
Indian Pharma US Tariffs: ग्लोबल फार्मास्यूटिकल सेक्टर में बड़े बदलावों की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। एक तरफ जहां अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक ट्रेड डायनेमिक्स भारतीय जेनेरिक दवाओं के दबदबे को चुनौती दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दवा की खोज से लेकर रेग्युलेटरी प्रोसेस तक की तस्वीर बदल रहा है। इस अहम मोड़ पर रे नियो फार्मा के चेयरमैन और आईटी-इन्वेस्टमेंट जगत के दिग्गज अमित पटनी ने भारत की वैश्विक स्थिति और फार्मा में AI के भविष्य को लेकर मिंट हिंदी से बातचीत की। उन्होंने बताया कि कैसे AI और यूएस का टैरिफ भारत के फॉर्मा के बिजनेस के समीकरणों को कैसे बदल सकता है।
सवाल 1: भारत लंबे समय से 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' के रूप में पहचाना जाता है, लेकिन बदलते वैश्विक व्यापार समीकरणों और अमेरिका की ओर से प्रस्तावित टैरिफ के बीच क्या भारत ग्लोबल जेनेरिक दवा बाजार में अपना नेतृत्व बनाए रख सकता है?
जवाब: भारत 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' के रूप में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रख सकता है, लेकिन बदलते वैश्विक हालात के साथ इस नेतृत्व का तरीका भी बदलना होगा। भारत ने कम लागत पर उत्पादन, बड़े पैमाने पर जेनेरिक दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग, मजबूत फॉर्मुलेशन क्षमता और रेगुलेटरी विशेषज्ञता के दम पर वैश्विक फार्मा बाजार में अपनी जगह बनाई है। इसका अनुकूल व्यापार संतुलन और बढ़ते फार्मा निर्यात, दोनों इस क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को दिखाते हैं।
हालांकि, वैश्विक फार्मा कारोबार तेजी से बदल रहा है। अमेरिका की ओर से दवाओं पर प्रस्तावित टैरिफ का असर भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात की लागत और कारोबार पर पड़ सकता है। ऐसे में कंपनियों को अपनी मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं, सप्लाई चेन और निवेश योजनाओं पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है, खासकर उन मामलों में जहां अमेरिका में ही स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग से टैरिफ का फायदा मिल सकता है। इसके साथ ही, अमेरिकी बाजार पर ज्यादा निर्भर रहने के बजाय भारतीय कंपनियों को दूसरे देशों में भी अपने निर्यात का विस्तार करना होगा।
भारतीय फार्मा उद्योग के सामने एक बड़ी चुनौती दवाई और जरूरी कच्चे माल के आयात पर निर्भरता है, खासकर चीन से होने वाले आयात की। कुछ महत्वपूर्ण उत्पादों के मामले में ये निर्भरता काफी ज्यादा है। इसलिए भारत में दवाई और उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत बनाना जरूरी है।इससे मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता और सप्लाई चेन की मजबूती भी बढ़ेगी।
भारत की फार्मा इंडस्ट्री की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि वो दवाई पर निर्भरता कितनी कम करती है, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और अनुसंधान व विकास में कितना निवेश करती है, वैश्विक सप्लाई चेन को कितना मजबूत बनाती है और फार्मास्युटिकल वैल्यू चेन में कितनी तेजी से आगे बढ़ती है।
सवाल 2: दवा की खोज से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, क्वालिटी कंट्रोल और कारोबार तक AI तेजी से फार्मा इंडस्ट्री का हिस्सा बन रहा है। फार्मा वैल्यू चेन के अलग-अलग स्तरों पर एआई की बढ़ती भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब: एआई अब दवा उद्योग के लगभग हर स्तर पर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। दवाओं की खोज और फॉर्मुलेशन तैयार करने से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, क्वालिटी, रेगुलेटरी कामकाज और कारोबार तक इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। हालांकि, एआई की सबसे बड़ी उपयोगिता वैज्ञानिक विशेषज्ञता की जगह लेना नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की क्षमता को बढ़ाना, फैसले लेने की प्रक्रिया को तेज करना और डेटा के आधार पर बेहतर तरीके से काम करने में मदद करना है।
