FDI India: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को अपनी एक ताजा रिपोर्ट जारी की है, जो भारत की जेब और उसके विदेशी फंड का पूरा लेखा-जोखा दिखाती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में विदेशी निवेशकों ने भारत पर भरोसा तो जताया है और पैसा भी खूब आया है, लेकिन इसके बावजूद देश के सामने एक नया आर्थिक चैलेंज खड़ा हो गया है।
एफडीआई में आया बंपर उछाल
आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट (वित्त वर्ष 2025-26) के मुताबिक, देश के लिए एक अच्छी खबर यह है कि नेट शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के मामले में भारत ने बहुत शानदार रिकवरी की है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत में शुद्ध एफडीआई प्रवाह बढ़कर 7.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया। अगर इसकी तुलना इससे पिछले साल यानी वित्त वर्ष 2024-25 से करें, तो तब यह आंकड़ा महज 1 अरब डॉलर था। हालांकि, यह अभी भी 2023-24 के 10.2 अरब डॉलर और 2022-23 के 28 अरब डॉलर के मुकाबले काफी कम है।
अगर हम कुल विदेशी पैसे (Gross FDI) की बात करें, तो वह भी 80.6 अरब डॉलर से बढ़कर 94.5 अरब डॉलर हो गया है। 'एफडीआई मार्केट्स' की मानें तो पूरी दुनिया में नई एफडीआई घोषणाओं के मामले में भारत इस समय अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर सबसे पसंदीदा देश बनकर उभरा है।
पैसा आया तो बहुत, पर टिक क्यों नहीं पाया?
हालांकि, भारत में काम कर रहे विदेशी निवेशक अपने निवेश की रकम और अपना कमाया हुआ मुनाफा भारत से बाहर ले गए, जिसकी मात्रा बढ़कर 53.6 अरब डॉलर तक पहुंच गई।
इसके साथ ही, हमारी अपनी भारतीय कंपनियों ने भी विदेशों के बिजनेस में जमकर निवेश किया, जो लगभग 33.3 अरब डॉलर रहा। इस आने और जाने के फेरबदल की वजह से जो शुद्ध बचत यानी नेट फायदा भारत को मिलना चाहिए था, वह थोड़ा सीमित रह गया।
सिंगापुर और अमेरिका से आया सबसे ज्यादा फंड!
आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि भारत के किस सेक्टर को विदेशियों ने सबसे ज्यादा पसंद किया। इस लिस्ट में हमेशा की तरह सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) सबसे आगे रहा। इसके बाद दूसरे नंबर पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर रहा।
अगर देशों की बात करें, तो भारत में आने वाले कुल विदेशी निवेश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा मुख्य रूप से 6 जगहों से आया। इनमें सिंगापुर, अमेरिका, मॉरीशस, जापान, नीदरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) शामिल हैं।
विदेशी मुद्रा भंडार में 30.8 अरब डॉलर की गिरावट
आरबीआई ने रिपोर्ट में एक बड़ी चेतावनी भी दी है। भले ही एफडीआई बढ़ा है, लेकिन कुल मिलाकर दुनिया का आर्थिक माहौल इस समय काफी चुनौतीपूर्ण है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच देश में आने वाला कुल शुद्ध पूंजी प्रवाह (नेट कैपिटल इनफ्लो) घट गया। यह इतना कम था कि हमारे चालू खाता घाटे (CAD - करंट अकाउंट डेफिसिट) यानी देश के खर्चों की भरपाई नहीं कर सका।
जब बाहर से आने वाला कुल पैसा हमारे खर्चों से कम पड़ जाता है, तो देश को अपनी जेब से भुगतान करना पड़ता है। इसी वजह से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व्स) में 30.8 अरब डॉलर की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
मार्च में हुआ सबसे बड़ा नुकसान
शेयर बाजार के लिहाज से भी पिछला साल काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने पूरे साल बाजार में अनिश्चितता बनाए रखी और कुल मिलाकर 16.5 अरब डॉलर की शुद्ध निकासी की। इसमें सबसे बड़ा झटका मार्च 2026 में लगा, जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और तनाव शुरू हो गया। इस युद्ध के डर से विदेशी निवेशकों ने सिर्फ एक महीने में ही भारतीय शेयर बाजार से 13.1 अरब डॉलर निकाल लिए।
हालांकि, इन सब अनिश्चितताओं के बीच सुरक्षित निवेश माने जाने वाले बॉन्ड मार्केट (सरकारी और कॉपोरेट बॉन्ड्स) में निवेशकों ने थोड़ा भरोसा दिखाया और इसमें 2.1 अरब डॉलर का मामूली निवेश आया।
आरबीआई की रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि भारत में विदेशी निवेशकों का भरोसा अभी भी बना हुआ है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियां और पूंजी के बाहर जाने की रफ्तार चिंता का विषय बनी हुई हैं।