
FASTag new rule update: बीमा कंपनियों ने अब टोल कलेक्शन इकोसिस्टम में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है। उन्होंने केंद्र सरकार के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि उन्हें भी वाहनों के लिए FASTag स्टिकर जारी करने की अनुमति दी जाए।
इसके लिए बीमा उद्योग के कुछ बड़े अधिकारियों ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अधिकारियों के साथ निजी तौर पर बातचीत भी की है। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले एक साल से FASTag लेनदेन की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है।
बीमा उद्योग के अधिकारियों ने मंत्रालय से मुलाकात करके उन्हें अपनी बात से अवगत कराया है। उनकी मुख्य मांग है कि उन्हें भी फास्टैग स्टिकर जारी करने की मंजूरी दी जाए। अपनी मांग के समर्थन में उन्होंने तर्क दिया है कि किसी भी वाहन के पूरे जीवन चक्र में बीमा क्षेत्र की बड़ी भूमिका होती है।
बीमा कंपनियों के पास पहले से ही सार्वजनिक धन को संभालने का लाइसेंस होता है। इस वजह से फास्टैग जारी करने का अधिकार सामान्य बीमा कंपनियों तक भी बढ़ाया जा सकता है। ये बातचीत अभी शुरुआती स्टेज में हैं।
अभी टोल भुगतान के लिए वाहनों पर फास्टैग स्टिकर या RFID टैग का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके माध्यम से डिजिटली टोल का कलेक्शन होता है।
कौन जारी करता है: फिलहाल बैंकों को फास्टैंग स्टिकर जारी करने की अनुमति है। इसके अलावा, ऐमजॉन पे या पार्क प्लस जैसी कुछ फिनटेक कंपनियों ने भी स्टिकर वितरित करने के लिए आईसीआईसीआई बैंक और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक जैसे बैंकों के साथ पार्टनरशिप की है।
संचालन: भारत में फास्टैग का सिस्टम नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा चलाया जाता है। यह इंडियन हाईवे मैनेजमेंट कंपनी (IHMCL) के साथ पार्टनरशिप में नेशनल इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन प्लेटफॉर्म के तहत काम करता है, जिसे नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) का समर्थन प्राप्त है। तकनीकी रूप से देखें तो देश में डिजिटल टोल कलेक्शन सिस्टम केंद्र सरकार और एनपीसीआई मिलकर चलाते हैं।
जुलाई में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजमार्ग टोल भुगतान से अलग दूसरे पेमेंट मैकेनिजम में इसका कम उपयोग होने के कारण फास्टैग लेनदेन में ठहराव आया था। अक्टूबर 2025 में एनपीसीआई के डेटा के अनुसार, एनईटीसी सिस्टम पर 36 करोड़ लेनदेन रिपोर्ट किए गए थे।
इन लेनदेन में लगभग 6,600 करोड़ रुपये का निपटान हुआ था। वहीं, पिछले लगभग एक साल से यह संख्या इसी रेंज में बनी हुई है, यानी लेनदेन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। हालांकि, बीमा कंपनियों को इस सिस्टम में शामिल करने के लिए कई बार बातचीत और विचार-विमर्श की जरूरत होगी।
खास तौर पर नए जमाने की सामान्य बीमा कंपनियों के लिए यह कदम बहुत आकर्षक हो सकता है। वजह यह है कि मोटर या वाहन बीमा उनके बिजनेस का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु बेस्ड एको ने अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच 633 करोड़ रुपये के मोटर बीमा प्रीमियम का कारोबार किया।
इसी अवधि में उसका कुल बीमा प्रीमियम कलेक्शन 1,407 करोड़ रुपये था। गो डिजिट जेनरल इंश्योरेंस के लिए, इसी अवधि में मोटर प्रीमियम की रकम 3,865 करोड़ रुपये थी, जबकि उसका कुल प्रीमियम कलेक्शन 5,885 करोड़ रुपये रहा। यह दिखाता है कि वाहनों से जुड़ा कारोबार इन कंपनियों के लिए कितना अहम है।
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