
ईरान अपने मिसाइल और ड्रोन हमलों से पड़ोस के खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष तबाही लाने में तो कामयाब नहीं रहा, लेकिन वहां गंभीर और दूरगामी परोक्ष प्रभाव अभी से दिखने लगे हैं। शांत, शानो-शौकत वाले, व्यापारिक शहर दुबई की छवि बदल रही है। पिछले महीने तक दुबई दुनियाभर के और खासकर एशियाई अमीरों के अस्थायी एवं स्थायी निवास का निःसंदेह पसंदीदा डेस्टिनेशन था, लेकिन ईरान इन अमीरों के मन में संदेह पैदा करने में कामयाब होने लगा है। दूसरी तरफ, क्रिटिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए दुबई समेत खाड़ी की अन्य जगहों पर भरोसा करने वाली वैश्विक कंपनियों का विश्वास भी डोलने लगा है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, एशियाई देशों के कई धनी परिवार दुबई में अपने निवेश पर पुनर्विचार करने लगे हैं। हाल के वर्षों में दुबई में अरबों डॉलर के निवेश आए हैं। लेकिन अब कई निवेशक अपने सलाहकारों से कह रहे हैं कि अभी निवेश प्रक्रिया टाल दें जबकि कुछ निवेशक निवेश में कटौती का फैसला कर रहे हैं।
जो पहले से ही दुबई आ चुके हैं और वहीं रह रहे हैं, उनमें से कई स्थिति और गंभीर होने पर आपातकालीन योजनाओं पर विचार कर रहे हैं। हॉन्गकॉन्ग के मल्टि-फैमिली ऑफिस एनम कैपिटल के सीईओ निक श्याओ ने कहा कि निवेश अवसरों और टैक्स लाभ की तलाश में मध्य पूर्व गए एशियाई निवेशक अब अपने फैसलों पर पुनिर्विचार कर रहे हैं और वे संभवतः हॉन्गकॉन्ग या सिंगापुर का रुख करने लगे हैं।
बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) वर्ष 2024 में विश्व का सबसे तेजी से बढ़ता बुकिंग सेंटर्स में एक था। यहां विदेशी निवेशकों ने करीब 700 अरब डॉलर निवेश किए थे। अकेले दुबई में 1.2 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा के निवेश वाले फैमिल ऑफिसेज हैं। विदेशी निवेश का एक और बड़ा डेस्टिनेशन अबू धाबी भी यूएई में ही है।
लेकिन पिछले हफ्ते दुबई में ड्रोन हमला हुआ और अमेरिकी दूतावास के पास आग लग गई। ईरान युद्ध के कारण खाड़ी देशों से हजारों उड़ानें रोक दी गईं। दुबई में अपना फैमिली ऑफिस चलाने वाले पैट्रिक सैंग कहते हैं कि युद्ध खिंचा तो दुबई की प्रतिष्ठा को आंच आएगी और तब कुछ लोग यहां से चले जाएंगे। वह कुछ वर्ष पहले हॉन्गकॉन्ग में हुए लोकतंत्र समर्थक दंगों का उदाहरण देते हैं। सैंग कहते हैं, 'मुझे लगता है कि दुबई से माइग्रेशन होगा।' वो कहते हैं, 'अगर आप प्रवासी हैं तो यहां परिवार के साथ जोखिम क्यों उठाएंगे?'