अनुसंधान और विकास और दवा की खोज में एआई, मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग की मदद से नए लक्ष्यों की पहचान, मॉलिक्यूल डिजाइन, वर्चुअल स्क्रीनिंग, फॉर्मुलेशन को बेहतर बनाने और दवाओं के गुणों का अनुमान लगाने जैसे काम तेजी से किए जा सकते हैं। फॉर्मुलेशन तैयार करने के दौरान एआई वैज्ञानिकों को सही अनुद्रव्य चुनने, उनकी अनुकूलता और स्थिरता का अनुमान लगाने में मदद कर सकता है। इससे बार-बार प्रयोग करने की जरूरत कम होगी और दवा के विकास में लगने वाला समय भी घट सकता है।
मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी के क्षेत्र में एआई मशीनों की समय से पहले मेंटेनेंस की जरूरत पहचानने, उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाने, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, प्रक्रिया में आए विचलन की जांच करने और डेटा के ट्रेंड समझने में मदद कर सकता है। प्रोसेस एनालिटिकल टेक्नोलॉजी (पीएटी) और लगातार चलने वाली मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं के साथ एआई का इस्तेमाल फार्मा उत्पादन को समस्या आने के बाद कार्रवाई करने वाली व्यवस्था से बदलकर पहले से समस्या का अनुमान लगाने और उसे रोकने वाली व्यवस्था में बदल सकता है।
हालांकि, फार्मा सेक्टर में एआई को सफलतापूर्वक अपनाने के लिए सिर्फ तकनीक पर्याप्त नहीं है। डेटा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता, साइबर सुरक्षा, बौद्धिक संपदा, एआई मॉडल की पारदर्शिता, उसकी सही तरीके से जांच और रेगुलेटरी मंजूरी जैसी चुनौतियों पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।
सवाल 3: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी कंट्रोल से लेकर रेगुलेटरी अनुपालन तक फार्मा इंडस्ट्री के काम करने के तरीके को तेजी से बदल रहा है। आपके अनुसार अगले पांच वर्षों में एआई का सबसे बड़ा प्रभाव किन क्षेत्रों में देखने को मिलेगा?
जवाब: अगले 5 सालों में एआई का सबसे बड़ा असर दवा की खोज और शुरुआती स्तर पर फॉर्मुलेशन डिजाइन के क्षेत्र में देखने को मिल सकता है। इसके अलावा, क्वालिटी से जुड़े डॉक्यूमेंट और डेटाबेस तैयार करने के साथ जरूरी इनपुट उपलब्ध कराने में भी एआई की भूमिका बढ़ेगी। रेगुलेटरी डोजियर की समीक्षा में भी एआई का इस्तेमाल बड़े स्तर पर बढ़ने की संभावना है।
अमित पटनी ने साफ कहा कि भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के सामने अगली चुनौती सिर्फ ज्यादा दवाएं बनाना या कम कीमत पर एक्सपोर्ट करना नहीं है। इस सेक्टर को API निर्भरता कम करने, सप्लाई चेन मजबूत करने, R&D और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में निवेश बढ़ाने और वैल्यू चेन में ऊपर जाने की जरूरत होगी।
अमित पटनी कंप्यूटर्स के सह-संस्थापक और प्रमोटर रहे हैं, जिसे उन्होंने $1.5 बिलियन के आईटी पावरहाउस के रूप में विकसित किया। पीसीएस टेक्नोलॉजीज में उन्होंने एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं, ग्लोबल हार्डवेयर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम और शुरुआती हेल्थकेयर मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी को विकसित करने की जिम्मेदारी संभाली।निवेश के क्षेत्र में भी अमित की रणनीतिक समझ काफी व्यापक रही है। वो निरवाना वेंचर एडवाइजर्स के को-फाउंडर और चेयरमैन हैं, साथ ही रे इन्वेस्टमेंट्स के फाउंडर भी हैं।
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