Exclusive Interview: देश में मैन्युफैक्चरिंग का क्या अनुभव? यूनिक्स इंडिया के को-फाउंडर ने बताई मैन्युफैक्चरिंग की बात

चाइना+1 की लहर में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग कहां खड़ा है? ड्यूटी घटी तो फायदा किसे उपभोक्ता को या आयातक को? यूनिक्स इंडिया के को-फाउंडर इमरान कागलावाला से मिंट हिंदी की खास बातचीत।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड8 Jun 2026, 01:47 PM IST
इमरान कागलावाला, को-फाउंडर, यूनिक्स इंडिया
इमरान कागलावाला, को-फाउंडर, यूनिक्स इंडिया

केंद्र सरकार ने हाल ही में 6 सेक्टर-विशेष कार्य समूह बनाए हैं, जिनका काम ऐसे 100 उत्पादों की पहचान करना है जिनका भारत में उत्पादन नहीं होता या मांग के मुकाबले बेहद कम होता है। फार्मास्युटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव, एनर्जी और डिफेंस जैसे अहम सेक्टर इस पहल में शामिल हैं। सरकार की मंशा साफ है कि आयात पर निर्भरता घटाओ, घर में बनाओ। लेकिन जब तक नीति कागज पर है, जमीन पर क्या हो रहा है?

क्या भारतीय उद्योग इस अवसर के लिए सच में तैयार है? इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढने के लिए मिंट हिंदी ने बात की यूनिक्स इंडिया के को-फाउंडर इमरान कागलावाला से। यूनिक्स इंडिया एक ऐसा घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड है, जो हर रोज चीन और वियतनाम से मुकाबला करते हुए 'मेड इन इंडिया' को असली अर्थ देने की कोशिश कर रहा है।

प्रश्न: 'चाइना+1' रणनीति के तहत भारत को अगले वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित किया जा रहा है। एक मध्यम आकार के ब्रांड के नजरिए से देखें तो आज भारत वास्तव में किन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी है और किन क्षेत्रों में अभी भी लागत एवं पैमाने पर चीन या वियतनाम से पीछे है?

इमरान कागलावाला: पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वैश्विक विनिर्माण में अपनी जगह काफी मजबूत की है, खासकर असेंबली, प्रोडक्ट इंटीग्रेशन, डिजाइन-आधारित विनिर्माण और बड़े पैमाने पर अंतिम उत्पादन के क्षेत्रों में। ये वे हिस्से हैं जहां हम अब वास्तव में प्रतिस्पर्धी बन रहे हैं और कुछ मामलों में वैश्विक स्तर पर अपनी जगह बना चुके हैं।

हालांकि, चीन और वियतनाम ने अभी भी संरचनात्मक रूप से मजबूत बढ़त बनाए रखे हैं। चीन की ताकत उसके पुर्जों के एकीकृत ढांचे, बेमिसाल उत्पादन क्षमता और अत्यंत कुशल सप्लायर नेटवर्क में है, जो लागत और काम पूरा होने का समय दोनों को काफी कम करता है। वहीं वियतनाम ने अनुशासित निष्पादन और भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स के साथ निर्यात के लिए मजबूत मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार किया है।

भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन उस स्तर पर पूरी तरह टक्कर देने के लिए हमें अभी भी पुर्जों के मजबूत उत्पादन ढांचे, बेहतर लॉजिस्टिक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर और लंबी अवधि के पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करने वाली स्थिर नीतियों की जरूरत है।

प्रश्न: मोबाइल चार्जर्स और उनके पार्ट्स पर बेसिक कस्टम्स ड्यूटी को 20% से घटाकर 15% कर दी गई है। एक घरेलू निर्माता के लिए क्या कम ड्यूटी फायदेमंद है (सस्ते इनपुट्स) या खतरा (सस्ते फिनिश्ड आयात)? यूनिक्स के लिए कौन-सा प्रभाव ज्यादा दमदार है?

इमरान कागलावाला: यूनिक्स जैसी घरेलू कंपनियों के लिए बेसिक कस्टम्स ड्यूटी में यह कमी दो पहलू वाले असर डालती है। सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे आयातित पुर्जों की इनपुट लागत कम होती है, जिससे लागत दक्षता बेहतर होती है और कीमतों में थोड़ी लचीलापन मिलता है।

असली चिंता तब होती है जब बाहर से बनकर आने वाला सामान भी आयात करने पर सस्ता पड़ने लगता है। सस्ते आयात पर कड़े रोक-थाम वाले नियमों की कमी के कारण, विदेशी कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन और अपनी सरकार से मिलने वाली छूट का फायदा उठाकर हमारे बाजार में बहुत सस्ते दाम पर सामान उतार देती हैं। इससे उन भारतीय कंपनियों पर दबाव बढ़ता है जो नियम-कानूनों का पालन करने, अच्छी क्वॉलिटी देने, नेटवर्क बनाने और स्थानीय लोगों को रोजगार देने में पैसा लगा रही हैं।

इसलिए, भले ही कच्चे माल पर मिलने वाला फायदा सच है, लेकिन बाहर से आने वाले तैयार माल की वजह से जो कड़ा मुकाबला मिल रहा है, वह हमारे लिए कहीं ज्यादा बड़ी चिंता है और हमें उस पर पैनी नजर रखनी होगी।

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प्रश्न: क्या बीसीडी में हुई कटौती वास्तव में उपभोक्ताओं तक कम कीमत के रूप में पहुंचेगी, या मार्जिन और डिस्काउंटिंग में चली जाएगी? स्पष्ट रूप से बताएं कि एक चार्जर की रिटेल कीमत पर क्या बदलाव आएगा?

