टैरिफ पर भारत ने दबा दी अमेरिका की कमजोर नस, दाल डील के लिए दिल्ली दौड़े अमेरिकी सिनेटर

भारत और अमेरिका के बीच चल रहे 'टैरिफ वॉर' ने एक नया मोड़ ले लिया है। एक तरफ अमेरिकी किसान भारतीय थाली में 'दाल' परोसने के लिए बेताब हैं, तो दूसरी तरफ शोध बताते हैं कि ट्रंप सरकार के भारी टैक्स का बोझ खुद अमेरिकी जनता की जेब पर पड़ रहा है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड21 Jan 2026, 11:36 AM IST
भारत से अपील करने दिल्ली दौड़े आए अमेरिकी सिनेटर स्वी डेन्स
भारत से अपील करने दिल्ली दौड़े आए अमेरिकी सिनेटर स्वी डेन्स

अमेरिका के मोंटाना और नॉर्थ डकोटा जैसे राज्यों के किसान अब भारत के विशाल दाल बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहे हैं। अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स ने हाल ही में भारत का दौरा कर विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ लंबी बैठकें कीं। उन्होंने इन मुलाकातों में एक ही मांग की कि भारत अमेरिकी दालों, विशेषकर पीली मटर और मसूर पर लगाए गए भारी आयात शुल्क को कम करे। मोंटाना अमेरिका में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक है और भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता, ऐसे में यह सौदा अमेरिकी किसानों के लिए किसी 'गोल्ड माइन' से कम नहीं है।

भारत का 'खामोश पलटवार' और 30% का झटका

कहानी सिर्फ अमेरिकी दबाव की नहीं है, बल्कि भारत के 'साइलेंट स्ट्राइक' की भी है। ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाने के जवाब में भारत ने 1 नवंबर, 2025 से अमेरिकी पीली मटर पर 30% का आयात शुल्क चुपचाप लागू कर दिया। यह कदम न केवल जवाबी कार्रवाई है, बल्कि भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करने की एक 'रेड लाइन' भी है। भारत के लिए दालें सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं।

कील इंस्टीट्यूट का खुलासा- ट्रंप ने टैरिफ से किया 'सेल्फ गोल'

जर्मनी के प्रसिद्ध 'कील इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमी' के एक ताजा शोध पत्र ने ट्रंप के दावों की हवा निकाल दी है। शोध के अनुसार, अमेरिका ने जो भारी टैरिफ लगाया है, उसका 96% बोझ खुद अमेरिकी नागरिकों और आयातकों को उठाना पड़ रहा है। भारतीय निर्यातकों ने अपनी कीमतें कम करने के बजाय अमेरिका को होने वाली सप्लाई में 18-24% की कटौती कर दी है। सरल शब्दों में कहें, तो टैक्स विदेशी कंपनियों ने नहीं, बल्कि अमेरिकी जनता ने बढ़ी हुई कीमतों के रूप में चुकाया है।

भारतीय रत्न और आभूषण क्षेत्र पर संकट के बादल

हालांकि टैरिफ का बोझ अमेरिकियों पर है, लेकिन भारतीय निर्यात भी अछूता नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2025 में अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में गिरावट आई है। विशेष रूप से रत्न और आभूषण क्षेत्र को बड़ा झटका लगा है, जहां अप्रैल से दिसंबर के बीच निर्यात में 44% से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। सूरत के हीरा उद्योग और देश के एमएसएमई (MSME) सेक्टर के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण समय है, क्योंकि अमेरिका इनका सबसे बड़ा बाजार रहा है।

रणनीतिक स्वायत्तता या समझौता?

आने वाले समय में भारत और अमेरिका के बीच एक 'मिनी ट्रेड डील' की संभावना बनी हुई है, लेकिन राह आसान नहीं है। जहां अमेरिकी सीनेटर कृषि बाजार तक पहुंच चाहते हैं, वहीं भारत अपने किसानों की सुरक्षा और घरेलू महंगाई को लेकर सतर्क है। भारत अब यूएई, ऑस्ट्रेलिया और ओमान जैसे देशों के साथ नए मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के जरिए अपने बाजार का विस्तार कर रहा है, ताकि अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम कर सके।

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