
Choice institutional equities report : अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध से मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत के चार प्रमुख सेक्टर्स पर देखने को मिल सकता है। ये चार सेक्टरहैं- डिफेंस, एफएमसीजी, ऑटो। ब्रोकरेज फर्म चॉइस इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह संकट जहां डिफेंस कंपनियों के लिए एक्सपोर्ट के नए मौके ला रहा है, वहीं एफएमसीजी, ऑटो और सीमेंट कंपनियों के लिए कच्चे माल और लॉजिस्टिक की लागत बढ़ा सकता है।
मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े डिफेंस मार्केट में से एक है। वैश्विक स्तर पर हथियारों के आयात में इसकी हिस्सेदारी करीब 30 से 35 प्रतिशत है। चॉइस इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के डिफेंस और एयरोस्पेस एनालिस्ट्स पुट्टा रवि कुमार और आशुतोष बागड़िया के अनुसार, 'खाड़ी देशों में डिफेंस बजट 10-15% बढ़ने से भारत जैसे उभरते सप्लायर्स के लिए 3 से 5 अरब डॉलर (करीब 25,000-40,000 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त एक्सपोर्ट मौका बन सकता है।' भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट वित्त वर्ष 2025 में 23,600 करोड़ रुपये रहा है। सरकार ने वित्त वर्ष 2029 तक इसे 50,000 करोड़ रुपये तक ले जाने का टारगेट रखा है।
भारतीय डिफेंस कंपनियां अब सिर्फ पार्ट्स सप्लाई करने के बजाय पूरे सिस्टम को एक्सपोर्ट करने पर फोकस कर रही हैं। इनमें ब्रह्मोस, आकाश, पिनाक और एंटी-ड्रोन सिस्टम शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 20,000 डॉलर वाले शाहेद जैसे सस्ते ड्रोन से निपटने के लिए किफायती एयर-डिफेंस सिस्टम की डिमांड बढ़ रही है।
इसका फायदा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), भारत डायनामिक्स (BDL), डेटा पैटर्न्स और जेन टेक्नोलॉजीज (Zen Technologies) जैसी कंपनियों को मिल सकता है। सरकारी कॉन्ट्रैक्ट होने के कारण सप्लाई चेन पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, हालांकि डिलीवरी का समय पर होना कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी।
कच्चे तेल और इससे बनने वाले डेरिवेटिव्स का एफएमसीजी सेक्टर के कच्चे माल में बड़ा हिस्सा होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ब्यूटी और पर्सनल केयर (BPC) कंपनियों की कुल कच्चा माल लागत में क्रूड का हिस्सा 30 से 40% तक होता है। इसलिए, क्रूड की कीमतों में लगातार होने वाले बदलाव से इन कंपनियों के ग्रॉस मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ेगा। चॉइस इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के एफएमसीजी और रिटेल एनालिस्ट प्रियम तोलिया की रिपोर्ट बताती है कि अगले 3-4 महीनों तक कच्चे तेल के बाजार में यह अस्थिरता बनी रह सकती है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें 100 से 130 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में जाती हैं, तो ज्यादातर बीपीसी कंपनियों के मार्जिन पर 100 से 250 बेसिस पॉइंट्स का असर पड़ सकता है। इस लागत को कवर करने के लिए कंपनियों को अपने प्रोडक्ट्स की कीमतों में 8 से 12 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा होने पर सेक्टर में शॉर्ट-टर्म वॉल्यूम पर दबाव बनेगा, जिससे 'पिछली 1-2 तिमाहियों की वॉल्यूम रिकवरी का ट्रेंड पलट सकता है।'
ब्यूटी कंपनियों के उलट, खाने-पीने का सामान बनाने वाली फूड एफएमसीजी कंपनियों पर इस संकट का ज्यादा असर नहीं होगा। इनके कच्चे माल की लागत में क्रूड डेरिवेटिव्स का हिस्सा सिर्फ 10 से 15% होता है। इन कंपनियों का मुख्य कच्चा माल पाम ऑयल है, जिसकी कीमतें बाजार में फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं।
