रेलवे का मेगा प्लान: 1.5 लाख करोड़ से बनेंगे 3 नए फ्रेट कॉरिडोर, बजट में मिल सकती है मंजूरी

Indian Railways new freight corridors: भारतीय रेलवे माल ढुलाई की क्षमता बढ़ाने के लिए 1.5 ट्रिलियन रुपये के तीन नए कॉरिडोर बनाने की तैयारी कर रहा है। इसका मकसद 2030 तक रेलवे का फ्रेट शेयर 45% करना है। पूर्वी तट कॉरिडोर को प्राथमिकता मिल सकती है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड12 Dec 2025, 06:11 PM IST
भारतीय रेल के लिए तीन और फ्रेट कॉरिडोर का प्रस्ताव (सांकेतिक तस्वीर)
भारतीय रेल के लिए तीन और फ्रेट कॉरिडोर का प्रस्ताव (सांकेतिक तस्वीर)(AFP)

Dedicated freight corridor: भारतीय रेलवे माल ढुलाई को एक नई रफ्तार देने के लिए बड़ी तैयारी कर रहा है। रेलवे लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये की लागत से तीन नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) बनाने की योजना बना रहा है। इन कॉरिडोर के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार हो चुकी है और अभी इसकी जांच चल रही है।

कौन से हैं ये तीन नए कॉरिडोर?

रेलवे ने देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने के लिए तीन प्रमुख रूट तय किए हैं। इनमें पहला 1,115 किलोमीटर लंबा पूर्वी तट कॉरिडोर है, जो खड़गपुर से विजयवाड़ा को जोड़ेगा। दूसरा प्रस्ताव 1,673 किलोमीटर लंबे ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर का है, जो भुसावल और दनकुनी के बीच बनेगा। वहीं, तीसरा 975 किलोमीटर लंबा नॉर्थ-साउथ सब-कॉरिडोर है, जो विजयवाड़ा, नागपुर और इटारसी को कनेक्ट करेगा।

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तीन नए फ्रेट कॉरिडोर का प्रस्ताव (AI Generated Graphic)
(Google Notebook LM)
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बजट में मिल सकता है ग्रीन सिग्नल

इन तीनों में से कम से कम एक कॉरिडोर को हरी झंडी मिलने की उम्मीद है। इसका फैसला तकनीकी पहलुओं, ट्रैफिक की क्षमता और फंड की उपलब्धता के आधार पर होगा। माना जा रहा है कि आगामी केंद्रीय बजट में इस प्रस्ताव को शामिल किया जा सकता है। इसमें वित्तीय वर्ष 2027 के लिए सांकेतिक तौर पर फंड अलॉट किया जा सकता है।

मौजूदा कॉरिडोर को मिलेगी मजबूती

ये नए प्रोजेक्ट पहले से मौजूद 1,337 किलोमीटर लंबे पूर्वी और 1,506 किलोमीटर लंबे पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के काम को और आसान बनाएंगे। पश्चिमी कॉरिडोर का करीब 1,404 किलोमीटर हिस्सा शुरू हो चुका है। वैतरणा से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) तक का बचा हुआ 102 किलोमीटर का हिस्सा भी जल्द ही शुरू होने वाला है।

माल ढुलाई में हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य

रेलवे मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 1990 के दशक में देश की कुल माल ढुलाई में रेलवे की हिस्सेदारी 60% से ज्यादा थी। साल 2020 में यह घटकर लगभग 25% रह गई थी। हालांकि, डेडिकेटेड कॉरिडोर बनने के बाद यह हिस्सेदारी थोड़ी बढ़कर 27% हुई है। 'नेशनल रेल प्लान' के तहत सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक इसे बढ़ाकर 45% तक पहुंचाया जाए।

बढ़ता लॉजिस्टिक्स मार्केट और पूर्वी तट पर फोकस

यह योजना भारत के बढ़ते लॉजिस्टिक्स मार्केट को ध्यान में रखकर बनाई गई है। ग्लोबल रिसर्च फर्म 'मॉर्डोर इंटेलिजेंस' का अनुमान है कि भारत का फ्रेट और लॉजिस्टिक्स मार्केट 2025 में 350 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 550 अरब डॉलर हो जाएगा। इसमें पूर्वी तट कॉरिडोर को प्राथमिकता मिलने के आसार हैं, क्योंकि यह रेलवे की कमाई में सबसे ज्यादा योगदान दे सकता है। यह रूट पूर्वी क्षेत्र के बंदरगाहों और ओडिशा-छत्तीसगढ़ से खनिजों के ट्रांसपोर्ट के लिए बहुत अहम है।

लागत और समय सीमा

रेलवे का टारगेट है कि काम शुरू होने के पांच से सात साल के भीतर इस प्रोजेक्ट को पूरा कर लिया जाए। पूर्वी तट वाले खंड के लिए अनुमानित लागत 40,000 से 50,000 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है।

नई लाइनों की बजाय अपग्रेडेशन पर हो जोर

हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स की राय इससे अलग है। उनका कहना है कि मौजूदा डीएफसी लगभग तैयार हैं और वहां रोज 300-350 ट्रेनें चल रही हैं, जबकि क्षमता 480 ट्रेनों की है। इसके बावजूद माल ढुलाई या रेवेन्यू में कोई भारी उछाल नहीं आया है। पिछले वित्तीय वर्ष में माल ढुलाई में सिर्फ 1.7% की बढ़ोतरी हुई, जो मुख्य रूप से कोयले की ढुलाई के कारण थी।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि रेलवे को नए फ्रेट कॉरिडोर में पैसा लगाने के बजाय हाई-स्पीड पैसेंजर कॉरिडोर बनाने चाहिए। साथ ही, मौजूदा पटरियों को अपग्रेड करना चाहिए ताकि यात्री ट्रेनें 120 किमी/घंटा और मालगाड़ियां 100 किमी/घंटा की रफ्तार से चल सकें। इससे दोनों तरह की ट्रेनों की गति का अंतर कम होगा और माल ढुलाई समय पर हो सकेगी।

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