बजट में रोजगार पर होगा खास फोकस, मजदूरी से नौकरी तक के लिए बनेगी रणनीति?

गांवों में अब 100 नहीं बल्कि 125 दिन के काम की गारंटी मिलेगी। बजट 2026 में मोदी सरकार मनरेगा को नई 'विकसित भारत गारंटी' (VB-GRAM G) योजना से बदलने और युवाओं के लिए नौकरियों का पिटारा खोलने की बड़ी तैयारी में है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड21 Jan 2026, 02:13 PM IST
बजट 2026 से उम्मीदें। (सांकेतिक तस्वीर)
बजट 2026 से उम्मीदें। (सांकेतिक तस्वीर)

आने वाले केंद्रीय बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने वाली है। केंद्र सरकार दशकों पुरानी 'मनरेगा' (MGNREGA) योजना को एक नए और अधिक सशक्त अवतार 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण' (VB-G RAM G) के रूप में पेश करने की तैयारी कर रही है।

ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया है कि यह केवल नाम का बदलाव नहीं है, बल्कि काम के अवसरों का विस्तार है। जहां मनरेगा में अब तक 100 दिनों के रोजगार का वादा था, वहीं नई योजना के तहत ग्रामीणों को साल में 125 दिनों के काम की गारंटी मिलेगी।

रोजगार योजना का पुराने से नए की ओर एक सुरक्षित सफर

सरकार इस बदलाव को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित 'ग्लाइड पाथ' के जरिए लागू करना चाहती है। बजट में मनरेगा और नई जी राम जी योजना, दोनों के लिए अलग-अलग फंड का प्रावधान किया जाएगा।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब तक नई योजना पूरी तरह जमीन पर न उतर जाए, तब तक रोजगार की मांग करने वाले किसी भी ग्रामीण को खाली हाथ न लौटना पड़े। राज्यों को इस नई व्यवस्था में ढलने के लिए छह महीने का 'ट्रांजिशन पीरियड' दिया जाएगा। इस दौरान पुरानी और नई व्यवस्थाएं साथ-साथ चलेंगी ताकि भुगतान और काम की निरंतरता बनी रहे।

फंडिंग का नया गणित- केंद्र और राज्यों की साझी भागीदारी

नई योजना के लिए सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 1.51 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम खाका तैयार किया है। इसमें से 95,600 करोड़ रुपये केंद्र सरकार देगी, जबकि बाकी हिस्सा राज्यों को वहन करना होगा।

हालांकि, फंडिंग का पैटर्न मनरेगा से थोड़ा अलग होगा। अधिकांश राज्यों में केंद्र 60% खर्च उठाएगा, लेकिन पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र 90% तक की मदद जारी रखेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निवेश न केवल ग्रामीणों की आय बढ़ाएगा, बल्कि गांव के बुनियादी ढांचे को भी मजबूती देगा।

शहरी युवाओं और कौशल विकास पर दांव

बजट केवल गांवों तक सीमित नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, शहरी बेरोजगारी दर (6.7%) और युवा बेरोजगारी (14.8%) अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। अर्थशास्त्रियों की राय है कि इस बार बजट में 'कैपिटल एक्सपेंडिचर' को 12 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।

सरकार का ध्यान मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों पर है, ताकि ज्यादा से ज्यादा युवाओं को फॉर्मल सेक्टर में नौकरियां मिल सकें। साथ ही, सरकारी विभागों में खाली पड़े लगभग 75,000 पदों को भरने के लिए बड़े भर्ती अभियानों की घोषणा भी संभव है।

आत्मनिर्भर भारत की रीढ़ स्किलिंग और MSME

बेरोजगारी दर के उतार-चढ़ाव के बीच, असली चुनौती 'लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट' (LFPR) को बढ़ाना है। भारत में यह फिलहाल 56.1% है, जिसे चीन (65.4%) के स्तर तक ले जाने की जरूरत है।

इसके लिए बजट में एमएसएमई सेक्टर को मजबूती देने और 'स्किल इंडिया' के तहत नए स्किलिंग प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ा आवंटन होने की उम्मीद है। कृषि क्षेत्र में छिपी हुई बेरोजगारी को दूर करने के लिए बागवानी और खाद्य प्रसंस्करण जैसे हाई-वैल्यू सेक्टर्स को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि उद्यमी भी बन सकें।

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