वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में आज 11 बजे वित्त वर्ष 2026-27 का बजट पेश करने वाली हैं। इस बार बजट का कुल आकार 54.1 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह पिछले साल के मुकाबले करीब 7.9 प्रतिशत ज्यादा होगा। सुनिधि सिक्योरिटीज एंड फाइनेंस लिमिटेड की एक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ग्रोथ को बनाए रखने और राजकोषीय घाटे को कम करने के बीच संतुलन बना सकती है।
बजट के आकार में बढ़ोतरी का अनुमान
सुनिधि सिक्योरिटीज की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार का कुल खर्च उसकी वित्तीय मंशा को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2026 के बजट अनुमान में कुल खर्च 50.65 लाख करोड़ रुपये रखा गया था। यह देश की जीडीपी का 14.2 प्रतिशत था। हालांकि, कमजोर नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ की वजह से संशोधित अनुमान में यह खर्च घटकर 50.15 लाख करोड़ रुपये रहने की संभावना है।
क्या रहेगा खर्च का नया टारगेट
आने वाले वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कुल खर्च 54.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट कहती है कि यह खर्च जीडीपी का लगभग 13.8 प्रतिशत होगा। इसका मतलब है कि सरकार अचानक खर्चों में कटौती करने के बजाय धीरे-धीरे अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत कर रही है। यह रणनीति देश की आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी मानी जा रही है।
राजकोषीय घाटे पर क्या है अपडेट
रिपोर्ट में राजकोषीय घाटे को लेकर भी महत्वपूर्ण आंकड़े दिए गए हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 4.16 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अगर रुपयों में देखें तो यह करीब 16.37 लाख करोड़ रुपये होगा। पिछले साल का बजट अनुमान 15.69 लाख करोड़ रुपये था। हालांकि रकम बढ़ रही है, लेकिन जीडीपी के अनुपात में यह घाटा कम हो रहा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार
भारत की असली आर्थिक रफ्तार इस समय काफी मजबूत बनी हुई है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) ने वित्त वर्ष 2026 के लिए रियल जीडीपी ग्रोथ 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल सितंबर में हुए जीएसटी सुधारों से शहरी मांग में तेजी आई है। इससे वित्त वर्ष 2026 की दूसरी छमाही में अर्थव्यवस्था को काफी मजबूती मिली है।
नॉमिनल जीडीपी और टैक्स कलेक्शन
अर्थव्यवस्था में मजबूती के बावजूद नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ पिछले छह सालों में सबसे धीमी रही है। इसके करीब 8 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसका मुख्य कारण महंगाई में आने वाली कमी है। नॉमिनल ग्रोथ कम होने से टैक्स कलेक्शन पर असर पड़ा है। इस वजह से राज्यों को दिए जाने वाले टैक्स और ड्यूटी के हिस्से में भी कमी दर्ज की गई है।