फैमिली ऑफिसेज के साथ-साथ कंपनियों के डेटा सेंटर्स के भी खाड़ी देशों से शिफ्ट होने की संभावना बढ़ती जा रही है। माइक्रोसॉफ्ट अज्योर और ऐमजॉन वेब सर्विस (AWS) जैसी विशालकाय क्लाउड कंपनियां दुबई, अबू धाबी और ओमान स्थित डेटा सेंटर्स के वर्कलोड्स भारत और सिंगापुर जैसे सुरक्षित स्थानों में रीडायरेक्ट करने पर विचार कर रही हैं।
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, एक इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी के अधिकारी ने कहा कि मुंबई, चेन्नै, हैदराबाद, कोच्ची समेत अन्य जगहों पर क्रिटिकल वर्कलोड्स को तुरंत रीरूट करने की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। 2 मार्च को यूएई के दो और बहरीन के एक डेटा सेंटर पर ड्रोन हमले हुए। इससे लोकल बैंकिंग ऐप, दुबई और कुवैत में एयरपोर्ट ऑपरेशन एवं यूएई के स्टॉक मार्केट के संचालन प्रभावित हुए।
ऐमजॉन वेब सर्विस से मिले अपडेट्स के मुताबिक, मध्य पूर्व क्षेत्र के उसके 25 सर्विस सेंटर अभी भी बाधित हैं जबकि 34 अन्य सर्विस सेंटर में कामकाज घट गए हैं। वैसे भी वैश्विक क्लाउड कंपनियां भारत में अपने डेटा सेंटर्स स्थापित करने पर विचार कर रही रही थीं, लेकिन अब ईरान युद्ध के कारण यह प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है। कंपनियों ने तात्कालिक रूप से रीरूटिंग का रास्ता अपनाया है और आगे चलकर ये डेटा सेंटर्स मिडल ईस्ट से भारत पहुंच जाएंगे।
इधर, ईरान युद्ध तेज होने के बीच तेल के दाम 2022 के बाद से पहली बार 114 डॉलर प्रति बैरल हो गए। अंतरराष्ट्रीय मानक वाले ब्रेंट कच्चे तेल का दाम सोमवार को 114 डॉलर प्रति बैरल हो गया है जो शुक्रवार की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है। शुक्रवार को तेल का दाम 92.69 डॉलर प्रति बैरल था। ईरान युद्ध के दूसरे हफ्ते भी जारी रहने से कई देश और स्थान उसकी अपनी चपेट में आ गये हैं, जिसके कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। फारस की खाड़ी में ये वे देश एवं स्थान हैं जो तेल व गैस के उत्पादन तथा परिवहन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
वहीं, ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के पुत्र मोजतबा खामेनेई को सोमवार को देश का नया सर्वोच्च नेता चुन लिया गया। ईरान के सरकारी मीडिया ने आधिकारिक तौर पर इस फैसले की जानकारी साझा की है। ईरान में नेतृत्व के चयन के लिए उत्तरदायी संस्था 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' ने उनके नाम पर मुहर लगाई। यह परिषद 88 सदस्यीय एक शक्तिशाली धार्मिक संस्था है, जो पिछले कुछ समय से नए नेता के चयन की प्रक्रिया में जुटी थी।
उधर, ईरान का खाड़ी देशों पर हमला लगातार जारी है। इस बीच सऊदी अरब ने ईरान को आगाह किया कि अगर वह अरब देशों पर हमले करता रहा तो उसे अब तक का 'सबसे बड़ा नुकसान' उठाना पड़ेगा। सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि ईरानी हमले का मतलब है, 'तनाव में और वृद्धि, जिसका वर्तमान और भविष्य में संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा।' सऊदी अरब का यह बयान उस नए ड्रोन हमले के बाद आया, जिसमें जाहिर तौर पर उसके बड़े शायबा तेल क्षेत्र को निशाना बनाया गया।
बहरहाल, रूस ने यूक्रेन पर जिस कारण से हमला बोला, ठीक उसी कारण को ईरान ने भी खाड़ी देशों पर हमले का आधार बनाया- पड़ोस में अमेरिकी खतरे को स्थापित करना। यूक्रेन ने नाटो का सदस्य बनकर अमेरिकी नेतृत्व के सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने की तमन्ना पाल रखा था, तो यूएई, कतर, सऊदी अरब जैसे देशों ने अपने यहां अमेरिका के सैन्य अड्डे ही स्थापित करवा लिए। रूस का यूक्रेन के खिलाफ युद्ध चार वर्ष पूरा कर चुका है और अब ईरान पड़ोसियों पर हमले नहीं करने का आश्वासन देकर भी मिसाइलें भेज रहा है।
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