
India Trade Review 2025: वर्ष 2025 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। एक तरफ दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका ने भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ लगा दिए, तो दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण कच्चे तेल की राजनीति ने भारत की मुश्किलों को बढ़ा दिया। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि मुश्किलें ही अवसर पैदा करती हैं, भारत ने ठीक वैसा ही किया। रूबिक्स डेटा साइंसेज की ताजा रिपोर्ट 'द ईयर दैट टेस्टेड ट्रेड' के मुताबिक, 2025 भारत के लिए संकट का नहीं, बल्कि 'समायोजन और सुधार' का साल रहा।
जब अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर करीब 50% तक के पारस्परिक टैरिफ लगाए, तो लगा कि भारतीय निर्यात पूरी तरह चरमरा जाएगा। अगस्त-सितंबर के शुरुआती दो महीनों में निर्यात 20% तक गिरा भी, लेकिन फिर जो हुआ उसने सबको चौंका दिया।
भारतीय निर्यातकों ने अपनी बाजार हिस्सेदारी बचाने के लिए टैरिफ का बोझ खुद उठाने का फैसला किया। नतीजा यह रहा कि अक्टूबर-नवंबर में निर्यात में 'V-शेप' रिकवरी हुई। अकेले टेलीकॉम और मोबाइल फोन निर्यात में 182% का ऐतिहासिक उछाल देखा गया, जिसका श्रेय एप्पल (Apple) जैसी कंपनियों के भारत आने को जाता है।
रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों ने भारत के रिफाइनिंग सेक्टर को मुश्किल में डाल दिया था। यूरोपीय देशों ने उन ईंधनों को खरीदने से परहेज किया जो रूसी तेल से बने थे। ऐसे में भारत ने अपनी रणनीति बदली।
रूस से कच्चे तेल के आयात में 17.8% की कटौती की गई और अमेरिका एवं यूएई से स्वच्छ कच्चा तेल (Clean Barrel) का आयात बढ़ाया गया। इतना ही नहीं, भारत ने अपने निर्यात के लिए चीन, ओमान और दक्षिण कोरिया जैसे नए बाजारों के द्वार खोल दिए, जिससे पुराने बाजारों में हुए नुकसान की भरपाई हो सके।
सितंबर 2025 में लागू हुए 'GST 2.0' सुधारों ने देश के भीतर खरीदारी का सैलाब ला दिया। टैक्स की पांच दरों को घटाकर 5% और 18% की केवल दो मुख्य दरों में समेट दिया गया।
इसका सबसे सुखद असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ा, जहां अक्टूबर में कारों और गाड़ियों की बिक्री में 41.3% की भारी बढ़त देखी गई। डिजिटल पेमेंट का आंकड़ा तो एक ही दिन में दस गुना बढ़कर 11.31 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुंचा। इन घरेलू सुधारों ने भारत को बाहरी व्यापारिक झटकों से लड़ने की आंतरिक शक्ति दी।
अपनी निर्यात निर्भरता को अमेरिका से कम करने के लिए भारत ने 2025 में व्यापारिक समझौतों की झड़ी लगा दी।
यूके (CETA): 99% भारतीय उत्पादों को ब्रिटेन में शुल्क-मुक्त एंट्री मिली।
EFTA (स्विट्जरलैंड, नॉर्वे आदि): अगले 15 सालों में 100 अरब डॉलर के निवेश का रास्ता साफ हुआ।
ओमान समझौता: यह केवल व्यापार नहीं था, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे रणनीतिक मार्ग तक भारत की पहुंच सुनिश्चित करने का बड़ा कदम था।
दिसंबर 2025 तक आते-आते भारत का व्यापार घाटा कम होकर पांच महीने के निचले स्तर 24.6 अरब डॉलर पर आ गया। हालांकि, एक बड़ी चुनौती अभी भी बरकरार है- अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 18% से बढ़कर 21% हो गई है। यह दर्शाता है कि एक तरफ हम सफल हो रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ हमारा जोखिम एक ही बाजार पर केंद्रित हो रहा है। 2026 की ओर बढ़ते हुए भारत का लक्ष्य अब अपने 'बास्केट' को और अधिक बहुआयामी बनाना होगा।
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