
नई दिल्ली: आजादी की 79वीं वर्षगांठ पर देश की आर्थिक कहानी को देखें तो यह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें एक ऐसा देश, जिसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि और कच्चे माल पर निर्भर थी। आज भारत टेक्नोलॉजी, सर्विसेज, मैन्युफैक्चरिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। आजादी के समय भारत की अर्थव्यवस्था को औपनिवेशिक शासन से मिली कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। RBI के एक ऐतिहासिक विश्लेषण के मुताबिक उस दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि प्रधान थी और सप्लाई में उतार-चढ़ाव के कारण महंगाई की भी बड़ी चिंता रहती थी।
1947 के आसपास औद्योगिक आधार भी आज के मुकाबले बहुत छोटा था। आरबीआई के एक ऐतिहासिक अध्ययन में बताया गया है कि 1947 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय लंबे समय से कमजोर थी और कृषि की ग्रोथ भी ठहरी हुई थी। औद्योगिक उत्पादन भी उस समय बड़ी चुनौती थी। यानी आजादी के समय भारत को सबसे पहले उत्पादन बढ़ाने, रोजगार पैदा करने और घरेलू इंडस्ट्री खड़ी करने की जरूरत थी।
आजादी के बाद सरकार के सामने साफ चुनौती थी कि देश को सिर्फ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से निकालकर औद्योगिक अर्थव्यवस्था की तरफ कैसे ले जाया जाए। 1947 के बजट भाषण में भी तेजी से औद्योगीकरण, उत्पादन बढ़ाने और रोजगार के विस्तार की जरूरत पर जोर दिया गया था। उस दौर में सरकार ने ऐसी अर्थव्यवस्था की कल्पना की जिसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र की भूमिका हो। इसके बाद देश में प्लानिंग, बड़े सार्वजनिक उपक्रम, स्टील प्लांट, बिजली, भारी उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर बढ़ा। लक्ष्य था कि भारत जरूरी सामान और औद्योगिक क्षमता के लिए दूसरे देशों पर कम निर्भर रहे।
भारत की आर्थिक यात्रा को मोटे तौर पर तीन बड़े दौर में देखा जा सकता है। पहला दौर कृषि और बुनियादी जरूरतों को मजबूत करने का था। इसके बाद भारी इंडस्ट्री और सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार पर जोर आया। फिर 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में प्राइवेट सेक्टर, विदेशी निवेश, सर्विसेज और एक्सपोर्ट की भूमिका तेजी से बढ़ी। यही वह दौर था जिसने भारत के IT और बिजनेस सर्विसेज सेक्टर को ग्लोबल बाजार में पहुंचाया। आज भारतीय IT कंपनियां दुनिया की बड़ी कंपनियों को सॉफ्टवेयर, क्लाउड, कंसल्टिंग और डिजिटल सर्विसेज दे रही हैं। यानी 1947 का भारत जहां औद्योगिक क्षमता खड़ी करने की चुनौती से जूझ रहा था, वहीं 2026 का भारत ग्लोबल सर्विस प्रोवाइडर के तौर पर भी अपनी पहचान बना चुका है।
भारत की आर्थिक तस्वीर में सबसे बड़ा बदलाव GDP के आकार में दिखाई देता है। सरकार के मुताबिक IMF के अप्रैल 2026 वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के आधार पर वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की नॉमिनल GDP 3.92 ट्रिलियन डॉलर रही और भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना। MoSPI के जून 2026 के प्रोविजनल अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.7% रही। जनवरी-मार्च 2026 की चौथी तिमाही में रियल GDP ग्रोथ 7.8% दर्ज की गई। यह आंकड़े बताते हैं कि आज भारत की आर्थिक गतिविधियां सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं हैं। सर्विसेज, मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और दूसरे सेक्टर भी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं।
