GDP Growth and Stock Market: विकास की तेज रफ्तार के बावजूद बाजार में क्यों दिख रही बेचैनी?

GDP Growth Rate: तेज जीडीपी ग्रोथ, रिकॉर्ड-लो महंगाई और चढ़ते शेयर बाजार के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में विरोधाभासी संकेत दिख रहे हैं। अमेरिकी टैरिफ का दबाव और निजी निवेश की सुस्ती, क्या विकास की राह में रोड़ा बन सकती है?

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड28 Nov 2025, 10:31 AM IST
 विकास की तेज रफ्तार के बावजूद बाजार में क्यों दिख रही बेचैनी? (सांकेतिक तस्वीर)
विकास की तेज रफ्तार के बावजूद बाजार में क्यों दिख रही बेचैनी? (सांकेतिक तस्वीर)(Livemint)

Indian Economy: भारतीय अर्थव्यवस्था एक अजीबोगरीब चौराहे पर खड़ी है, जहां से विकास और अनिश्चितता, दोनों के संकेत मिल रहे हैं। एक तरफ, जुलाई से सितंबर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर 7% से ज्यादा रहने का अनुमान है, जो इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बनाए रखेगा। लेकिन दूसरी ओर, मुद्रास्फीति रिकॉर्ड निचले स्तर (1% से भी कम) पर है, जिसका मुख्य कारण खाद्य कीमतों में भारी गिरावट है। ब्लूमबर्ग के सर्वे के अनुसार, अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया है कि अर्थव्यवस्था जुलाई-सितंबर तिमाही में 7.4% की दर से बढ़ी होगी। वहीं, वित्त मंत्रालय, आरबीआई और अन्य एजेंसियों ने यह अनुमान 7% से 7.7% के बीच रखा है। यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था संख्या के लिहाज से मजबूत दिख रही है।

रुपये में गिरावट और शेयर बाजार का उछाल: बाज़ार के उलझे हुए संकेत

आर्थिक आंकड़ों में विरोधाभास यहीं नहीं रुकता। रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 90 प्रति डॉलर के आसपास पहुंच गया है, जो निर्यातकों के लिए अच्छी खबर हो सकती है, लेकिन आयात को महंगा कर सकता है। वहीं, देश का शेयर बाजार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। इन संकेतों पर टिप्पणी करते हुए ANZ बैंकिंग ग्रुप लिमिटेड के अर्थशास्त्री धीरज निम कहते हैं, 'विभिन्न संकेतकों से मिल रहे संदेशों का विरोधाभास यह बताता है कि अर्थव्यवस्था सभी मोर्चों पर तेजी से आगे नहीं बढ़ रही है। जहां कुछ व्यावसायिक खंड मजबूत परिणाम दे रहे हैं, वहीं अन्य ऑर्डर बुक और निवेश की भूख कम होने की शिकायत कर रहे हैं।'

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सरकारी निवेश विकास का मुख्य आधार, निजी खपत में कमी

वर्तमान में GDP को मुख्य रूप से सरकारी निवेश से मजबूती मिल रही है। रेटिंग एजेंसी केयरएज के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष में अब तक सरकारी निवेश में 40% का उछाल आया है। हालांकि, यह उत्साहजनक आंकड़ा अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित कमजोरी को छुपाता है क्योंकि निजी निवेश अभी भी धीमा है। उपभोग की बात करें तो भले ही अप्रैल-जून तिमाही में उपभोग में 7% की तेजी आई, लेकिन यह 7.8% की कुल जीडीपी वृद्धि से कम था। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स लिमिटेड की अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन कहती हैं, 'आदर्श रूप से, भारत जैसे देश में उपभोग वृद्धि जीडीपी वृद्धि से अधिक होनी चाहिए।' इससे स्पष्ट है कि घरेलू मांग में वह गति नहीं है जो होनी चाहिए।

त्योहारी सीजन और GST कटौती का अल्पकालिक सहारा

त्योहारी सीजन से पहले सितंबर में वस्तु एवं सेवा कर (GST) की दरों में कटौती से अल्पकालिक रूप से खर्च को बढ़ावा मिला। दोपहिया वाहनों का रजिस्ट्रेशन और कार की बिक्री दोनों ने मासिक रिकॉर्ड तोड़े जबकि अक्टूबर में जीएसटी संग्रह पांच महीनों में सबसे अधिक यानी लगभग दो लाख करोड़ रुपये रहा। लेकिन अर्थशास्त्री सवाल उठा रहे हैं कि यह गति कब तक बनी रहेगी। नोमुरा ग्रुप के अर्थशास्त्री औरोदीप नंदी के अनुसार, 'जीएसटी कटौती और त्योहारी मांग से बिक्री में उछाल अपेक्षित था, लेकिन अगस्त से अक्टूबर तक के संचयी प्रदर्शन से पता चलता है कि यह वृद्धि अधिक मापी हुई है।'

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अमेरिकी टैरिफ का बढ़ता खतरा और निर्यातकों की चिंता

भारत के लिए एक बड़ी बाहरी चिंता अमेरिकी टैरिफ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगाए 50% टैरिफ ने निर्यातकों की भावनाओं को कमजोर किया है, क्योंकि अमेरिका से मिलने वाले ऑर्डर घटने लगे हैं। धीरज निम चेतावनी देते हैं, 'हमें टैरिफ के जोखिमों को कम नहीं समझना चाहिए, जो अब दिखने लगे हैं और अगर निकट भविष्य में कोई व्यापार समझौता नहीं होता है, तो यह बदतर हो सकते हैं।' वह कहते हैं कि इसका असर कम कुशल क्षेत्रों में रोजगार और आय पर गहरा पड़ सकता है। हालांकि, सरकार के अधिकारी इस प्रभाव को ज्यादा नहीं मानते क्योंकि देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE), चीन, हांगकांग और अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं जैसे बाजारों में अपने निर्यात को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जिससे बाहरी झटकों से बचाव होगा।

मौद्रिक नीति की दुविधा: क्या RBI दरें घटाएगा?

मुद्रास्फीति के रिकॉर्ड लो स्तर पर होने से आरबीआई के लिए रेट कट का रास्ता खुला हुआ है। अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि भले ही वास्तविक जीडीपी वृद्धि मजबूत हो, लेकिन नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ में कमजोरी आरबीआई को नीतिगत दरें घटाने के लिए प्रेरित कर सकती है। नॉमिनल जीडीपी में कमोजरी का असर टैक्स कलेक्शन, लोन डिमांड और कॉर्पोरेट इनकम पर पड़ता है। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत के अनुसार, 'अर्थव्यवस्था के नॉमिनल ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए आरबीआई की नीतिगत दर में कटौती का फैसला कर सकता है।' कई अर्थशास्त्री दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक में 25-50 आधार अंक की कटौती की उम्मीद कर रहे हैं।

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सुधार और मजबूत घरेलू मांग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए उपभोक्ता और व्यावसायिक खर्च को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। हाल ही में श्रम सुधारों को लागू करने के बाद सरकार आगामी संसद सत्र में निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक दर्जन से अधिक प्रमुख बिलों को पारित करने की योजना बना रही है। अंततः भारत की जीडीपी मुख्य रूप से घरेलू मांग पर निर्भर करती है। इसलिए, उपभोग और निवेश की वृद्धि दर ही समग्र विकास की गति को निर्धारित करेगी। अर्थव्यवस्था इस वित्तीय वर्ष के शेष भाग में स्थिर रहने की उम्मीद है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू मांग और नीतिगत स्थिरता पर नजर रखना जरूरी होगा।

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