
भारत में खेती-किसानी अब सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष से मिलने वाले डेटा से इसे नई दिशा मिल रही है। इसरो (ISRO) और अंतरिक्ष विभाग की विभिन्न परियोजनाओं ने फसलों की निगरानी और नुकसान के सटीक आकलन को आसान बना दिया है। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ रही है, बल्कि फसल बीमा जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता भी आई है।
इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र द्वारा महाराष्ट्र के परभनी में किए गए एक सर्वे में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। 2022-23 के खरीफ सीजन के दौरान सैटेलाइट डेटा के इस्तेमाल से सोयाबीन और कपास की पैदावार में 2% से 5% तक का सुधार देखा गया। इसके अलावा, सटीक जानकारी मिलने से किसानों की इनपुट लागत (input cost) में भी 5% से 10% की कमी आई है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत 'यस-टेक' पहल में अंतरिक्ष तकनीक के दखल से बड़ा वित्तीय बदलाव आया है। तकनीक के सही इस्तेमाल की वजह से बीमा का प्रीमियम रेट 17% से घटकर 12% पर आ गया है। अंतरिक्ष विभाग ने फसल कटाई प्रयोगोंके लिए 'स्मार्ट सैंपलिंग' तकनीक विकसित की है, जिससे मानवीय गलतियों की गुंजाइश कम हुई है और दावों का निपटारा तेजी से हो रहा है।
| क्षेत्र (Sector) | प्रभाव का विवरण (Impact Details) | मुख्य परिणाम (Key Outcomes) |
|---|---|---|
| किसान की आय | सोयाबीन और कपास जैसी नकदी फसलों की सटीक निगरानी और सलाह। | उत्पादकता में 2-5% तक का सुधार देखा गया। |
| लागत में कमी | खाद, पानी और कीटनाशकों के सटीक उपयोग के कारण। | खेती की लागत में 5-10% की कमी आई। |
| बीमा राहत | यस-टेक' प्रणाली के माध्यम से डेटा-आधारित निर्णय लेना। | बीमा प्रीमियम दर 17% से गिरकर 12% रह गई। |
| दावा निपटान | आपदा के समय सैटेलाइट साक्ष्यों का उपयोग करना। | प्राकृतिक आपदाओं के दौरान अधिक किसानों के दावों का पारदर्शी निपटारा। |
| सूखा प्रबंधन | एनएडीएएमएस (NADAMS) के जरिए समय पर चेतावनी। | सूखे की समय पर रिपोर्टिंग और राहत कार्यों में तेजी। |
इसरो ने फसल मानचित्रण (mapping) के लिए 'SASYA' नामक एक एआई आधारित टूल तैयार किया है, जो EOS-04 सैटेलाइट के डेटा का उपयोग करता है। इसके साथ ही, आलू की खेती की निगरानी के लिए 'IPCM' और फसल उपज के स्वचालित अनुमान के लिए 'Geo-Crest' जैसी प्रणालियां विकसित की गई हैं। ये सभी टूल्स अब सरकारी एजेंसियों और मंत्रालयों के लिए उपलब्ध हैं।
| प्रमुख अंतरिक्ष परियोजना | मुख्य उद्देश्य | लाभ / सकारात्मक प्रभाव |
|---|---|---|
| यस-टेक (YES-TECH) | पीएमएफबीवाई के तहत तकनीक-आधारित फसल उपज आकलन प्रणाली। | प्रीमियम दर 17% से घटकर 12% हो गई और दावा निपटान में पारदर्शिता आई। |
| एसएएसवाईए (SASYA) | ईओएस-04 के डेटा का उपयोग करके एआई-आधारित फसल मानचित्रण। | परिचालन एजेंसियों के लिए रीयल-टाइम फसल मानचित्रण डेटा उपलब्ध कराना। |
| जियोक्रेस्ट (Geo-Crest) | स्वचालित भू-स्थानिक फसल आकलन प्रणाली विकसित करना। | उपज अनुमानों के लिए सटीक और साक्ष्य-आधारित डेटा की उपलब्धता। |
| एनएडीएएमएस (NADAMS) | राष्ट्रीय कृषि सूखा आकलन और निगरानी। | कृषि सूखे की समय पर रिपोर्टिंग और जोखिम का सटीक मूल्यांकन। |
| चमन (CHAMAN) | बागवानी फसलों के क्षेत्रफल का उपग्रह-आधारित अनुमान। | बागवानी विस्तार के लिए उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान करना। |
| सुफलम (SUFALAM) | खाद्य सुरक्षा के लिए फसल उत्पादन, मूल्य पूर्वानुमान और सटीक कृषि। | सटीक खेती से उत्पादकता में 2-5% सुधार और इनपुट लागत में 5-10% की कमी। |
| स्मार्ट सैंपलिंग तकनीक | फसल कटाई प्रयोग (CCE) के स्थानों के चयन को वैज्ञानिक बनाना। | मैनुअल सीसीई पर निर्भरता कम हुई और आपदा के समय दावों का तेज निपटारा संभव हुआ। |