आजादी के समय भारत में आत्मनिर्भरता का मतलब था कि देश अपने कपड़े, खाना और जरूरी औद्योगिक सामान खुद बनाए। आज आत्मनिर्भरता की परिभाषा काफी बदल गई है। अब मुकाबला सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, बैटरी, इलेक्ट्रिक व्हीकल और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में है। भारत सरकार के मुताबिक देश का इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन 2026 तक 300 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट इस बदलाव के बड़े हिस्से हैं। यानी जिस भारत को कभी औद्योगिक क्षमता बनाने की जरूरत थी, वह अब ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
भारत के इस बदलाव में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का नाम खास तौर पर महत्वपूर्ण है। 2026 में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और नीदरलैंड की सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी कंपनी ASML ने भारत में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने के लिए रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की। इसके अलावा दोनों कंपनियां भारत में एडवांस चिप बनाने वाली मशीनों के कंपोनेंट और सब-असेंबली के निर्माण की संभावनाओं पर भी काम कर रही हैं। यह बदलाव इसलिए बड़ा है क्योंकि सेमीकंडक्टर सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं है। यह मोबाइल, कार, कंप्यूटर, डेटा सेंटर, AI और डिफेंस टेक्नोलॉजी जैसे कई सेक्टर की बुनियादी जरूरत है।
भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी में मोबाइल फोन एक बड़ा उदाहरण बन चुका है। 2014-15 से 2025-26 के बीच भारत से स्मार्टफोन एक्सपोर्ट में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई और 2025-26 में इसका मूल्य करीब ₹2.59 लाख करोड़ पहुंच गया। यह बताता है कि भारत सिर्फ घरेलू खपत के लिए मोबाइल बनाने की दिशा में नहीं बढ़ रहा, बल्कि ग्लोबल एक्सपोर्ट बेस के रूप में भी अपनी जगह मजबूत कर रहा है। इस बदलाव में Apple के सप्लायर, फॉक्सकॉन और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियों की भूमिका भी बढ़ी है।
1947 में भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर का आकार आज के मुकाबले बेहद छोटा था। आज भारतीय कंपनियां बैंकिंग, IT, ऑटोमोबाइल, फार्मा, टेलीकॉम, रिटेल, एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग से लेकर स्पेस टेक्नोलॉजी तक कई क्षेत्रों में काम कर रही हैं। टाटा ग्रुप, रिलायंस, अडानी ग्रुप, महिंद्रा, इंफोसिस, टीसीएस और सन फार्मा जैसे बड़े कारोबारी समूह और कंपनियां भारतीय अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। अब भारतीय बिजनेस की चुनौती सिर्फ घरेलू बाजार में बढ़ना नहीं है। कंपनियां ग्लोबल सप्लाई चेन, एक्सपोर्ट और विदेशी बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत की सबसे बड़ी जरूरत घरेलू उत्पादन और जरूरी सामान की उपलब्धता बढ़ाना थी। आज भारत का लक्ष्य एक्सपोर्ट बास्केट को ज्यादा मजबूत बनाना है। वाणिज्य मंत्रालय का ट्रेड डेटा पोर्टल भारत के एक्सपोर्ट और इंपोर्ट का कमोडिटी और देशवार डेटा उपलब्ध कराता है। 2026 में इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे सेक्टर एक्सपोर्ट ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि भारत के सामने अभी भी ट्रेड डेफिसिट और कुछ महत्वपूर्ण सेक्टरों में इंपोर्ट निर्भरता जैसी चुनौतियां हैं।
भारत ने 79 साल में लंबी आर्थिक यात्रा तय की है, लेकिन मंजिल अभी बाकी है। आज भी भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती मैन्युफैक्चरिंग को ज्यादा रोजगार वाला बनाना, हाई-टेक प्रोडक्शन बढ़ाना, एक्सपोर्ट को मजबूत करना और इंपोर्ट निर्भरता घटाना है। रॉयटर्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत करीब 51 अरब डॉलर के सालाना इंपोर्ट वाले उत्पादों को देश में बनाने की दिशा में काम कर रहा है। मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी अभी GDP में करीब 13% बताई गई है। यानी अगले दौर की आर्थिक कहानी सिर्फ GDP बढ़ाने की नहीं होगी। असली सवाल होगा कि GDP की ग्रोथ कितनी नौकरियां पैदा करती है और भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग चेन में कितनी बड़ी भूमिका हासिल करता है।
