Lease Agreement: ऑक्शन में मिली प्रॉपर्टी लेकिन सरकार ने बदल दिया लीज का नियम, कोर्ट ने भी कमाल का फैसला दिया

Property News: राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है कि नीलामी के बाद सरकार लीज रेंट की शर्तें नहीं बदल सकती। कोर्ट ने 1995 के एक मामले में खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त फीस की मांग को खारिज कर दिया।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड17 Dec 2025, 02:25 PM IST
 प्रॉपर्टी के आवंटन के बाद सरकार ने बदल दिया लीज अग्रीमेंट का नियम, फिर कोर्ट ने दिया यह फैसला (सांकेतिक तस्वीर)
प्रॉपर्टी के आवंटन के बाद सरकार ने बदल दिया लीज अग्रीमेंट का नियम, फिर कोर्ट ने दिया यह फैसला (सांकेतिक तस्वीर)

Property dispute: राजस्थान हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि प्रॉपर्टी की नीलामी और उसका आवंटन हो जाने के बाद सरकार लीज रेंट की शर्तों में कोई बदलाव नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि अगर नीलामी के समय किसी शर्त का जिक्र नहीं था, तो उसे बाद में लागू करना कानूनी रूप से गलत है। यह फैसला सुमेरपुर के मार्केट यार्ड में 99 साल की लीज पर लिए गए एक प्लॉट से जुड़े मामले में आया है।

क्या था पूरा मामला?

इकनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार, यह मामला 18 सितंबर, 1995 को शुरू हुआ था। उस समय सरकार ने सुमेरपुर में प्लॉट की नीलामी के लिए विज्ञापन निकाला था। एक व्यक्ति ने 10,000 रुपये जमा करके इस नीलामी में हिस्सा लिया और सबसे ऊंची बोली लगाकर प्लॉट अपने नाम कर लिया। बोली मंजूर होने के बाद खरीदार ने प्लॉट का कब्जा लिया और वहां निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया। लेकिन तीन साल बाद जून, 1998 में सरकार ने उसे एक नया फरमान सुना दिया।

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सरकार ने मांग लिया 5% सालाना किराया

सरकार ने खरीदार से कहा कि उसे अब प्लॉट की कीमत का 5% सालाना लीज रेंट देना होगा। इतना ही नहीं, शर्त यह भी थी कि हर 15 साल में इस किराए में 25% की बढ़ोतरी की जाएगी। खरीदार ने अतिरिक्त वित्तीय बोझ वाले इस सरकारी आदेश को कोर्ट में चुनौती दी। लंबी सुनवाई के बाद 6 नवंबर, 2025 को राजस्थान हाई कोर्ट ने खरीदार के हक में फैसला सुनाते हुए सरकार की इस मांग को खारिज कर दिया।

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प्रॉपर्टी के लीज एग्रीमेंट का नियम बदलने पर राजस्थान हाई कोर्ट का आया फैसला। (AI Generated Graphic)
(Notebook LM)

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में तीन मुख्य कानूनी आधार बताए...

1. नीलामी की शर्तें अंतिम हैं: 1995 के नोटिस में सालाना किराए का कोई जिक्र नहीं था। कोर्ट ने कहा कि जब कोई सरकारी संस्था तय शर्तों पर जमीन नीलाम करती है, तो वे शर्तें एक कॉन्ट्रैक्ट की तरह होती हैं। सरकार बाद में अपनी मर्जी से नए वित्तीय बोझ नहीं डाल सकती।

2. प्रॉमिसरी एस्टॉपेल का सिद्धांत: खरीदार ने नीलामी की शर्तों पर भरोसा करके पैसे चुकाए और निर्माण कार्य किया। अब सरकार अपने वादे से पीछे नहीं हट सकती। इसे कानून में 'प्रॉमिसरी एस्टॉपेल' कहा जाता है।

3. ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट: कोर्ट ने सेक्शन 105 का हवाला देते हुए कहा कि लीज सिर्फ एक बार प्रीमियम चुकाकर भी दी जा सकती है, इसके लिए हर साल किराया लेना जरूरी नहीं है।

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सरकार की दलीलें खारिज

राज्य सरकार की दलील थी कि खरीदार ने एक अंडरटेकिंग दी थी कि वह सरकार से मंजूर लीज डीड पर साइन करेगा। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी अंडरटेकिंग को खरीदार की मर्जी नहीं माना जा सकता। खरीदारों के पास उस समय कोई और रास्ता नहीं था, क्योंकि इनकार करने पर उनका प्लॉट छिन सकता था। कोर्ट ने सरकार की अपील को खारिज करते हुए सिंगल जज के पुराने फैसले को सही ठहराया।

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