
नई दिल्ली: बैंकिंग क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में एक बड़ा बदलाव देखा गया है। जो सरकारी बैंक बढ़ते हुए गैर-निष्पादित संपत्तियों (NPAs) और तरह-तरह के विवादों के कारण चर्चा में रहा करते थे, अब वे अपने दमदार प्रदर्शनों के कारण सुर्खियां बटोर रहे हैं। बड़ी बात है कि सरकारी बैंक, जिन्हें हम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSBs) कहते हैं, ने प्राइवेट बैंकों से आगे निकलकर बेहतर नतीजे दिए हैं।
जेएम फाइनेंशियल और क्रिफ हाई मार्क की रिपोर्ट्स के आधार पर, हम देखते हैं कि सरकारी बैंकों ने कर्ज देने (क्रेडिट ग्रोथ) में मजबूत बढ़त हासिल की है, खासकर होम लोन और ऑटो लोन जैसे सुरक्षित लोन सेगमेंट में। वहीं, प्राइवेट बैंक छोटे कर्जों में सतर्क रहे और बाजार हिस्सा गंवाते गए। आइए, इसकी वजहें और आंकड़ों को सरल भाषा में समझते हैं।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने प्राइवेट बैंकों से बेहतर प्रदर्शन किया क्योंकि उन्होंने सुरक्षित कर्जों पर ज्यादा फोकस किया, जहां जोखिम कम होता है। यहां मुख्य वजहें हैं।
सुरक्षित कर्जों में बाजार हिस्सेदारी बढ़ी: PSBs ने घर के कर्ज (होम लोन) और गाड़ी के कर्ज (ऑटो लोन) जैसे सुरक्षित सेगमेंट में पिछले 4 सालों में प्राइवेट बैंकों से बाजार हिस्सा छीना। वित्त वर्ष 2025 में घर के कर्ज में सकारी बैंकों की राशि 21% बढ़ी, जबकि प्राइवेट बैंकों में 17% घटी। इसी तरह, सरकारी बैंकों के 10% ज्यादा ऑटो लोन बांटे जबकि प्राइवेट बैंकों के ऑटो लोन 6% घटे।
कर्ज देने की रफ्तार में बढ़त: अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही में सरकारी बैंकों ने 13% साल दर साल और 4% तिमाही दर तिमाही बढ़त दिखाई, जो बड़े प्राइवेट बैंकों (11% साल दर साल, 3% तिमाही दर तिमाही) से ज्यादा है। यह होम लोन, संपत्ति पर कर्ज (LAP), गोल्ड लोन और छोटे कारोबारों के सुरक्षित कर्ज से आया।
कर्ज की गुणवत्ता में सुधार: पर्सनल लोन जैसे असुरक्षित कर्ज में देरी से पैसे लौटाने की समस्या बढ़ी, लेकिन सुरक्षित कर्ज में स्थिर रही। सरकारी बैंकों के फंसे कर्ज की रकम भी घटी क्योंकि उन्होंने कर्ज वसूली का काम बेहतर किया। सरकारी बैंकों का कर्ज देने और उसकी वसूली पर खर्च भी 4% कम हुआ, जिससे कमाई बढ़ी।
कर्ज की औसत राशि बढ़ी: पर्सनल लोन में सरकारी बैंकों की औसत राशि 5.92 लाख रुपये रही, जो प्राइवेट बैंकों के 3.82 लाख रुपये से ज्यादा है। प्राइवेट बैंक छोटे कर्जों में कटौती कर रहे थे, जबकि सरकारी बैंक बड़े और कम जोखिम वाले कर्ज पर टिके रहे।
देरी से पैसे लौटाने में स्थिरता: सुरक्षित कर्ज में शुरुआती और देर से पैसे न लौटाने की समस्या घटी या स्थिर रही। सरकारी बैंकों ने पिछले सालों में बाजार में मजबूत स्थिति बनाई।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने कर्ज देने में मजबूत प्रदर्शन किया, लेकिन असुरक्षित सेगमेंट में थोड़ा पीछे रहे।
कुल कर्ज बढ़त (Q3FY26): PSBs 13% साल दर साल, 4% तिमाही दर तिमाही। प्राइवेट बैंक 11% साल दर साल, 3% तिमाही दर तिमाही। छोटे फाइनेंस बैंक (SFBs) 22% साल दर साल।
उपभोग कर्ज में ट्रेंड (FY25): कुल उपभोग कर्ज (~54% कुल कर्ज का) में बढ़त -3% से 11% तक घटी। PSBs ने असुरक्षित कर्ज (पर्सनल लोन) में बाजार हिस्सा गंवाया, लेकिन सुरक्षित में बढ़ाया।
| सेगमेंट | PSBs बढ़त | प्राइवेट बैंक बढ़त | कुल सिस्टम बढ़त |
|---|---|---|---|
| पर्सनल लोन | -12% | -5% | -3% |
| घर का कर्ज | +21% | -17% | +3% |
| गाड़ी का कर्ज | +10% | -6% | +5% |
