
Retail Inflation: भारत में रिटेल महंगाई दिसंबर में बढ़कर 1.3% हो गई, जो नवंबर में 0.7% थी। यह पिछले तीन महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। आंकड़े बताते हैं कि खाने-पीने की चीजों में आई गिरावट की रफ्तार अब धीमी पड़ने लगी है और पिछले साल के कम बेस का असर भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। सांख्यिकी मंत्रालय (statistics ministry) की ओर से डेटा जारी किया गया है। इससे पहले सितंबर में महंगाई दर 1.44 प्रतिशत के स्तर पर थी।
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़त और कम आधार प्रभाव की वजह से मामूली बढ़ोतरी देखने को मिली। दिसंबर के ये आंकड़े 1 फरवरी को आने वाले केंद्रीय बजट 2026-27 और 4 से 6 फरवरी तक होने वाली आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक से ठीक पहले आए हैं। दिसंबर में महंगाई के आंकड़े लगातार 11वें महीने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4% के टारगेट से नीचे रहे हैं। वस्तुओं की कीमतों में सालाना बढ़ोतरी का कारण सब्जियां, दालें, मसाले, अंडे, मांस और मछली जैसे खाने-पीने की चीजों और पर्सनल केयर और इस्तेमाल की चीजों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी है। पिछले एक साल में ये चीजें महंगी हो गई हैं।
कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स में करीब 40% हिस्सेदारी रखने वाली फूड इन्फ्लेशन दिसंबर में -2.7% रही। हालांकि नवंबर में यह -3.9% थी। यानी फूड प्राइस में गिरावट अभी बनी हुई है, लेकिन उसकी तीव्रता कम हो रही है। जून 2025 से शुरू हुई फूड डिफ्लेशन की स्थिति अब खत्म होने के करीब मानी जा रही है। दिसंबर के आंकड़ों के साथ FY26 की तीसरी तिमाही में औसत खुदरा महंगाई 0.8% रही, जो RBI के 0.6% के अनुमान से थोड़ी ज्यादा है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में केंद्रीय बैंक की नीति थोड़ी सतर्क हो सकती है।
सरकारी आंकड़े के मुताबिक दिसंबर 2025 में सालाना आधार पर महंगाई के मामले में केरल सबसे ऊपर रहा, जहां महंगाई दर करीब 9.49% दर्ज की गई। इसके बाद कर्नाटक में 2.99%, आंध्र प्रदेश में 2.71%, तमिलनाडु में 2.67% और जम्मू-कश्मीर में 2.26% की महंगाई रही।
महंगाई का बढ़ना और घटना प्रोडक्ट की डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करता है। अगर लोगों के पास पैसे ज्यादा होंगे तो वे ज्यादा चीजें खरीदेंगे। ज्यादा चीजें खरीदने से चीजों की डिमांड बढ़ेगी और डिमांड के मुताबिक सप्लाई नहीं होने पर इन चीजों की कीमत बढ़ेगी। इस तरह बाजार महंगाई की चपेट में आ जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो बाजार में पैसों का अत्यधिक बहाव या चीजों की शॉर्टेज महंगाई का कारण बनता है। वहीं अगर डिमांड कम होगी और सप्लाई ज्यादा तो महंगाई कम होगी।
एक ग्राहक के तौर पर आप और हम रिटेल मार्केट से सामान खरीदते हैं। इससे जुड़ी कीमतों में हुए बदलाव को दिखाने का काम कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी CPI करता है। हम सामान और सर्विसेज के लिए जो औसत मूल्य चुकाते हैं, CPI उसी को मापता है।
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