
Tata Sons: भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूह टाटा ग्रुप में इस वक्त अंदर ही अंदर हलचल तेज है। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को पांच साल का तीसरा कार्यकाल देने पर फैसला फिलहाल टाल दिया गया है। मंगलवार को हुई बोर्ड बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई, लेकिन अंतिम निर्णय नहीं हो पाया। बताया जा रहा है कि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने कुछ गंभीर सवाल उठाए, जिसके बाद मामला आगे के लिए टाल दिया गया। यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच चल रही खींचतान खुलकर सामने आ गई है।
सूत्रों के मुताबिक, मंगलवार को बॉम्बे हाउस में करीब तीन घंटे चली बैठक में नोएल टाटा ने समूह की कुछ कंपनियों के प्रदर्शन पर सवाल उठाए।
टाटा संस ने हाल के वर्षों में एयर इंडिया, टाटा डिजिटल और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स में 11 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। पिछले साल एयर इंडिया का राजस्व ₹78,636 करोड़ रहा, लेकिन कंपनी को ₹10,895 करोड़ का घाटा हुआ, जो समूह में सबसे ज्यादा है। टाटा डिजिटल को ₹4,610 करोड़ और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स को ₹70 करोड़ का नुकसान हुआ। इन्हीं आंकड़ों को लेकर नोएल टाटा ने प्रबंधन से जवाब मांगा। नोएल टाटा का रुख साफ था- सिर्फ विस्तार काफी नहीं है, इन बिजनेस को संभालने और मुनाफे में लाने का रोडमैप क्या है।
उन्होंने यह भी जानना चाहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के साथ टाटा संस को प्राइवेट कंपनी बनाए रखने को लेकर क्या बातचीत चल रही है और प्रबंधन का रुख क्या है। इन सवालों के बाद बोर्ड ने चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल पर निर्णय फिलहाल टाल दिया। मालूम हो कि टाटा संस बोर्ड में एन. चंद्रशेखरन, नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, ग्रुप CFO सौरभ अग्रवाल और स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी व अनीता मरंगोली जॉर्ज शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जुलाई 2025 में टाटा ट्रस्ट्स की दो प्रमुख इकाइयों सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) ने चंद्रशेखरन को तीसरा कार्यकाल देने को मंजूरी दे दी थी। यहां तक कि उनके 65 वर्ष की आयु सीमा से आगे काम करने के लिए नियमों में ढील देने पर भी सहमति बनी थी। चंद्रशेखरन, जो जून में 63 वर्ष के हो जाएंगे, का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 तक है। माना जा रहा था कि समय से पहले ही नवीनीकरण हो जाएगा, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है।
नोएल टाटा के चेयरमैन बनने के बाद से टाटा ट्रस्ट्स के भीतर मतभेदों की खबरें आती रही हैं। रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा ने ट्रस्ट की कमान संभाली। तब से लेकर अब तक कई बड़े बदलाव हुए हैं। पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को टाटा संस बोर्ड से हटाया गया। मेहली मिस्त्री, जो रतन टाटा के करीबी माने जाते थे, ट्रस्ट्स बोर्ड से बाहर हो गए। नेविल टाटा को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) के बोर्ड में शामिल किया गया, लेकिन सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) में उनकी एंट्री पर वीनू श्रीवासन जैसे पुराने दिग्गजों ने आपत्ति जताई। नतीजा यह हुआ कि आपसी सहमति न होने के कारण पिछले तीन महीनों में दो बैठकें रद्द करनी पड़ीं।
सूत्रों के मुताबिक, नोएल टाटा ने निजी बातचीत में टाटा संस के नेतृत्व ढांचे में बदलाव का सुझाव दिया था। उन्होंने चेयरमैन, CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर की भूमिकाओं को अलग करने का विचार रखा था। हालांकि इस पर सहमति नहीं बन पाई।
टाटा ट्रस्ट्स एक छत्र संगठन है, जिसमें 15 परोपकारी इकाइयां शामिल हैं। इनमें से सात टाटा संस में हिस्सेदारी रखती हैं। SDTT के पास 27.98% और SRTT के पास 23.56% हिस्सेदारी है। JRD टाटा ट्रस्ट के पास 4.01%, टाटा एजुकेशन ट्रस्ट और टाटा सोशल वेलफेयर ट्रस्ट के पास 3.73% हिस्सेदारी है। शापूरजी पालोनजी ग्रुप की हिस्सेदारी 18.38% है। यह संरचना बताती है कि ट्रस्ट्स का टाटा संस पर कितना प्रभाव है।
टाटा ग्रुप आज $300 बिलियन से ज्यादा का साम्राज्य है। चंद्रशेखरन ने 2017 से ग्रुप को एक नई ऊंचाई दी है, लेकिन अब उन्हें नोएल टाटा के कड़े पैमानों पर खरा उतरना होगा। फिलहाल फैसला टलने का मतलब यह नहीं है कि वे हट रहे हैं, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि अब बॉम्बे हाउस में हर फैसले का बारीकी से ऑडिट होगा। आने वाले महीनों में टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच का यह वार-पलटवार भारतीय बिजनेस जगत की सबसे बड़ी खबर बनी रहेगी।
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