
Retail Inflation: आम आदमी के लिए महंगाई के मामले में एक बड़ी खबर सामने आई है। देश में रिटेल महंगाई फरवरी में बढ़कर 3.21 फीसदी हो गई है। इसके पहले जनवरी में यह 2.74 फीसदी के स्तर पर रही थी। मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन यानी NSO की ओर से आज (12 मार्च 2026) ये आंकड़े जारी किए गए हैं। महंगाई के यह आंकड़े आधार वर्ष 2024 वाली नई सीरीज पर आधारित हैं। नए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों की तुलना पिछले साल की इसी अवधि से नहीं की जा सकती, क्योंकि जनवरी में इंडेक्स बास्केट को बदल दिया गया था।
जनवरी में रिटेल महंगाई 2.75% दर्ज की गई थी। यह नए सीरीज का पहला आंकड़ा था, जिसमें 2024 को बेस ईयर माना गया है। नए सीरीज के अनुसार फरवरी में खाद्य महंगाई बढ़कर 3.47 फीसदी हो गई। वहीं जनवरी में खाद्य महंगाई 2.13% रही थी। वहीं पुराने CPI सीरीज (जिसमें 2012 बेस ईयर था) के अनुसार दिसंबर में महंगाई 1.33% और नवंबर में 0.71% दर्ज की गई थी।
ग्रामीण इलाकों में महंगाई जनवरी के 2.73% से बढ़कर फरवरी में 3.37% हो गई। वहीं शहरी महंगाई 2.75% से बढ़कर 3.02% रही। हालांकि यह अब भी रिजर्व बैंक के मध्यम अवधि के 4% लक्ष्य से नीचे है। पूरे भारत में कुछ रसोई से जुड़ी चीजों की कीमतों में गिरावट भी जारी रही। फरवरी में लहसुन की महंगाई दर -31.09% रही, जो जनवरी में -53.03% थी। प्याज की कीमतों में भी गिरावट जारी रही और इसकी महंगाई -28.20% रही, जो एक महीने पहले -29.30% थी। वहीं आलू की कीमतें भी कम रहीं और इसकी महंगाई -18.46% दर्ज की गई, जबकि जनवरी में यह -28.98% थी।
महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खाने-पीने की चीजों के दामों का बढ़ना है। फूड इन्फ्लेशन फरवरी में बढ़कर 3.47% पर पहुंच गया। जनवरी में यह आंकड़ा केवल 2.13% था। ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों में महंगाई थोड़ी कम रही। ग्रामीण महंगाई जनवरी के 2.73% से बढ़कर 3.37% हो गई, जबकि शहरी महंगाई 2.75% से बढ़कर 3.02% रही।
खुदरा महंगाई सीधे तौर पर ग्राहकों की खपत और खर्च को बताती है। यही वजह है कि रिजर्व बैंक अपनी पॉलिसी बनाते समय रिटेल महंगाई पर ही फोकस रखता है। अगर रिटेल महंगाई उसके तय दायरे के बाहर चली जाती है तो फिर कर्ज के सस्ता होने की उम्मीद भी कम हो जाएगी। रेपो रेट में कोई भी कटौती तभी संभव है, जबकि रिटेल महंगाई का आंकड़ा रिजर्व बैंक की ओर से तय किए गए मानक यानी दायरे के भीतर रहे।
बदले हुए CPI इंडेक्स में एक बड़ा बदलाव यह है कि खाने की चीजों का वेटेज (हिस्सा) कम हो गया है। खाने की चीजों का वेटेज पहली बार 40 फीसदी से कम हो गया है। वहीं नॉन-फूड कैटेगरी अब इंडेक्स में 60 फीसदी से अधिक हैं, जो पहले लगभग 45 फीसदी था। साथ ही, ग्रामीण खपत को ज्यादा असरदार वजन दिया गया है, जो कुल मांग में इसके बढ़ते योगदान को दिखाता है।
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