खरबों रुपये का निवेश और करीब 5 करोड़ नौकरियां! ग्रीन इकॉनमी में इतना बड़ा मौका लपक पाएगा भारत?

भारत की ग्रीन इकोनॉमी 2047 तक 4.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश लाने के साथ 4.8 करोड़ पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां सृजित कर सकती है। यह कहना है काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) का जिसने एक स्टडी रिपोर्ट में इस बारे में विस्तार से बात की है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड26 Nov 2025, 05:56 PM IST
भारत की ग्रीन इकोनॉमी 2047 तक 4.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश लाने के साथ 4.8 करोड़ पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां सृजित कर सकती है: सीईईडब्ल्यू
भारत की ग्रीन इकोनॉमी 2047 तक 4.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश लाने के साथ 4.8 करोड़ पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां सृजित कर सकती है: सीईईडब्ल्यू( Shutterstock)

भारत में पर्यावरण अनुकूल उपायों में निवेश के बड़े मौके हैं जिनसे करोड़ों की संख्या में नौकरियां भी मिल सकती हैं। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने एक रिपोर्ट में बताया है कि भारत संचयी हरित निवेशों (cumulative green investments) में 360 लाख करोड़ रुपये (4.1 ट्रिलियन डॉलर) को आकर्षित करने और 4.8 करोड़ पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां सृजित करने की संभावना रखता है।

भारत के पास ग्रीन इकॉनमी में बहुत बड़ा मौका

सीईईडब्ल्यू (CEEW) का नया अध्ययन 'बिल्डिंग अ ग्रीन इकोनॉमी फॉर विकसित भारत' बताता है कि भारत 2047 तक सालाना 97.7 लाख करोड़ रुपये (1.1 ट्रिलियन डॉलर) की ग्रीन मार्केट की संभावनाएं खोल सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर यह अपनी तरह का पहला आकलन है, जो ऊर्जागत परिवर्तन (एनर्जी ट्रांजिशन), सर्कुलर इकोनॉमी और बायो-इकोनॉमी एवं प्रकृति-आधारित समाधानों (nature based solutions) में 36 ग्रीन वैल्यू चेन्स को चिन्हित करता है। ये संयुक्त रूप से विकसित भारत की यात्रा के लिए एक परिभाषित हरित आर्थिक अवसरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भारत का ग्रीन ट्रांजिशन मूल रूप से सकारात्मक है। यह लाखों नौकरियां सृजित कर सकता है, विकास को रफ्तार दे सकता है, सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार ला सकता है और घरेलू ऊर्जा स्रोतों को अपनाकर राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बना सकता है। सीईईडब्ल्यू के इस अध्ययन में चिन्हित मूल्य श्रृंखलाएं बताती हैं कि ये खरबों डॉलर के अवसर कहां पर मौजूद हैं। भूमि जैसी बाधाओं को दूर करने के लिए नीतिगत स्थिरता और निवेश को जोखिम मुक्त बनाने के लिए अब मिश्रित वित्त (blended finance) के उपाय आवश्यक हैं। समग्र-सरकार दृष्टिकोण (whole-of-government approach) के साथ भारत ग्रीन फ्रंटियर वाले विकास मॉडल के संचालन के लिए आवश्यक पूंजी को जुटा सकता है।- जयंत सिन्हा, पूर्व केंद्रीय मंत्री

इन क्षेत्रों में भारत के पास करोड़ों रोजगार के मौके

अक्सर ग्रीन इकोनॉमी को सिर्फ सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित मान लिया जाता है। हालांकि, यह अध्ययन इसमें मौजूद व्यापक अवसरों को रेखांकित करता है। ये अवसर जैव-आधारित सामग्री (bio based material), कृषि वानिकी (agroforestry), हरित निर्माण (green construction), सतत पर्यटन (sustainable tourism), चक्रीय विनिर्माण (circular manufacturing), कचरे से कंचन उद्योग (waste to value industry) और प्रकृति आधारित आजीविकाओं (nature-based livelihoods) तक विस्तृत हैं। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र अगले दो दशकों में अरबों डॉलर के उद्योग बन सकते हैं और संसाधन सुरक्षा और लचीलेपन को भी मजबूत बना सकते हैं।

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भारत के पास ग्रीन इकोनॉमी में बड़ा मौका।
(CEEW Press Release)