दूसरी तरफ, ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए यह तनाव मुश्किलें बढ़ा सकता है। एनालिस्ट्स सुभाष गेट और हेत छेदा की रिपोर्ट बताती है कि 2025 में भारत ने 8.8 अरब डॉलर की कारें एक्सपोर्ट कीं, जिनमें से 20-25% मिडिल ईस्ट जाती हैं। शिपिंग में 10-14 दिन की देरी और युद्ध-जोखिम बीमा के 100-250% तक महंगे होने से कंपनियों का मार्जिन घट सकता है। अगर तनाव लंबा चला, तो ऑटो कंपनियों (OEMs) की वॉल्यूम 1-3% तक गिर सकती है और मार्जिन में 150-200 बेसिस पॉइंट्स की कमी आ सकती है।
कच्चे तेल के दाम बढ़ने से प्लास्टिक, रबर और पेंट जैसे कच्चे माल की लागत बढ़ेगी। इसके अलावा, भारत को खाड़ी देशों से भारी रेमिटेंस मिलता है। वित्त वर्ष 2025 में कुल 135 अरब डॉलर के रेमिटेंस में से 35-40% यहीं से आया। इस क्षेत्र में आर्थिक सुस्ती से रेमिटेंस में कमी आ सकती है, जिससे भारत के ग्रामीण इलाकों में टू-व्हीलर और एंट्री-लेवल कारों की डिमांड घट सकती है। इस मार्केट में मारुति सुजुकी, बजाज ऑटो, टीवीएस मोटर और अशोक लेलैंड जैसी कंपनियों का 2 से 3.2% तक एक्सपोजर है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर सीमेंट सेक्टर पर भी पड़ेगा। सीमेंट एनालिस्ट आशुतोष मुरारका के मुताबिक, सीमेंट उत्पादन में पावर और फ्यूल की लागत 25-30% होती है। इसमें अमेरिकी पेटकोक (US petcoke) की हिस्सेदारी 50-60% है। बेस केस (कच्चा तेल $90 प्रति बैरल) में डिमांड 7-8% की दर से बढ़ेगी। लेकिन अगर यह शॉक केस ($130 प्रति बैरल) तक पहुंचता है, तो निर्माण कार्यों में सुस्ती आ सकती है।
इससे सीमेंट डिमांड ग्रोथ घटकर 5.5-6% रह सकती है और कंपनियों के मुनाफे (EBITDA) में 80-120 रुपये प्रति टन की गिरावट आ सकती है। इस स्थिति में बिड़ला कॉरपोरेशन, नुवोको विस्टास और रामको सीमेंट्स जैसी छोटी कंपनियों पर अल्ट्राटेक (UltraTech), एसीसी (ACC) और श्री सीमेंट जैसी बड़ी कंपनियों के मुकाबले ज्यादा दबाव रहेगा।
| पैरामीटर (Parameter) | बेस केस (Base Case) | स्ट्रेस सिनेरियो (Stress Scenario) | सीवियर शॉक (Severe Shock) |
|---|---|---|---|
| कच्चे तेल की कीमत | ~$90/bbl | ~$110/bbl | ~$130/bbl |
| सीमेंट डिमांड ग्रोथ | 7% से 8% (मजबूत) | 6.5% से 7% (मामूली गिरावट) | 5.5% से 6% (सुस्ती) |
| इन्क्रीमेंटल वॉल्यूम | 32–35 MnT | बेस केस से 3–4 MT कम | बेस केस से 6–8 MT कम |
| EBITDA पर असर | कोई खास असर नहीं (स्थिर) | ₹50–60 प्रति टन की कमी | ₹80–120 प्रति टन की कमी |
| ऑपरेटिंग कॉस्ट (लागत) | मैनेज करने योग्य | ₹50–60 प्रति टन की बढ़ोतरी | ₹70–100 प्रति टन की बढ़ोतरी |
| रियलाइजेशन (कमाई) | स्थिर रहेगी | ₹40–60 प्रति टन का दबाव | ₹80–100 प्रति टन का दबाव |
बड़ी कंपनियों को कम रिस्क: अल्ट्राटेक, एसीसी, अंबुजा और श्री सीमेंट जैसे बड़े प्लेयर्स अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी के कारण इस दबाव को झेलने में बेहतर स्थिति में हैं।
छोटी कंपनियों पर ज्यादा मार: बिड़ला कॉरपोरेशन, नुवोको विस्टास और रामको सीमेंट्स जैसी क्षेत्रीय कंपनियों के मार्जिन पर कच्चा तेल महंगा होने का ज्यादा बुरा असर पड़ सकता है।
लागत का कारण: सीमेंट बनाने में लगने वाली कुल लागत का 25-30% हिस्सा पावर और फ्यूल (पेटकोक) का होता है, जो सीधे तौर पर ग्लोबल एनर्जी कीमतों से जुड़ा है।
Disclaimer: यह लेख सिर्फ जानकारी के लिए है। इसमें दिए गए विचार और सुझाव एक्सपर्ट के हैं, मिंट हिंदी के नहीं। हम निवेशकों को सलाह देते हैं कि निवेश संबंधी कोई फैसला लेने से पहले प्रमाणित विशेषज्ञ से सलाह लें, क्योंकि बाजार की स्थितियां तेजी से बदल सकती हैं और हालात अलग-अलग हो सकते हैं।
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