| एग्री स्टैक (Agri Stack) | कृषि क्षेत्र के डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करना। | 13 राज्यों को हाई-रिजॉल्यूशन इमेजरी उपलब्ध कराई गई। |
इसरो का EOS-04 (Earth Observation Satellite-04) कृषि निगरानी के लिए एक गेम-चेंजर साबित हुआ है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं।
सी-बैंड एसएआर डेटा (C-band SAR Data): यह सैटेलाइट सी-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) तकनीक का उपयोग करता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बादलों के होने पर भी या रात के समय भी स्पष्ट तस्वीरें ले सकता है, जो मानसून के दौरान फसल निगरानी के लिए बहुत जरूरी है।
फ्री डेटा एक्सेस: भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 के तहत, EOS-04 का डेटा सभी सरकारी उपयोगकर्ताओं के लिए पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध कराया गया है।
सटीक फसल मानचित्रण: इसका उपयोग 'एसएएसवाईए' (SASYA) नामक एआई-आधारित टूल में किया जाता है, जो फसलों का सटीक नक्शा तैयार करता है।
एकीकृत पोर्टल: इस सैटेलाइट के डेटा को एनआरएससी/इसरो के 'भू-निधि' पोर्टल के साथ एकीकृत किया गया है, जिससे परिचालन एजेंसियां आसानी से जानकारी प्राप्त कर सकती हैं।
उपयोग: इसका मुख्य इस्तेमाल फसल क्षेत्र के अनुमान, मिट्टी की नमी के आकलन और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की मैपिंग के लिए किया जा रहा है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में कृषि विकास के लिए कई प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं।
| परियोजना का नाम | जिम्मेदार मंत्रालय / वित्त पोषक एजेंसी | वित्तीय व्यय (बजट) | स्थिति |
|---|---|---|---|
| सुफलम (SUFALAM) चरण-II | रक्षा विभाग (DoD) | ₹15 करोड़ | जारी (नवंबर 2027 तक) |
| उपग्रह आधारित फसल उपज अनुमान (FASAL 2.0) | कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय | ₹340.52 लाख (अनुदान) | जारी (मार्च 2029 तक) |
| आलू की फसल की निगरानी (IPCM) | कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय | ₹258 लाख | जारी (मार्च 2028 तक) |
| पूर्वोत्तर कृषि आकलन (ASAAN) | DoNER मंत्रालय / उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) | ₹260 लाख | जारी (2025 तक) |
| पूर्वोत्तर बागवानी सहायता (SSDIH) | DoNER मंत्रालय / उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) | ₹240 लाख | पूरा हुआ (52 जिलों के लिए) |
| फसल सघनता (पूर्वी राज्य) | वायु सेना मंत्रालय (MoA) | ₹112 लाख | पूरा हुआ |
| फसल अवशेष से जैव ऊर्जा | विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) | ₹21 लाख | पूरा हुआ |
भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 के तहत, सरकार ने रिमोट सेंसिंग डेटा को सभी सरकारी उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त कर दिया है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि एग्री स्टैक (Agri Stack) परियोजना के तहत 13 राज्यों की हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी भी उपलब्ध कराई गई है ताकि कृषि के डिजिटल ढांचे को मजबूत किया जा सके।
एग्री स्टैक कृषि क्षेत्र में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की एक व्यापक परियोजना है। यह किसानों के डिजिटल रिकॉर्ड को सैटेलाइट डेटा के साथ जोड़ता है, ताकि उन्हें सटीक और व्यक्तिगत सेवाएं मिल सकें। इस पहल के तहत इसरो ने 13 राज्यों की हाई-रिजॉल्यूशन वाली सैटेलाइट इमेजरी उपलब्ध कराई है। इसका मुख्य उद्देश्य भूमि रिकॉर्ड, फसल विवरण और सरकारी योजनाओं के लाभ को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाकर पारदर्शिता बढ़ाना है।
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