सीईईडब्ल्यू (CEEW) के विश्लेषण की प्रमुख बातें

  • अकेले ऊर्जा परिवर्तन 1.66 करोड़ पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां सृजित कर सकता है, और अक्षय ऊर्जा, भंडारण, विकेंद्रीकृत ऊर्जा एवं क्लीन मैन्युफैक्चरिंग में 3.79 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश आकर्षित कर सकता है। ग्रीन इकोनॉमी में इलेक्ट्रिक मोबलिटी सबसे बड़ा न्योक्ता होगा, जिसका ऊर्जा परिवर्तन से जुड़ी कुल नौकरियों में 57 प्रतिशत से अधिक हिस्सा होगा।
  • जैव-अर्थव्यवस्था (Bio-economy) और प्रकृति-आधारित समाधान भारत के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में 2.3 करोड़ नौकरियां सृजित कर सकते हैं और बाजार मूल्य में 415 अरब अमेरिकी डॉलर का दरवाजा खोल सकते हैं। इस क्षेत्र में सर्वाधिक नौकरियां देने वाले वैल्यू चेन्स में रासायन-मुक्त खेती और बायो-इनपुट (72 लाख पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां), कृषि वानिकी एवं सतत वन प्रबंधन (47 लाख पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां), और आर्द्रभूमि प्रबंधन (37 लाख पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां) शामिल हैं।
  • सर्कुलर इकोनॉमी सालाना 132 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक मूल्य सृजित कर सकती है और कचरा संग्रहण (waste collection), पुनर्चक्रण (recycling), मरम्मत (repairing), नवीनीकरण (refurbishing) और सामग्री पुनर्प्राप्ति (material recovery) में 84 लाख पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां सृजित कर सकती है। इनमें से 76 लाख पूर्णकालिक समतुल्य नौकरियां कचरे से जुड़ी गतिविधियों से उत्पन्न होंगी, जिनमें संग्रहण, छंटाई, एकत्रीकरण, रीसाइक्लिंग संचालन और अंतिम-सिरे तक संसाधन की पुनर्प्राप्ति जैसी भूमिकाएं शामिल हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पर औपचारिक व्यवस्था आने पर वेतन और काम करने की स्थितियों में सुधार देखा जा सकता है।

भारत को दूर करनी होंगी हरित अर्थव्यवस्था की ये बाधाएं

सीईईडब्ल्यू (CEEW) अध्ययन बताता है कि प्रारंभिक अवस्था वाले क्षेत्रों के लिए पूंजी की लागत घटाने, कच्ची एवं रीसाइकिल्ड सामग्री पाने के लिए सप्लाई चेन्स को सुधारने, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और नवाचार को मजबूत बनाने, तकनीकी रूप से कुशल कार्यबल तैयार करने और उभरती हरित प्रौद्योगिकियों (emerging green technologies) के लिए विश्वसनीय उत्पाद मानक स्थापित करने जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। ग्रीन वैल्यू चेन्स का मुख्यधारा की आर्थिक नियोजन में एकीकरण के लिए मंत्रालयों, राज्य सरकारों, उद्योग, वित्त और स्थानीय संस्थानों के बीच तालमेल आधारित प्रयास अत्यंत जरूरी होगा।

सीईईडब्ल्यू (CEEW) का विश्लेषण रेखांकित करता है कि भारत के ग्रीन इकोनॉमिक ट्रांजिशन के लिए महिलाओं की भागीदारी बहुत जरूरी होगी। इस अध्ययन में जेंडर-रिस्पॉन्सिव स्किलिंग, सुदूर कार्यस्थलों के लिए सुरक्षित आवागमन, बेहतर वेतन और महिलाओं के नेतृत्व वाली ग्रीन इंटरप्राइजेज के लिए समर्पित वित्तीय उपायों का सुझाव दिया गया है।

ग्रीन इकोनॉमी की दिशा में आगे बढ़ना भारत के लिए न केवल नौकरियां और आर्थिक समृद्धि लाएगा, बल्कि हमें आत्मनिर्भर बनाने के लिए भविष्य के ईंधन और संसाधनों को जुटाने में भी हमारी मदद करेगा। आज भारत अपनी जरूरत का 87 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा और अगली पीढ़ी के बायो-एथेनॉल एवं बायो-डीजल के साथ शून्य हो सकता है। हम अपनी जरूरत का 100 प्रतिशत लिथियम, निकेल और कोबाल्ट और यहां तक कि 93 प्रतिशत तांबे के अयस्क का आयात करते हैं, लेकिन सर्कुलर इकोनॉमी के साथ ये सभी आयात शून्य हो सकते हैं। हम उर्वरक आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं - हमारा पूरा पोटाश आयात किया जाता है, और 88 प्रतिशत यूरिया प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आयात पर निर्भर है। कृषि के लिए बायो-इनपुट और बड़े पैमाने पर बायो-इकोनॉमी के साथ, हम अपनी खाद्य और संसाधनों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। भारत के लिए, ग्रीन एक विकल्प नहीं है; बल्कि अनिवार्यता है।- अभिषेक जैन, डायरेक्टर, ग्रीन इकोनॉमी एंड इम्पैक्ट इनोवेशन, सीईईडब्ल्यू

राज्य सरकारों ने शुरू कर दी पहल

राज्य सरकारें पहले से ही ग्रीन इकोनॉमी के निर्माण की दिशा में कदम उठाने की शुरुआत कर चुकी हैं। उदाहरण के लिए, ओडिशा ने ग्रीन इकोनॉमी काउंसिल और 16 विभागीय सचिवों को शामिल करते हुए एक समिति का गठन किया है, ताकि आर्थिक नियोजन में ग्रीन वैल्यू चेन्स को शामिल करने और हरित-नेतृत्व वाले विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा सके। यह दर्शाता है कि राज्य स्तर पर मिशन-उन्मुख प्रशासन कैसे भारत के ग्रीन इकोनॉमी ट्रांजिशन को गति दे सकते हैं।

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