इमरान कागलावाला: चार्जर्स और मोबाइल एक्सेसरीज जैसी बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धी कैटेगरी में आते हैं। लागत में होने वाले ज्यादातर फायदे अंततः उपभोक्ताओं तक ही पहुंचते हैं क्योंकि कीमत तय करने की गुंजाइश सीमित है और मुकाबला बहुत तेज है।

अगर हम 300 रुपये के आसपास कीमत वाले 20W चार्जर की बात करें, तो ड्यूटी में हुई कमी रिटेल प्राइस पर 3% से भी कम का असर डालने की संभावना है। व्यावहारिक रूप से, यह या तो मामूली कीमत में कमी के रूप में दिख सकता है या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर समय-समय पर मिलने वाली छूट में समा जाएगा।

हालांकि प्रोडक्ट लेवल पर यह बदलाव छोटा दिख सकता है, लेकिन उद्योग स्तर पर यह मांग के रुझान, प्रतिस्पर्धी स्थिति और वॉल्यूम ग्रोथ को काफी प्रभावित कर सकता है।

प्रश्न: भारत लंबे समय से लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ का उपयोग करता रहा है। क्या बीसीडी को कम करना संरक्षणवाद से खुली प्रतिस्पर्धा की ओर एक बदलाव का संकेत देता है, और क्या घरेलू तंत्र इसके लिए तैयार है?

इमरान कागलावाला: हां, यह कदम धीरे-धीरे अधिक खुले और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण माहौल की ओर बढ़ने का संकेत देता है। शुरुआती दौर में नए उद्योगों को पैर जमाने में मदद करने के लिए टैरिफ सुरक्षा ने हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन समय के साथ, लंबी अवधि की प्रतिस्पर्धात्मकता केवल सुरक्षा के भरोसे नहीं, बल्कि कार्यकुशलता, बड़े पैमाने पर उत्पादन, नए विचारों और एक मजबूत सप्लाई चेन से ही आती है।

आज का हमारा तंत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन यह अभी भी पूरी तरह तैयार होने के दौर में है। इससे पहले कि भारतीय विनिर्माण बिना किसी बाहरी या सरकारी मदद के वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर सके, हमें पुर्जों के उत्पादन की गहराई, सप्लायर नेटवर्क और माल ढुलाई की क्षमता को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

प्रश्न: इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में 'इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर', जहां तैयार माल पर इनपुट की तुलना में कम टैक्स लगता है, एक लगातार बनी रहने वाली शिकायत है। क्या यह यूनिक्स को नुकसान पहुंचाता है, और आप सरकार से इसके लिए कौन-सा एक सुधार चाहेंगे?

इमरान कागलावाला: हां, यह घरेलू निर्माताओं पर एक संरचनात्मक दबाव बनाता है। इसकी वजह से कभी-कभी देश में असेंबल या आंशिक रूप से बनाए गए उत्पादों की तुलना में बाहर से आयात किए गए तैयार माल की लागत कम हो जाती है। नतीजा यह होता है कि भारत में मूल्यवर्धन को बढ़ावा नहीं मिल पाता। उद्योग के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण जरूरत नीतियों में स्थिरता और निरंतरता की है।

मैन्युफैक्चरिंग एक लंबा निवेश चक्र है, जहां कंपनियां 5 से 7 साल आगे की योजना बनाकर फैसले लेती हैं। ऐसे में नीतियों में बार-बार होने वाले बदलाव या संरचनात्मक असंतुलन अनिश्चितता पैदा करते हैं। अल्पकालिक सुधारात्मक उपायों के बजाय एक स्थिर और दीर्घकालिक नीति ढांचा, जो स्पष्ट रूप से स्थानीय मूल्यवर्धन को प्रोत्साहित करे, इस पूरे तंत्र के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित होगा।

प्रश्न: एक्सेसरीज का बाजार बहुत प्रतियोगी है और बिना ब्रांड के आयातित सामानों से भरा पड़ा है। अमेजन और फ्लिपकार्ट पर लगातार डिस्काउंट देने के साथ-साथ आप आरएंडडी और गुणवत्ता में कैसे निवेश करते हैं? कारोबार की असली गणित क्या है?