सरकारी बैंकों को असुरक्षित कर्ज में समस्या आई, जहां देरी से पैसे लौटने की समस्या बढ़ी। ब्याज मार्जिन (NIM) में दबाव, दर कटौती से। लेकिन सुरक्षित कर्ज और सरकारी योजनाओं से फायदा मिलेगा। प्राइवेट बैंक छोटे कर्जों में सतर्क हैं, लेकिन कुल मिलाकर सरकारी बैंकों की कमाई वित्त वर्ष 2026 में कम रहेगी जो वित्त वर्ष 2027 में सुधरेगी।
| बैंक का नाम | मुख्यालय | स्थापना का वर्ष |
|---|---|---|
| भारतीय स्टेट बैंक (SBI) | मुंबई | 1955 |
| पंजाब नैशनल बैंक (PNB) | नई दिल्ली | 1894 |
| बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) | वडोदरा | 1908 |
| केनरा बैंक | बेंगलुरु | 1906 |
| यूनियन बैंक ऑफ इंडिया | मुंबई | 1919 |
| इंडियन बैंक | चेन्नई | 1907 |
| इंडियन ओवरसीज बैंक (IOB) | चेन्नई | 1937 |
| बैंक ऑफ महाराष्ट्र | पुणे | 1935 |
| यूको बैंक | कोलकाता | 1943 |
| बैंक ऑफ इंडिया (BoI) | मुंबई | 1906 |
| सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया | मुंबई | 1911 |
| पंजाब एंड सिंध बैंक | नई दिल्ली | 1908 |
सरकारी बैंकों में वित्त वर्ष 2024 के मुकाबले वित्त वर्ष 2025 में जमा राशि 11% बढ़ गई। यानी, पिछले साल की तुलना में 11% ज्यादा जमा आए। लेकिन ये बढ़त कर्ज देने की रफ्तार से कम है। बैंक ने इसी एक साल में बैंक ने 13 पर्सेंट ज्यादा लोन दिए। इससे लोन टु डिपॉजिट रेशियो 88.9% पर पहुंच गया।
वित्त वर्ष 2026 से वित्त वर्ष 2028 यानी अप्रैल 2025 से मार्च 2028 तक सरकारी बैंकों के लोन हर वर्ष 14 प्रतिशत की चक्रवद्धि दर से बढ़ने का अनुमान है। सरकारी बैंकों के लिए अच्छी बात है, क्योंकि इससे एलडीआर 86-88% के आसपास स्थिर रहेगा, और बैंक बिना ज्यादा दबाव के लोन दे सकेंगे। वहीं, प्राइवेट बैंक के लिए यह वृद्धि दर 16 प्रतिशत रहेगी। मतलब, प्राइवेट बैंक ज्यादा तेजी से लोन बढ़ाएंगे, लेकिन सरकारी बैंक भी अच्छी रफ्तार बनाए रखेंगे।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट्स कहती हैं कि वित्त वर्ष 2026 में ब्याज मार्जिन पर दबाव से बैंकों की कमाई (PAT) थोड़ी कमजोर रहेगी, लेकिन अगले वर्ष 2027 में इसमें सुधार आएगा। सरकारी बैंक होम और ऑटो जैसे सिक्यॉर्ड लोन पर फोकस से मजबूत रहेंगे, जबकि प्राइवेट बैंक कुल ग्रोथ में आगे रहेंगे। ये अनुमान सरकारी खर्च, हाउसिंग डिमांड और रेट कट्स जैसे फैक्टर्स पर आधारित हैं।
सवाल है कि ये सब केंद्र की मोदी सरकार की सख्ती और बैंकों की हालत सुधारने को लेकर कड़ी प्रतिबद्धता का नतीजा तो नहीं? नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में बैंकिंग सेक्टर में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए, जिन्होंने इस क्षेत्र को मजबूत और पारदर्शी बनाया। 2014 से अब तक 86 बड़े सुधार लागू किए गए, जिनमें एनपीए (फंसे कर्ज) को 19% से घटाकर 2.5% तक लाना प्रमुख है।
सरकार ने 4आर नीति (पहचान, वसूली, पुनर्पूंजीकरण और सुधार) अपनाई, साथ ही मिशन इंद्रधनुष के तहत बैंकों में 3.10 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डाली। जन धन योजना से 30 करोड़ से ज्यादा गरीबों के बैंक खाते खुले, जिससे वित्तीय समावेशन बढ़ा। मुद्रा योजना ने छोटे उद्यमियों को आसान कर्ज दिया, जबकि दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) ने फंसे कर्जों की तेज वसूली सुनिश्चित की।
डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा मिला, जिसमें यूपीआई, डिजिटल लेंडिंग और केवाईसी प्रक्रिया सरल हुई। बीमा और पेंशन सेक्टर में 100% विदेशी निवेश की अनुमति दी गई, तथा जमा बीमा कवर 50,000 से बढ़ाकर 5 लाख रुपये किया गया। इन सुधारों से सार्वजनिक बैंकों की मुनाफा बढ़ा और अर्थव्यवस्था मजबूत हुई।
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