अब कोल्हापुरी चप्पल में जुड़ेगा ये नया फीचर, असली-नकली में फर्क करना होगा आसान

Kohlapuri chappal: अब कोल्हापुरी चप्पल की असली-नकली पहचान करना आसान हो गया है। हर असली जोड़ी पर अब एक खास क्यूआर कोड होगा, जिसे स्कैन करके खरीदार कारीगर की पहचान, निर्माण की जगह, तकनीक और जीआई टैग की जानकारी जान सकेगा। इससे नकली चप्पलों की बिक्री पर रोक लगेगी।

एडिटेड बाय Priya Shandilya( विद इनपुट्स फ्रॉम भाषा)
पब्लिश्ड27 Jul 2025, 03:48 PM IST
अब असली-नकली कोल्हापुरी चप्पल कैसे पहचानें? क्यूआर कोड बताएगा सच्चाई
अब असली-नकली कोल्हापुरी चप्पल कैसे पहचानें? क्यूआर कोड बताएगा सच्चाई(Pinterest)

Kolhapuri Chappals to Get QR Codes: भारत के सबसे खास पारंपरिक शिल्पों में से एक कोल्हापुरी चप्पल, अब न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी दोबारा पॉपुलर हो रही है। हाल ही में एक इटैलियन ब्रांड प्राडा पर इन चप्पलों के डिजाइन का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा है।

अब चप्पल पर मिलेगा क्यूआर कोड

जटिल कारीगरी और सांस्कृतिक विरासत के लिए मशहूर ये हस्तनिर्मित चमड़े की सैंडल, जिसे जीआई टैग भी मिला है, अब क्यूआर कोड के साथ आएगी। इससे इसकी असलियत और सुरक्षा की एक लेयर और जुड़ जाएगी। ये मुमकिन हुआ है नई टेक्नोलॉजी और कानूनी बदलावों से।

क्या है उद्देश्य?

महाराष्ट्र के चमड़ा उद्योग विकास निगम (लिडकॉम) के अफसरों ने बताया कि इस कदम का मकसद है नकली कोल्हापुरी चप्पलों की बिक्री रोकना, हर प्रोडक्ट से कारीगर की पहचान जोड़ना, ग्राहकों का भरोसा बढ़ाना और पारंपरिक कारीगरों को बाजार में मजबूती देना।

प्राडा के डिजाइन पर विवाद

हाल ही में इटली के लक्जरी ब्रांड प्राडा ने अपने नए कलेक्शन में ऐसी सैंडल दिखाई जो कोल्हापुरी चप्पल जैसी लग रही थी। इस पर भारत के कारीगरों ने GI अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया और विरोध जताया था।

विवाद के बाद प्राडा ने माना कि उनके फैशन शो में जो सैंडल दिखी थी, वो भारतीय पारंपरिक चप्पल से इंस्पायर थी। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि वो डिजाइन अभी सिर्फ प्लानिंग में है और इसका प्रोडक्शन नहीं हुआ है। इसी महीने प्राडा की टीम कोल्हापुर आई थी और कारीगरों से बात की थी।

12वीं सदी से बन रही ये चप्पल

कोल्हापुरी चप्पलें 12वीं सदी से बनाई जा रही हैं। ये खास तौर पर कोल्हापुर, सांगली और सोलापुर जिलों में बनती हैं। इनका डिजाइन, नेचुरल चमड़े और हाथ से बुनी पट्टियों से तैयार होता है। पीढ़ियों से कारीगर इस कला को संभाले हुए हैं।

20वीं सदी की शुरुआत में छत्रपति शाहू महाराज ने इस चप्पल को बढ़ावा दिया। उन्होंने इसे आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का प्रतीक माना और इसके इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया, जिससे ये ग्रामीण शिल्प कुटीर उद्योग में तब्दील हुआ।

इस सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा और कारीगरों को सही पहचान दिलाने के लिए महाराष्ट्र और कर्नाटक की सरकारों ने मिलकर 2019 में कोल्हापुरी चप्पल को GI टैग दिलाया।

अब हर जोड़ी चप्पल पर होगा क्यूआर कोड, मिलेगी ये जानकारी

लिडकॉम ने अपने बयान में बताया कि हर चप्पल की जोड़ी अब क्यूआर कोड के साथ आएगी। ये डिजिटल सुविधा नकली सामान रोकने और कारीगरों की पहचान सामने लाने में मदद करेगी।

