
Paras Defence: भारतीय सेना अब एक ऐसा पोर्टेबल हथियार खरीदने जा रही है जो 3 किलोमीटर तक दुश्मन ड्रोन को जाम कर सकता है। इस टेक्नोलॉजी को तैयार किया है देशी डिफेंस कंपनी Paras Defence and Space Technologies Ltd ने। करीब ₹25 करोड़ ($3 मिलियन) की डील जल्द ही साइन हो सकती है, जो रक्षा मंत्रालय की आपातकालीन खरीद योजना के तहत आएगी।
इस मामले से जुड़े तीन लोगों ने मिंट से बातचीत में बताया कि यह डील जल्द फाइनल हो सकती है। यह फैसला अप्रैल में पाकिस्तान के खिलाफ हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद लिया गया है।
कंपनी ने जुलाई में अपने बनाए Chimera 200 जैमर का सफल फील्ड टेस्ट किया था। यह डिवाइस दिखने में एक ऑफिस ब्रिफकेस जितना छोटा है, लेकिन इसकी रेंज और असर काफी बड़ा है। इसे Centum Electronics के साथ मिलकर तैयार किया गया है। कंपनी के डायरेक्टर अमित महाजन ने बताया कि सेना को इसके 20 यूनिट्स सप्लाई किए जाएंगे, जो पहले ही वेटरन सैनिकों के सामने अपनी क्षमता दिखा चुके हैं।
पारस डिफेंस को इसका पहला इंटरनेशनल ऑर्डर 1 जुलाई को फ्रांस की Cerbair कंपनी से मिला था। यह ऑर्डर करीब ₹21 करोड़ का था। कंपनी के डायरेक्टर अमित महाजन ने बताया कि एक जैमर की कीमत ₹1.13 करोड़ है। उन्होंने कहा कि अभी तक इस प्रोडक्ट की मार्केटिंग नहीं की गई, लेकिन बढ़ते खतरे और टेक्नोलॉजी की जरूरत के चलते डिमांड खुद बन रही है।
भारतीय सेना और वायुसेना लंबे समय से ऐसे हल्के और तेज एयर डिफेंस सिस्टम की तलाश में हैं। अब जब आपातकालीन खरीद की सुविधा मिल रही है, तो अगले तीन महीने में डील फाइनल हो सकती है। जानकारों के मुताबिक, भारत के एयर डिफेंस सिस्टम में भारी हथियार तो हैं जो असरदार हैं, लेकिन उनमें फुर्ती की कमी है। ऐसे में पारस डिफेंस का पोर्टेबल ड्रोन जैमर काम आएगा। ये छोटे आकार का है और चौड़ी तरंगों की रेंज से दुश्मन ड्रोन को पकड़कर जाम कर सकता है। यानी जहां भारी सिस्टम पहुंचने में वक्त लेते हैं, वहां ये जैमर तेजी से तैनात होकर तुरंत असर दिखा सकता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारी सिस्टम जैसे S-400 बड़े युद्ध के लिए हैं, लेकिन आज के दौर में छोटे, स्मार्ट और जल्दी तैनात होने वाले सिस्टम की जरूरत है।
Paras Defence ने 2009 में अपनी मौजूदा पहचान के साथ शुरुआत की थी और आज ये देश की चुनिंदा कंपनियों में है जो खुद डिजाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग करती है। कंपनी अपने पोर्टेबल ड्रोन जैमर जैसे प्रोडक्ट महाराष्ट्र की दो यूनिट्स में बनाती है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स के लिए Centum Electronics जैसे घरेलू पार्टनर से मदद लेती है। 2024-25 में Paras ने ₹334 करोड़ की कमाई और ₹21 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया था। कंपनी को उम्मीद है कि 2025-26 में ये आंकड़ा ₹500 करोड़ पार कर जाएगा, क्योंकि उसे रक्षा मंत्रालय और जापान जैसे देशों से लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। इसके पास ₹1,000 करोड़ का ऑर्डर बुक पहले से है और कई बड़ी डील्स पाइपलाइन में हैं।
गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद केंद्र ने तीनों सेनाओं के लिए छठा इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट फेज मंजूर किया है, जिसमें कुल $4.5 बिलियन (करीब ₹3.76 लाख करोड़) खर्च होंगे। हर डील का अनुमान $35 मिलियन (करीब ₹292 करोड़) तक है। ऐसे इमरजेंसी प्रोग्राम पहले 2016 के उरी हमले और 2020 के गलवान झड़प के बाद भी हुए थे।
Paras Defence अकेली कंपनी नहीं है- DRDO, BEL, Adani Defence जैसी कंपनियां भी ड्रोन डिफेंस टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं। सरकार ने ₹37,000 करोड़ का इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट-6 फंड जारी किया है, जिसमें हर डील की सीमा ₹300 करोड़ तक हो सकती है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि जब तक कोई टेक्नोलॉजी फील्ड में साबित नहीं होती, तब तक उस पर डील करना मुश्किल होता है। इसलिए Paras जैसे घरेलू कंपनियों को प्रैक्टिकल असर दिखाना जरूरी है। इजरायल जैसे देशों की टेक्नोलॉजी पहले से ही फील्ड में साबित हो चुकी है, इसलिए भारत को भी प्रूवन सिस्टम की तरफ बढ़ना होगा।
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