आने वाले केंद्रीय बजट में मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए बड़ा दांव खेल सकती है। आगामी 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट में सरकार कारोबार करना आसान बनाने, टैक्स सिस्टम को सरल करने और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाने के उपायों का ऐलान कर सकती है। यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है, जब अमेरिका की ओर से लगाए गए सख्त टैरिफ, खासकर डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के चलते, भारत के निर्यात और ग्रोथ आउटलुक पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में सरकार कंप्लायंस आसान करने और इंपोर्ट ड्यूटी सिस्टम को सरल बनाने की दिशा में कदम उठा सकती हैं। आइए जानते हैं पूरी खबर को विस्तार से।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
एक्सपर्ट्स का मानना है कि निजी निवेश फिलहाल कमजोर बना हुआ है। कंपनियों की कमाई सुस्त है और विदेशी निवेश में भी उतार-चढ़ाव दिख रहा है। ईटी में छपी खबर के अनुसार, ऐसे में सरकार की नजर पब्लिक स्पेंडिंग बढ़ाने पर है, ताकि ग्रोथ को सपोर्ट मिल सके। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण छोटे कारोबारियों के लिए कंप्लायंस आसान करने और इंपोर्ट ड्यूटी सिस्टम को सरल बनाने की दिशा में कदम उठा सकती हैं। CRISIL के चीफ इकोनॉमिस्ट धर्मकीर्ति जोशी के मुताबिक, यह बजट ‘रेजिलिएंस और ग्रोथ’ दोनों पर फोकस करेगा, जहां सुधारों के जरिए निजी निवेश को प्रोत्साहन देने की कोशिश होगी।
सरकारी कर्ज सीमित रखने की कोशिश
ब्लूमबर्ग के सर्वे के मुताबिक, अगले वित्त वर्ष के लिए सरकार का कैपिटल एक्सपेंडिचर 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। यह चालू साल के 11.2 लाख करोड़ रुपये से काफी अधिक है। यह खर्च मुख्य रूप से सड़कों, बंदरगाहों और एनर्जी सेक्टर में किया जा सकता है। इसके अलावा, पिछले साल पाकिस्तान के साथ हुए सैन्य तनाव के बाद रक्षा बजट में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य वित्तीय घाटे को अगले साल GDP के 4.2 पर्सेंट तक लाना है और 2030-31 तक सरकारी कर्ज को GDP के 50 पर्सेंट के आसपास सीमित रखना है।
राजनीतिक तौर पर भी बजट अहम
बढ़ते खर्च के लिए सरकार RBI और अन्य वित्तीय संस्थानों से मिलने वाले डिविडेंड पर ज्यादा भरोसा कर सकती है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस साल करीब 3 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड मिल सकता है। वहीं, एसेट सेल्स से लगभग 50 हजार करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद है, जिससे संकेत मिलता है कि विनिवेश की रफ्तार फिलहाल धीमी रह सकती है। राजनीतिक तौर पर भी यह बजट अहम माना जा रहा है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सरकार कुछ लोकलुभावन कदम उठा सकती है।