जब कोई ग्राहक कोड स्कैन करेगा तो उसे ये जानकारियां मिलेंगी:

  • कारीगर या सेल्फ-हेल्प ग्रुप का नाम
  • निर्माण का जिला (महाराष्ट्र में)
  • शिल्प तकनीक और इस्तेमाल हुआ कच्चा माल
  • जीआई प्रमाण की वैधता और स्थिति

 

भारत के सबसे प्रतिष्ठित पारंपरिक शिल्प में से एक कोल्हापुरी चप्पल, न केवल घरेलू फैशन जगत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी नए सिरे से लोकप्रिय हो रही है। एक इतालवी ब्रांड प्रादा पर इस चप्पल के दुरुपयोग का आरोप लगा है। अपनी जटिल कारीगरी और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध और भौगोलिक संकेतक (जीआई) के दर्जे वाली यह हस्तनिर्मित चमड़े की सैंडल को अब क्यूआर कोड के रूप में सुरक्षा और प्रामाणिकता की एक अतिरिक्त परत के साथ उपलब्ध है। इसका श्रेय हालिया प्रौद्योगिकी और कानूनी नवोन्मेषण को जाता है।

महाराष्ट्र के चमड़ा उद्योग विकास निगम (लिडकॉम) के अधिकारियों ने बताया कि इस कदम का उद्देश्य नकली कोल्हापुरी चप्पल की बिक्री पर रोक लगाना, प्रत्येक उत्पाद के पीछे कारीगर की पहचान को दर्शाना, उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाना और पारंपरिक कारीगरों की बाजार में स्थिति को मजबूत करना है।

हाल ही में, इटली के लक्जरी फैशन ब्रांड प्रादा के नए कलेक्शन में कोल्हापुरी चप्पल जैसे दिखने वाले फुटवियर को शामिल किए जाने पर कारीगरों ने जीआई अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए विरोध जताया था।

इस विवाद के बाद प्रादा ने स्वीकार किया था कि उसके पुरुषों के 2026 फैशन शो में प्रदर्शित सैंडल पारंपरिक भारतीय दस्तकारी वाले फुटवियर से प्रेरित थी। हालांकि, ब्रांड ने महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स को दिए एक जवाब में स्पष्ट किया है कि प्रदर्शित सैंडल डिजाइन के चरण में है और अभी तक इनके व्यावसायिक उत्पादन की पुष्टि नहीं हुई है। प्रादा के विशेषज्ञों की एक टीम ने इस महीने की शुरुआत में कारीगरों से बातचीत करने और स्थानीय जूता-चप्पल विनिर्माण प्रक्रिया का आकलन करने के लिए कोल्हापुर का दौरा किया था।

12वीं शताब्दी से चली आ रही यह चप्पल मुख्य रूप से महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सांगली और सोलापुर जिलों में तैयार की जाती रही है। प्राकृतिक रूप से टैन किए गए चमड़े और हाथ से बुनी हुई पट्टियों से बना इनके विशिष्ट डिजाइन को कारीगरों की पीढ़ियों द्वारा संरक्षित किया है। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में इसे एक बड़ा बढ़ावा मिला जब दूरदर्शी शासक छत्रपति शाहू महाराज ने इसे आत्मनिर्भरता और स्वदेशी गौरव के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया। उन्होंने इन चप्पलों के उपयोग को प्रोत्साहित किया, जिससे ग्रामीण शिल्प को एक सम्मानित कुटीर उद्योग के रूप में विकसित करने में मदद मिली।

इस सांस्कृतिक विरासत की रक्षा और कारीगरों को उचित मान्यता सुनिश्चित करने के लिए, महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकारों ने संयुक्त रूप से 2019 में इसके लिए जीआई दर्जा हासिल किया। लिडकॉम ने बयान में कहा कि प्रत्येक जोड़ी चप्पल के लिए क्यूआर-कोडे वाला प्रमाणन शुरू किया है। इस डिजिटल पहल का उद्देश्य जालसाजी से निपटना और प्रत्येक उत्पाद के पीछे कारीगर या स्वयं सहायता समूह की पहचान को उजागर करना है। कोड स्कैन करके खरीदार कारीगर या उत्पादन इकाई का नाम और स्थान, महाराष्ट्र में निर्माण के जिले, शिल्प तकनीक और प्रयुक्त कच्चे माल, जीआई प्रमाणन की वैधता और स्थिति जैसी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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