सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक रियल एस्टेट कंपनी को एक जमीन खरीदार को 18 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ 43 लाख रुपये से अधिक की मूल रकम वापस करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) द्वारा तय की गई मुआवजे की राशि बढ़ा दी।
सुप्रीम कोर्ट ने निकाल दी बिल्डर की हेकड़ी
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मेसर्स बिजनेस पार्क टाउन प्लानर्स लिमिटेड द्वारा भुगतान किए जाने वाले 43 लाख रुपये से अधिक की राशि पर ब्याज की दर नौ प्रतिशत तय की थी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कंपनी के खिलाफ रजनीश शर्मा नामक व्यक्ति की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। उन्होंने 2006 में एक जमीन की बुकिंग में अनुचित देरी, अनुचित शुल्क और उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने दोगुना कर दी ब्याज दर
पीठ ने कहा कि उसे अपनी चूक के लिए नाममात्र की देयता से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जबकि उसने खरीदार द्वारा की गई चूक पर 18 प्रतिशत की दर से ब्याज लिया। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने प्रतिवादी को 18 फीसदी सालाना ब्याज के साथ मूल राशि खरीदार को वापस करने को कहा। रजनीश शर्मा ने 10 मार्च, 2006 को प्रतिवादी की परियोजना 'पार्क लैंड' में 36.03 लाख रुपये में एक जमीन बुक किया और 7.86 लाख रुपये का अग्रिम भुगतान (Advance Payment) किया।
पार्क लैंड में जमीन खरीद का था मामला
दिसंबर 2007 में हस्ताक्षरित समझौते के अनुसार, कंपनी को सेवा योजनाओं के अनुमोदन के 24 महीनों के भीतर कब्जा देना अनिवार्य था। अनुबंध में देर से भुगतान करने पर खरीदारों पर 18 प्रतिशत वार्षिक जुर्माने का भी प्रावधान था, लेकिन वर्ष 2015 तक कुल 43.13 लाख रुपये का भुगतान करने के बावजूद शर्मा को कब्जा नहीं मिला। इसके बजाय बिल्डर ने भुगतान में कथित देरी के लिए शर्मा से 18 प्रतिशत ब्याज वसूला। शर्मा ने मार्च 2017 में समझौता रद्द कर दिया और हर्जाने के साथ-साथ पैसे वापस करने की मांग की। इसके बाद शर्मा ने वर्ष 2018 में एनसीडीआरसी में गुहार लगाई।