
Rubix State of the states report 2026 : अगर आप सोचते हैं कि भारत की आर्थिक ताकत सिर्फ मुंबई, अहमदाबाद, बेंगलुरु, दिल्ली जैसी बड़ी-बड़ी जगहों में सिमटी है, तो रूबिक्स डेटा साइंसेज की ताजा रिपोर्ट आपकी इस धारणा को बदल देगी। वित्त वर्ष 2014-15 से 2023-24 के आंकड़े एक नई कहानी कह रहे हैं कि निवेश का पुराना किला दरक रहा है। गुजरात, जो कभी नए निवेश में 31 फीसदी हिस्सेदारी रखता था, अब 18 फीसदी पर आ गया है। उसकी जगह तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और ओडिशा ले रहे हैं।
कर्नाटक और तेलंगाना ने पूंजी दक्षता में वह मुकाम हासिल किया है जो देश में बिरले ही राज्य कर पाते हैं। और पूर्वोत्तर? वह अपनी छोटी अर्थव्यवस्था के बावजूद सामाजिक खर्च में पूरे देश को पीछे छोड़ रहा है। यह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के आर्थिक भविष्य का नया नक्शा है।
भारत की स्थिर पूंजी (फिक्स्ड कैपिटल स्टॉक) अब भी पश्चिम में काफी हद तक केंद्रित है, जहां वित्त वर्ष 2023-24 में इसका हिस्सा 33 फीसदी रहा। हालांकि नए निवेश का रुझान एक अलग तस्वीर पेश करता है। ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (जीएफसीएफ) के रुझान बताते हैं कि निवेश का भौगोलिक संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है। नए निवेश में गुजरात की प्रमुख हिस्सेदारी 31 फीसदी से घटकर 18 फीसदी हो गई है, जबकि तमिलनाडु, ओडिशा और उत्तर प्रदेश ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है।
पूंजी की दक्षता के लिहाज से कर्नाटक और तेलंगाना ने वित्त वर्ष 2023-24 में निवेशित पूंजी के मुकाबले उत्पादक पूंजी का अनुपात (प्रोडक्टिव कैपिटल टू इन्वेस्टेड कैपिटल रेशियो) 100 फीसदी से अधिक दर्ज किया। यह तेज आर्थिक सक्रियता और निजी क्षेत्र की मजबूत भागीदारी का एक दुर्लभ संकेतक है। गुजरात और महाराष्ट्र अब भी भारत के औद्योगिक केंद्र बने हुए हैं, लेकिन पूंजी निर्माण की अगली लहर अन्य राज्यों में फैल रही है।
एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष में यह सामने आया है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र ने सभी क्षेत्रों में जीडीपी के अनुपात में सामाजिक क्षेत्र पर सबसे अधिक खर्च दर्ज किया है। यह वित्त वर्ष 2014-15 के लगभग 15.1 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 16.4 फीसदी हो गया है। मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश ने क्रमश: जीडीपी के 28.5 फीसदी और 25.3 फीसदी के साथ सामाजिक खर्च में अग्रणी स्थान हासिल किया।
हालांकि पूर्वोत्तर की अर्थव्यवस्थाएं अपेक्षाकृत छोटी हैं, जिससे कुल खर्च की मात्रा सीमित रहती है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण पर इनकी वित्तीय प्रतिबद्धता भारत में सबसे अधिक है, जिसे पीएम-डिवाइन (PM-DevINE) जैसी केंद्रीय योजनाओं का समर्थन मिला है। इसके विपरीत, अपने बड़े आर्थिक आकार के बावजूद दक्षिण और पश्चिम क्षेत्र जीडीपी के अनुपात में सामाजिक क्षेत्र पर अपेक्षाकृत कम खर्च करते हैं। इससे पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों की विकास की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
दक्षिण ने वित्त वर्ष 2024-25 में पर्सनल लोन में 35 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा हिस्सा बनाए रखा। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु इस मामले में शीर्ष राज्यों में शामिल रहे। हालांकि पश्चिम का हिस्सा 22 फीसदी से बढ़कर 27 फीसदी हो गया। इससे खुदरा कर्ज की तेज होती पहुंच का पता चलता है। औद्योगिक कर्ज के मामले में महाराष्ट्र ने वित्त वर्ष 2024-25 में 25 फीसदी हिस्सेदारी के साथ अग्रणी स्थान बनाए रखा।
हालांकि अन्य राज्यों में क्रेडिट मार्केट के विस्तार के कारण इसका वर्चस्व धीरे-धीरे कम हो रहा है। पर्सनल लोन में शीर्ष 10 राज्यों ने मिलकर वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 72 फीसदी योगदान दिया। यह बताता है कि कर्ज के मामले में क्षेत्रवार आधार पर अधिक संतुलित नीतियों की आवश्यकता है।
रूबिक्स रिपोर्ट सीरीज का पहला और तीसरा आर्टिकल नीचे पढ़ें।
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