इमरान कागलावाला: असलियत यह है कि यदि आप एक स्थायी और लंबे समय तक चलने वाला ब्रांड बनाना चाहते हैं, तो यह बाजार केवल कीमत के भरोसे नहीं चलाया जा सकता। डिस्काउंट देने से कम समय के लिए बिक्री तो बढ़ सकती है, लेकिन इससे दीर्घकालिक वैल्यू नहीं बनती।

हमारा दृष्टिकोण यह है कि हम सही उत्पादों के चयन और विशिष्ट श्रेणियों पर ध्यान केंद्रित करके आरएंडडी और क्वालिटी में सोच-समझकर निवेश करते हैं। हम उन उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं जहां उपभोक्ता को परफॉर्मेंस में सीधा अंतर महसूस हो, चाहे वह टिकाऊपन हो, चार्जिंग की स्थिरता हो, सुरक्षा हो या फिर डिजाइन की विश्वसनीयता। कारोबार तभी फायदेमंद होता है जब ब्रांड पर बार-बार भरोसा जताया जाए, न कि केवल डिस्काउंट से प्रेरित होकर एक बार का लेन-देन किया जाए।

प्रश्न: टियर 2 और टियर 3 भारत को विकास का अगला इंजन कहा जा रहा है। वहां का खरीदार मेट्रो शहरों के खरीदार से अलग क्या चाहता है- कम कीमत, टिकाऊपन या फीचर्स?

इमरान कागलावाला: टियर 2 और टियर 3 शहरों के उपभोक्ता मूल्य को लेकर जागरूक होते हैं, लेकिन उनके लिए वैल्यू का मतलब सिर्फ सबसे कम कीमत नहीं, बल्कि उत्पाद का टिकाऊपन और लंबे समय तक उस पर भरोसा होना है। इसके साथ ही, इन शहरों के उपभोक्ताओं की आकांक्षाएं तेजी से बढ़ रही हैं और वे डिजिटल दुनिया से गहराई से जुड़े हुए हैं। सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स के प्रभाव ने उन्हें डिजाइन, फीचर्स और ब्रांड अनुभव के प्रति कहीं ज्यादा जागरूक बना दिया है।

इसलिए, आज के समय में उनकी उम्मीद इन सब चीजों का एक सही संतुलन है- किफायती कीमत, भरोसेमंद परफॉर्मेंस और एक आधुनिक प्रोडक्ट का अहसास जो उनकी बदलती जीवनशैली और उम्मीदों से मेल खाता हो।

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प्रश्न: जेन जी तकनीक को केवल उपयोगिता से बदलकर अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा बना रही है। इसने यूनिक्स के डिजाइन और काम करने की रफ्तार को कैसे बदला है?

इमरान कागलावाला: जेन जी ने हमारे डिजाइन करने के नजरिए को पूरी तरह से बदल दिया है। उनके लिए, तकनीक सिर्फ काम आने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह उनकी व्यक्तिगत पहचान का एक हिस्सा है। इस वजह से परफॉर्मेंस के साथ-साथ खूबसूरती, बनावट और खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।

नतीजतन, अब हम फिनिशिंग, कलर, टेक्सचर और दृश्य पहचान जैसे डिजाइन तत्वों पर कहीं ज्यादा तेजी से काम करते हैं। इसका एक स्पष्ट उदाहरण एक्सेसरीज में पारदर्शी डिजाइन और आरजीबी-प्रेरित डिजाइन को शामिल करना है, जो युवा उपभोक्ताओं को काफी पसंद आते हैं। हमने इस बदलाव को अपनाने के लिए अपनी ब्रांड पहचान को भी नया रूप दिया है, जिसमें इस युवा वर्ग से बेहतर ढंग से जुड़ने के लिए हमारे लोगो और विजुअल सिस्टम को अपडेट करना शामिल है।

प्रश्न: अगले 3 से 5 सालों को देखें, तो यूनिक्स किस रास्ते पर चल रहा है? क्या वह अपने प्रोडक्ट्स को महंगा और ब्रांड को बड़ा बनाना चाहता है, या फिर कम कीमत रखकर ज्यादा से ज्यादा सामान बेचना चाहता है? आप दोनों काम पूरी तरह एक साथ नहीं कर सकते। कंपनी अपना ध्यान किस चीज पर लगा रही है?

इमरान कागलावाला: हमारा मानना है कि भारत में असली मौका 'बजट में प्रीमियम अनुभव' वाले वर्ग में है। इसका मतलब है कि प्रोडक्ट्स लोगों के बजट में भी हों, लेकिन उनकी क्वॉलिटी, डिजाइन और भरोसे के मामले में ग्राहकों को एक शानदार अनुभव मिले। भारत हमेशा से ऐसा बाजार रहा है जहां लोग कीमत पर बहुत ध्यान देते हैं, और आगे भी ऐसा ही रहेगा।

इसलिए हमारी रणनीति न तो बहुत महंगे प्रोडक्ट्स बनाने की है और न ही सिर्फ सस्ता और घटिया सामान बेचने की। इसके बजाय, हम अच्छे डिजाइन और भरोसेमंद प्रोडक्ट्स के दम पर अपना दायरा बढ़ाना चाहते हैं, जो कीमत और क्वॉलिटी दोनों के बीच बिल्कुल सही बैठते हों। इसी बीच के रास्ते से हमें लगातार बढ़त मिलेगी, ग्राहक बार-बार लौटकर आएंगे और लंबे समय के लिए ब्रांड की साख मजबूत होगी।

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