LPG Crisis India: LPG की जगह अब DME गैस से बनेगा भोजन, भारतीय वैज्ञानिकों ने की खोज

LPG vs DME: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से भारत में LPG की सप्लाई पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इसबीच भारतीय वैज्ञानिकों ने DME गैस बनाई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गैस LPG का विकल्प साबित हो सकती है। इसे मौजूदा सिलेंडर और चूल्हे में बिना किसी बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है।

Jitendra Singh
पब्लिश्ड16 Mar 2026, 03:07 PM IST
LPG vs DME: डीएमई स्वदेशी गैस है। इसका पूरा नाम डाइमिथाइल ईथर है।
LPG vs DME: डीएमई स्वदेशी गैस है। इसका पूरा नाम डाइमिथाइल ईथर है।

LPG vs DME: ईरान और अमेरिका के बीच जारी जंग के कारण खाना बनाने वाली गैस की किल्लत बढ़ती जा रही है। इस बीच पुणे के वैज्ञानिकों ने एलपीजी का सस्‍ता और स्‍वदेशी विकल्‍प डाइमिथाइल ईथर (DME) गैस बनाने का दावा किया है। पुणे की CSIR-NCL ने डाइमिथाइल ईथर को LPG जैसा गुणधर्म वाला और मौजूदा कुकिंग गैस का विकल्प बताया है। पुणे के वैज्ञानिकों का कहना है कि डाइमिथाइल ईथर, LPG की तरह ही जलता है। इसमें भी कम प्रदूषण फैलता है। इसके गुणधर्म LPG से काफी मिलते-जुलते हैं।

पुणे NCL का दावा है कि उनकी 20 साल की मेहनत लाई रंग है, लेकिन अब भी कई चुनौतियां हैं। CSIR–नेशनल केमिकल लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने इस ईंधन के उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ाने पर काम शुरू कर दिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह घरों में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाली एलपीजी का एक स्वदेशी विकल्प बन सकता है। लेबोरेटरी ने हाल ही में DME के लिए एक पायलट प्लांट स्थापित किया है। अब उत्पादन बढ़ाने के लिए इस सुविधा का विस्तार करने की योजना बना रही है।

जानिए क्या है डाइमिथाइल ईथर और इसके गुण?

डाइमिथाइल ईथर को आमतौर पर DME के नाम से जाना जाता है। यह एक गैस है जिसे मेथनॉल से आर्टिफिशियल रूप से बनाया जाता है। मेथनॉल खुद कई स्रोतों से हासिल की जा सकती है। इनमें बायोमास, कोयला या यहां तक कि कैप्‍चर्ड कार्बन डाइऑक्साइड भी शामिल है। डीएमई में एलपीजी जैसे गुणधर्म पाए जाते हैं।

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वैज्ञानिकों का दावा है कि यह गैस एलपीजी की तरह ही सुरक्षित तरीके से जलती है और मौजूदा कुकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ पूरी तरह संगत है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे चलाने के लिए आपको अपने घर के चूल्हे या सिलेंडर में किसी भी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह मौजूदा सिस्टम में फिट होकर उतनी ही ऊर्जा प्रदान करती है जितनी सामान्य रसोई गैस देती है।

भारत को क्यों पड़ी इस नए ईंधन की जरूरत?

मौजूदा स्थिति यह है कि भारत अपनी जरूरत की रसोई गैस का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। आयात पर इस भारी निर्भरता के कारण, जब भी दुनिया के किसी हिस्से में कोई संघर्ष होता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। मौजूदा वैश्विक संकट ने इस बात को और भी स्पष्ट कर दिया है कि हमें अपने स्थानीय विकल्पों पर ध्यान देना होगा। प्रयोगशाला में हाल ही में डीएमई के लिए एक पायलट प्लांट स्थापित किया गया है, और अब वैज्ञानिक इसके उत्पादन को कई गुना बढ़ाने की तैयारी में जुटे हुए हैं।

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विदेशी मुद्रा भंडार को मिलेगी संजीवनी

भारत अपनी जरूरत की एलपीजी का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, जिसके लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा चुकानी पड़ती है। शोध के अनुसार, यदि एलपीजी में केवल 8% DME गैस मिला दी जाए, तो देश को हर साल लगभग 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। युद्ध के कारण डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये और बढ़ती तेल कीमतों के बीच यह बचत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी।

पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर विकल्प

महंगाई कम करने के साथ-साथ DME गैस पर्यावरण के लिए भी एक वरदान साबित हो सकती है। एलपीजी के मुकाबले यह गैस जलने पर बहुत कम प्रदूषण फैलाती है। इसमें हानिकारक कणों का उत्सर्जन न्यूनतम होता है, जिससे यह एक क्लीन फ्यूल की श्रेणी में आती है। आज जब पूरी दुनिया नेट-जीरो और प्रदूषण मुक्त ईंधन की बात कर रही है, तब भारत का यह देसी जुगाड़ वैश्विक मानकों पर भी खरा उतरता नजर आ रहा है।

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आयात पर घटेगी निर्भरता

नीति निर्माताओं का मुख्य लक्ष्य एक ऐसा स्वदेशी और साफ विकल्प तैयार करना है, जो आयातित एलपीजी पर हमारी निर्भरता को कम कर सके। अगर सीएसआईआर-एनसीएल का यह पायलट प्रोजेक्ट सफल होकर बड़े पैमाने पर लागू होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था और आम जनता पर नहीं पड़ेगा। कुल मिलाकर DME गैस भारत के लिए एक मजबूत ढाल साबित हो सकती है।

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