अमेरिका ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इजरायल और सऊदी अरब को बड़े हथियार सौदे की मंजूरी दे दी है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, दोनों देशों को मिलाकर यह डील करीब 15.67 अरब डॉलर की है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब ईरान पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंका जताई जा रही है। आधिकारिक बयान के अनुसार, इजरायल को करीब 6.67 अरब डॉलर और सऊदी अरब को 9 अरब डॉलर के हथियार बेचे जा रहे हैं। इस कदम को अमेरिका अपनी सुरक्षा रणनीति और क्षेत्रीय हितों से जोड़कर देख रहा है। आइए जानते हैं पूरी खबर को विस्तार से।
30 अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर भी शामिल
इजरायल को दिए जाने वाले हथियार चार अलग-अलग पैकेज में शामिल हैं। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा 30 अपाचे अटैक हेलिकॉप्टरों का है, जिनकी कीमत करीब 3.8 अरब डॉलर बताई गई है। ये हेलिकॉप्टर आधुनिक रॉकेट लॉन्चर और एडवांस टारगेटिंग सिस्टम से लैस होंगे। इसके अलावा, इजरायल 3,250 लाइट टैक्टिकल व्हीकल्स खरीदेगा, जिन पर करीब 1.98 अरब डॉलर खर्च होंगे। इन वाहनों का इस्तेमाल सैनिकों और लॉजिस्टिक सपोर्ट को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए किया जाएगा। वहीं, 2008 से इस्तेमाल में आ रहे आर्मर्ड पर्सनल कैरियर्स के लिए 740 मिलियन डॉलर के पावर पैक खरीदे जाएंगे। इसके अलावा, करीब 150 मिलियन डॉलर में कुछ लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर भी शामिल हैं।
सैन्य संतुलन पर असर नहीं
अमेरिकी विदेश मंत्रालय का कहना है कि इन हथियारों की बिक्री से क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बयान में साफ कहा गया है कि यह सौदा इजरायल की सुरक्षा क्षमता को मजबूत करेगा और उसे मौजूदा व भविष्य के खतरों से निपटने में मदद देगा। अमेरिका ने दोहराया कि इजरायल की सुरक्षा उसके राष्ट्रीय हितों से जुड़ी है और उसे आत्मरक्षा के लिए मजबूत बनाना जरूरी है। दूसरी ओर, सऊदी अरब 730 पैट्रियट एडवांस्ड कैपेबिलिटी-3 (PAC-3) मिसाइलें और उससे जुड़ा उपकरण खरीदेगा। ये मिसाइलें हवा और बैलिस्टिक मिसाइल हमलों से एकसाथ रक्षा करने में सक्षम मानी जाती हैं।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
यह ऐलान ऐसे वक्त पर हुआ है, जब सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने ट्रंप प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये हथियार सौदे गाजा युद्ध को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संघर्षविराम योजना से भी जुड़े हैं। हालांकि, सीजफायर अब तक काफी हद तक कायम है, लेकिन आगे की राह आसान नहीं मानी जा रही। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, हमास को निरस्त्र करना और तबाह गाजा के पुनर्निर्माण जैसी चुनौतियां अभी बाकी हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अमेरिका इन हथियार सौदों के जरिए अपने सहयोगियों को मजबूत कर क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है।