
Crude Oil Prices: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से भारत के तेल आयात बिल के साथ ही ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ सकती हैं। होर्मुज वैश्विक तेल की आवाजाही का प्रमुख मार्ग है। ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के बीच ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में 10 फीसदी बढ़ गए हैं। जानकारों ने अनुमान जताया है कि ईरान पर U.S. और इज़राइल के हमलों के बाद मिडिल ईस्ट एक नए युद्ध में फंसने के बाद कीमतें $150 प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
ब्रेंट क्रूड 78.52 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। मध्य पूर्व में बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन पर बाजारों ने रिएक्ट किया है। हालांकि बाद में इसमें थोड़ी गिरावट आई है और ये 5 फीसदी की तेजी के साथ 76.6 डॉलर के आस-पास है।
जानकारों का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड का दाम 100-115 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकते हैं। समुद्री रास्ते में रुकावट आने पर, कीमतें 120-140 डॉलर तक जा सकती हैं, जबकि लगातार बंद होने का खतरा तेल को 150 डॉलर या उससे ज्यादा तक ले जा सकता है। OPEC की भूमिका पर एक्सपर्ट्स का मानना है कि सऊदी अरब और UAE के पास लगभग 4-5 मिलियन बैरल प्रति दिन की एक्स्ट्रा कैपेसिटी है। हालांकि, उस सप्लाई का अधिकतर हिस्सा अभी भी होर्मुज ट्रांजिट पर निर्भर है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 फीसदी आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का आयात बिल भी बढ़ जाएगा। भारत ने चालू वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों में 100 अरब डॉलर मूल्य के 20.6 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया है। एक मीडिया रिपोर्ट में कैपलर में प्रमुख शोध विश्लेषक सुमित रिटोलिया ने कहा कि होर्मुज बंद होने से भारत के लिए तेल आयात की लागत, माल ढुलाई और बीमा में बढ़ोतरी हो सकती है। संभावित अल्पकालिक आपूर्ति में कमी और रुपये और राजकोषीय संतुलन पर भी दबाव होगा।
होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित एक संकरा सा रास्ता है। यही एकमात्र समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी या अरब सागर से जोड़ता है। इसके उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान और संयुक्त अरब अमीरात है। होर्मुज स्ट्रेट को फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार भी कहते हैं क्योंकि इसी संकरे रास्ते से सऊदी अरब, कुवैत, कतर, इराक जैसे दुनिया के प्रमुख उत्पादक देश अपना तेल बाहर भेजते हैं। हर दिन करीब 15 मिलियन बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है, जो दुनिया की सप्लाई का करीब पांचवां हिस्सा है।
OPEC+ ने एक वर्चुअल मीटिंग के बाद अप्रैल में तेल उत्पादन में थोड़ी तेजी से बढ़ोतरी फिर से शुरू करने पर सहमति जताई। इसमें रोजाना 206,000 बैरल की बढ़ोतरी की जाएगी। यह बढ़ोतरी दिसंबर में लागू की गई 137,000 bpd (बैरल प्रति दिन) बढ़ोतरी से 1.5 गुना अधिक है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों से शुरू हुए टकराव से कच्चे तेल की कीमतों को सपोर्ट मिल रहा है। हालांकि, कई सदस्यों के पास सीमित स्पेयर कैपेसिटी है।
माना जा रहा है कि भारत जैसी तेल इंपोर्ट करने वाली इकॉनमी के लिए ट्रांसमिशन मैकेनिज्म डायरेक्ट है। तेल के दामों में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से करंट अकाउंट डेफिसिट GDP का लगभग 0.4-0.5 फीसदी बढ़ जाता है और CPI (रिटेल इंफ्लेशन) 30-40 बेसिस पॉइंट्स बढ़ सकता है।
इतिहास बताता है कि 1973-74 के योम किप्पुर युद्ध और अरब तेल प्रतिबंध के दौरान तेल की कीमतों में सबसे बड़ी उछाल आई थी। उस समय कीमतें 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 12 डॉलर प्रति बैरल हो गई थीं, यानी करीब 300 फीसदी की वृद्धि देखने तो मिली थी। दूसरी बड़ी तेजी 1978-80 के दौरान ईरान की क्रांति के समय दर्ज की गई, जब तेल 14 डॉलर से बढ़कर लगभग 39 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गए। इसके अलावा ईरान-इराक युद्ध, खाड़ी युद्ध और इराक युद्ध के दौरान भी कीमतों में 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी देखी गई थी।
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