामिल कर रही हैं। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर और छोटे इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर शहरों के अंदर डिलीवरी के लिए काफी उपयोगी साबित हो रहे हैं। इससे कंपनियों का ईंधन खर्च भी कम हो रहा है और प्रदूषण भी घट रहा है।
कई बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनियां अब अपनी फ्लीट को धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक में बदलने की योजना बना रही हैं। कुछ कंपनियों ने अगले 5 से 10 वर्षों में अपने अधिकतर डिलीवरी वाहनों को इलेक्ट्रिक करने का लक्ष्य तय किया है। इसके अलावा स्टार्टअप कंपनियां भी इस क्षेत्र में तेजी से काम कर रही हैं। कई नए स्टार्टअप इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर और छोटे कार्गो वाहनों का निर्माण कर रहे हैं, जो खासतौर पर लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी के लिए बनाए गए हैं।
इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल से कार्बन उत्सर्जन कम होता है। लॉजिस्टिक्स सेक्टर में बड़े पैमाने पर वाहनों का उपयोग होता है, इसलिए अगर इस क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढ़ता है तो इससे प्रदूषण में भी बड़ी कमी आ सकती है। कई कंपनियां अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए भी इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने पर जोर दे रही हैं। इससे उनकी ब्रांड छवि भी बेहतर होती है और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलता है। कुल मिलाकर अगर चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी तकनीक में तेजी से सुधार होता है, तो इलेक्ट्रिक वाहन लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिए एक बड़ा और स्थायी विकल्प बन सकते हैं। इससे न सिर्फ कंपनियों की लागत कम होगी बल्कि पर्यावरण को भी बड़ा फायदा मिलेगा।
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