
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में तीन देशों के दौरे के दौरान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करने की कोशिश की। इस दौरे में मिसाइल, यूरेनियम, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा, रक्षा और खेल सहयोग जैसे कई अहम समझौते किए गए। यह ऐसे समय में हुआ है जब चीन इस क्षेत्र में अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत लगातार बढ़ा रहा है और अमेरिका अपने सहयोगी देशों से सुरक्षा की ज्यादा जिम्मेदारी उठाने को कह रहा है।
हाल के हफ्तों में प्रधानमंत्री मोदी ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के कई देशों के साथ संबंध मजबूत किए हैं। भारत ने इंडोनेशिया को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बेचने का समझौता किया। वहीं ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा, ऊर्जा, यूरेनियम, क्रिटिकल मिनरल्स और तकनीकी सप्लाई चेन से जुड़े कई समझौतों पर सहमति बनी।
यह दौरा ऐसे समय में हुआ जब चीन ने मोदी के इंडोनेशिया पहुंचने से एक दिन पहले प्रशांत महासागर में परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। इस परीक्षण पर कई देशों ने चिंता जताई और इसे चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों का संकेत माना।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुई बैठक में भी चीन के इस मिसाइल परीक्षण का मुद्दा उठा। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के तेजी से उभरने के कारण इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का रणनीतिक माहौल बदल रहा है। इसी वजह से कई देश आपसी सहयोग बढ़ा रहे हैं ताकि वे अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों की बेहतर रक्षा कर सकें।
एशिया ग्रुप के इंडिया चेयर अशोक मलिक के मुताबिक, अमेरिका की भूमिका पहले की तुलना में कुछ कम होती दिख रही है। ऐसे में जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत जैसे देश सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, समुद्री सुरक्षा और रक्षा जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं ताकि चीन और अमेरिका दोनों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता कम हो सके।
न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने भी कहा कि अब छोटे-छोटे बहुपक्षीय समूह बन रहे हैं, जिनमें समान सोच वाले देश अपने साझा हितों के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चीन के साथ जहां सहयोग संभव है वहां सहयोग किया जाएगा, लेकिन जहां मतभेद हैं वहां अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा भी की जाएगी।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने सहयोगी देशों से क्षेत्रीय सुरक्षा में ज्यादा योगदान देने की बात लगातार कह रहे हैं। अमेरिका ने अपने कई सहयोगी देशों पर टैरिफ भी लगाए हैं, जिससे क्षेत्रीय देशों के बीच नई रणनीतिक साझेदारियों की जरूरत और बढ़ गई है।
मोदी के इस दौरे का एक बड़ा उद्देश्य भारत की ऊर्जा और औद्योगिक सुरक्षा को मजबूत करना भी था। ऑस्ट्रेलिया ने भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए यूरेनियम की आपूर्ति बढ़ाने पर सहमति दी है। इसके अलावा दोनों देशों ने कोयला, गैस, क्रिटिकल मिनरल्स और नई तकनीक से जुड़ी सप्लाई चेन विकसित करने पर भी काम शुरू किया है।
ऑस्ट्रेलिया के रक्षा उद्योग मंत्री पैट कॉनरॉय ने कहा कि भारत को दिया जाने वाला यूरेनियम केवल शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों के लिए ऐतिहासिक बताया और कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और वैश्विक स्तर पर सकारात्मक भूमिका निभाने वाला देश है।
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही क्वाड समूह के जरिए रक्षा, समुद्री सुरक्षा और मजबूत सप्लाई चेन पर मिलकर काम कर रहे हैं। अब ऊर्जा सुरक्षा भी इस साझेदारी का अहम हिस्सा बनती जा रही है। ईरान से जुड़े हालिया संघर्ष ने भारत जैसे देशों को यह एहसास कराया है कि केवल पश्चिम एशिया पर ऊर्जा के लिए निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।
हालांकि भारत इंडो-पैसिफिक देशों के साथ अपनी साझेदारी लगातार मजबूत कर रहा है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र के लिए जरूरी मशीनों, उपकरणों और विशेष रूप से रेयर अर्थ मिनरल्स के मामले में वह अभी भी काफी हद तक चीन पर निर्भर है। यही वजह है कि नई दिल्ली एक तरफ अपने रणनीतिक साझेदारों का दायरा बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ रिश्तों में भी धीरे-धीरे सुधार की कोशिश कर रही है।
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