आजादी के समय भारत की सबसे बड़ी जरूरत थी भूख और गरीबी से लड़ना, कृषि उत्पादन बढ़ाना और बुनियादी इंडस्ट्री खड़ी करना। फिर देश ने स्टील, बिजली, मशीनरी, बैंकिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर में आधार बनाया। 1991 के बाद आर्थिक सुधारों ने प्राइवेट सेक्टर और ग्लोबल कारोबार के लिए रास्ता खोला। इसके बाद IT और सर्विसेज ने भारत को दुनिया के बाजार से जोड़ा। अब 2026 में भारत का अगला लक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, EV, रिन्यूएबल एनर्जी, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और हाई-टेक इंडस्ट्री में अपनी ताकत बढ़ाना है। यही वजह है कि 15 अगस्त 1947 से 15 अगस्त 2026 तक भारत की आर्थिक कहानी को अगर एक लाइन में समझना हो तो इसे “चरखे से चिप तक का सफर” कहा जा सकता है।
भारत की आर्थिक यात्रा का अगला बड़ा पड़ाव 2047 है। सरकार का लक्ष्य विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ना है। इसके लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, रोजगार और ग्लोबल एक्सपोर्ट क्षमता को बढ़ाना अहम होगा। आजादी के समय भारत को अपनी अर्थव्यवस्था की नींव खड़ी करनी थी। आज चुनौती उस नींव पर ग्लोबल स्तर की प्रतिस्पर्धी इकोनॉमी तैयार करने की है। और इस बदलाव में आने वाले वर्षों में बड़ी भूमिका भारतीय कंपनियों, स्टार्टअप्स, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, टेक्नोलॉजी और युवा वर्कफोर्स की होगी।
जितेन्द्र सिंह ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से B.Sc (भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र) की डिग्री हासिल की है। इसके बाद साल 2007 में मुंबई के भारतीय विद्या भवन से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन रेडियो एंड टीवी जर्नलिजम में एक साल का डिप्लोमा कोर्स किया। कोर्स खत्म होते है मुंबई में CNBC आवाज चैनल में प्रशिक्षण का मौका मिला। इस चैनल में खबरों की दुनिया और बिजनेस पत्रकारिता क्या है, इस बारे में जानने का मौका मिला। फिर मुंबई के प्रतिष्ठित CTV में काम करने का मौका मिला। यहीं से मुंबई को बारीकी से समझने का मौका मिला। मुंबई के समाचारों से हटकर एंटरटेनमेंट की दुनिया में कलर्स चैनल में एंट्री मिली। यहां बहुत कुछ सीखने को मिला। यहीं सोनी एंटरटेनमेंट चैनल में काम करने का मौका मिला। सोनी में कौन बनेगा करोड़पति शो टीम के हिस्सा रहे। इसके साथ ही सोनी के अन्य बहुचर्चित शो जैसे क्राइम पट्रोल, आहट, कॉमेडी सर्कस जैसे शो की टीम का हिस्सा रहे। कई संस्थानों में फ्रीलांसिंग स्क्रिप्ट राइटिंग करते रहे। एंटरटनमेंट के बाद फिर से बिजनेस पत्रकारिता में एंट्री मिली और मनीकंट्रोल के साथ जुड़ गए। यहां मनीकंट्रोल में बिजनेस आइडिया जैसा कॉलम लगातार 7 साल तक लिखे। यहां पर्सनल फाइनेंस, राजनीति समाचार, ट्रेडिंग न्यूज, हेल्थ, इकोनॉमिक, जैसे कई कैटेगरी की खबरों पर कलम की घिसाई की। जितेंद्र सिंह उन चुनिंदा पत्रकारों की लिस्ट में शामिल हैं, जिन्होंने जनरल एंटरटेनमेंट चैनल (GEC) और न्यूज दोनों जगह काम किए हों। दरअसल, मुंबई एंटरटेनमेंट और बिजनेस दोनों है। लिहाजा वहां रहकर दोनों जगह काम करने का मौका मिला। पत्रकारिता में 18 साल से ज्यादा का अनुभव है। अब लाइव मिंट के मिंट हिंदी से जुड़कर काम कर रहे हैं। यहां हर विषय लिखने का क्रम जारी है।
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