
रूस भारत को कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर रहा है। विदेशों से भारत आने वाले कुल तेल का लगभग 35% हिस्सा रूस से मिलता है। अब अमेरिका ने रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट पीजेएससी और ल्यूकऑयल पीजेएससी पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। इसका सीधा असर भारतीय तेल रिफाइनरियों की खरीद पर पड़ने की आशंका है। जानकारों का कहना है कि इसके चलते भारत को अब दूसरे देशों से ज्यादा कीमत पर तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे देश का इंपोर्ट बिल बढ़ जाएगा।
आईसीएआरए लिमिटेड (ICRA Ltd) में कॉर्पोरेट रेटिंग्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंधों का भारत की खरीद पर असर होना तय है। प्रतिबंधों से प्रभावित ये सप्लायर भारत की कुल रूसी खरीद का लगभग 60% हिस्सा देते थे। उन्होंने बताया, 'हालांकि, भारत रूस से होने वाली खरीद को मध्य-पूर्व और अन्य जगहों के सप्लायरों से बदल सकता है, लेकिन कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ जाएगा।'
वशिष्ठ के अनुसार, रूस के डिस्काउंटेड ऑयल की जगह बाजार भाव पर तेल खरीदने से भारत के तेल आयात बिल में 2% की बढ़ोतरी हो सकती है। वित्त वर्ष 2025 में भारत का कच्चा तेल आयात 137 अरब डॉलर का रहने का अनुमान है, जिसके हिसाब से यह बढ़ोतरी लगभग 2.7 अरब डॉलर की होगी।
अमेरिका के ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने रोसनेफ्ट और ल्यूकऑयल पर प्रतिबंध लगाते हुए कंपनियों को इन रूसी तेल उत्पादकों के साथ 21 नवंबर तक लेनदेन बंद करने की समय सीमा दी है। भारत के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि रूस से आने वाले कुल 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) तेल में इन दो कंपनियों का योगदान लगभग 10 लाख बैरल प्रति दिन है।
खबरों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल का प्रवाह अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद लगभग शून्य हो सकता है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में रिफाइनिंग कंपनियों के सीनियर एग्जीक्यूटिव्स ने बताया कि रूस के सबसे बड़े उत्पादकों पर प्रतिबंध के बाद तेल की सप्लाई जारी रखना लगभग नामुमकिन होगा। इस बीच, पीटीआई (PTI) ने सूत्रों के हवाले से बताया कि मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) भी रूसी कच्चे तेल का आयात कम करने की योजना बना रही है। रिलायंस भारत में डिस्काउंटेड रूसी तेल की सबसे बड़ी खरीदार है।
यस सिक्योरिटीज (Yes Securities) में इंस्टीट्यूशनल इक्विटी रिसर्च के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट हर्षराज अग्रवाल ने कहा कि भारतीय रिफाइनरियां रूस से कम सप्लाई की भरपाई स्पