
Replacing Dollar with Rupee: कल्पना कीजिए कि दो दोस्त आपस में कुछ चीजों का आदान-प्रदान करना चाहते हैं। एक दोस्त के पास चावल है और दूसरे के पास दाल। क्या उन्हें अपनी अदला-बदली के लिए किसी तीसरे व्यक्ति की मुद्रा का उपयोग करने की जरूरत है? नहीं, वे सीधे तौर पर भी व्यापार कर सकते हैं।
ठीक इसी तरह, भारत अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक नया और मजबूत रास्ता बना रहा है, जहां अमेरिकी डॉलर जैसे किसी तीसरे पक्ष की मुद्रा पर निर्भर रहने की बजाय अपने ही रुपये का इस्तेमाल किया जा रहा है। आइए सरल भाषा में समझते हैं कि यह नई प्रणाली क्या है, यह कैसे काम करती है, इसके क्या फायदे हैं, और कौन-से देश इस पहल में भारत के साथ जुड़ चुके हैं।
लोकल करेंसी सेटलमेंट सिस्टम (LCSS) एक ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत दो देश एक-दूसरे के साथ व्यापार करने के लिए अमेरिकी डॉलर जैसी किसी तीसरी मुद्रा का उपयोग करने के बजाय अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं का उपयोग करते हैं। इस नई प्रणाली को समझने के लिए पुराने और नए तरीकों की तुलना करते हैं।
| पुराना तरीका (डॉलर के जरिए) | नया तरीका (अपनी मुद्रा में) | |
|---|---|---|
| पहले, जब किसी भारतीय व्यापारी को दूसरे देश से सामान खरीदना होता था, तो उसे पहले अपने रुपये को अमेरिकी डॉलर में बदलना पड़ता था। | अब, इस नई प्रणाली के तहत, एक भारतीय व्यापारी सीधे रुपये में भुगतान कर सकता है। | |
| इस प्रक्रिया में मुद्रा रूपांतरण शुल्क लगता था और डॉलर की कीमतों में उतार-चढ़ाव का खतरा भी बना रहता था। | इससे अतिरिक्त लागत और मुद्रा के उतार-चढ़ाव का जोखिम खत्म हो जाता है, जिससे व्यापार सस्ता और सरल हो जाता है। | |
| भुगतान की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती थी, जिसमें कई बैंक और पश्चिमी वित्तीय चैनल शामिल होते थे। | दूसरे देश के व्यापारी को भुगतान उसकी अपनी स्थानीय मुद्रा में मिल जाता है, जिससे प्रक्रिया बहुत आसान और तेज हो जाती है। |
नया सिस्टम का केंद्र स्पेशल रुपया वोस्ट्रो अकाउंट (SRVA) है। यह एक खास तरह का बैंक खाता है जो विदेशी बैंक भारत के किसी बैंक में खोलते हैं। आइए, भारत-रूस तेल व्यापार के उदाहरण से इसे समझते हैं।
पहला कदम सौदा: भारत की एक कंपनी रूस की एक कंपनी से तेल खरीदने का सौदा करती है।
दूसरा कदम भुगतान: भारतीय कंपनी तेल की कीमत का भुगतान भारतीय रुपये में करती है।
तीसरा कदम स्पेशल अकाउंट: यह रुपया रूसी कंपनी के बैंक द्वारा भारत में खोले गए एक स्पेशल रुपया वोस्ट्रो अकाउंट (SRVA) में जमा हो जाता है।
चौथा कदम अंतिम भुगतान: अब, रूसी बैंक इस SRVA में जमा रुपये का उपयोग करके रूस की तेल कंपनी को उनकी अपनी मुद्रा, यानी रूबल में भुगतान कर देता है।
इस तरह, बिना डॉलर का इस्तेमाल किए दोनों देशों के बीच व्यापार आसानी से पूरा हो जाता है। यह सिस्टम न केवल सरल है, बल्कि कई बड़े फायदे भी देती है।
भारत की इस पहल के पीछे कई रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं। इसके तीन सबसे बड़े फायदे निम्नलिखित हैं।
पहला, डॉलर पर निर्भरता कम करना: अब तक, दुनिया का ज्यादातर व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। इस कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था में होने वाले किसी भी उतार-चढ़ाव का असर भारत पर भी पड़ता है। अपनी मुद्रा में व्यापार करके भारत वैश्विक आर्थिक झटकों से खुद को काफी हद तक सुरक्षित कर सकता है और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ा सकता है।
दूसरा, व्यापार को सस्ता और आसान बनाना: जब व्यापारियों को रुपये को डॉलर में और फिर डॉलर को किसी और मुद्रा में नहीं बदलना पड़ता, तो वे मुद्रा रूपांतरण शुल्क से बच जाते हैं। इसके अलावा, उन्हें मुद्रा की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचने के लिए 'हेजिंग' जैसे महंगे उपायों पर भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। इससे व्यापार की लागत कम होती है और प्रक्रिया तेज हो जाती है।
तीसरा, रुपये को विश्व स्तर पर मज़बूत बनाना: जितना अधिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार रुपये में होगा, वैश्विक मंच पर रुपये की स्वीकार्यता और मजबूती उतनी ही बढ़ेगी। यह रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो लंबी अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।
यह महत्वाकांक्षी योजना सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे कई देशों के साथ सफलतापूर्वक लागू भी किया जा रहा है।
भारत ने इस प्रणाली को कई प्रमुख व्यापारिक भागीदारों के साथ सफलतापूर्वक लागू किया है। यहां तीन उदाहरण प्रमुख हैं।
1. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ एक आदर्श: साझेदारी भारत और यूएई की साझेदारी इस सिस्टम के लिए एक आदर्श उदाहरण है। हाल ही में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 100.06 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया, जिससे यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है। यह प्रणाली न केवल बड़े व्यापार को सुगम बनाती है, बल्कि यूएई में काम करने वाले लाखों भारतीयों के लिए पैसे भेजना भी आसान बनाती है।
2. रूस के साथ एक रणनीतिक कदम: रूस के साथ यह साझेदारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने और व्यापार को जारी रखने की जरूरत से प्रेरित थी। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत और रूस के बीच होने वाला 96% वाणिज्यिक व्यापार अब उनकी अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं (रुपया और रूबल) में तय हो रहा है।
यह इस बात का प्रमाण है कि यह प्रणाली भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच भी कितनी प्रभावी हो सकती है। यह साझेदारी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, हालांकि भारत बहुत ज्यादा आयात करता है, इस कारण व्यापार की यह प्रकृत्ति अपने साथ कुछ नई आर्थिक चुनौतियां भी लाती है, जिसे आगे समझेंगे।
3. मॉरीशस को बनाया अफ्रीका का प्रवेश द्वार: मॉरीशस के साथ हाल ही में हुआ समझौता इस सिस्टम को एक नया आयाम देता है। इस समझौते के तहत मॉरीशस में एक 'INR क्लियरिंग सेंटर' स्थापित करने की योजना है। यह केंद्र मॉरीशस को पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के साझा बाजार (COMESA) के अन्य देशों के साथ रुपये में व्यापार करने के लिए एक हब के रूप में स्थापित करेगा, जिससे पूरे महाद्वीप में भारत की आर्थिक पहुंच बढ़ेगी।
रुपये का यह प्रभाव केवल बड़े व्यापारिक सौदों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आम लोगों के दैनिक जीवन में भी पहुंच रहा है।
जिस तरह भारत बड़े व्यापारिक भुगतानों को आसान बनाने के लिए एलसीएसएस का उपयोग कर रहा है, उसी तरह वह अपने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के माध्यम से विदेश में छोटे और दैनिक भुगतानों को भी सरल बना रहा है। अब भारतीय पर्यटक और नागरिक कई देशों में अपने भारतीय बैंक खाते से सीधे भुगतान कर सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वे भारत में करते हैं।
आज, जिन प्रमुख देशों में यूपीआई स्वीकार किया जाता है, उनमें फ्रांस, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस, कतर और जापान शामिल हैं। यह भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली की वैश्विक सफलता को दर्शाता है। हालांकि, रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की राह में कुछ चुनौतियां भी हैं।
रुपये को व्यापक रूप से अपनाने की राह में कुछ मुख्य चुनौतियां हैं। ऊपर भारी आयात की जिस चुनौती के बारे में बात की गई है, पहले उसकी बात करते हैं। आयात-निर्यात में भारी अंतर से व्यापार असंतुलन पैदा होता है। जब एक देश भारत को जितना सामान बेचता है, उसकी तुलना में भारत से बहुत कम खरीदता है, तब ऐसी स्थिति पैदा होती है।
रूस इसका एक सटीक उदाहरण है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, भारत रूस से 63 अरब डॉलर से अधिक का आयात करता है, जबकि उसका निर्यात 5 अरब डॉलर से भी कम है। इसके कारण रूस के वोस्ट्रो खाते में बड़ी मात्रा में रुपये जमा हो जाते हैं, जिन्हें वह कहीं और आसानी से खर्च नहीं कर पाता। इसे 'फंसे हुए रुपये' की समस्या कहते हैं।
दूसरी चुनौती रुपये की सीमित स्वीकृति को लेकर है। हालांकि रुपये का इलाका बढ़ रहा है, फिर भी वैश्विक वित्तीय प्रणालियों पर अमेरिकी डॉलर का दबदबा कायम है। रुपया अभी तक कंटीन्यूअस लिंक्ड सेटलमेंट (CLS) प्रणाली का हिस्सा नहीं है, जो वैश्विक मुद्रा विनिमय के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। इसके अलावा, रुपया पूंजी खाते पर पूरी तरह से परिवर्तनीय नहीं है, जो इसकी वैश्विक स्वीकार्यता को सीमित करता है।
एलीएसएस और एसआरवीए जैसे अपने फाइनैंशियल सिस्टम बनाकर भारत वैश्विक जोखिमों को कम कर रहा है, अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ा रहा है। यह पहल सिर्फ एक आर्थिक रणनीति नहीं है, बल्कि यह भारत के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने और एक मजबूत, आत्मनिर्भर और 'विकसित भारत' बनने की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की दिशा में एक ठोस कदम है।
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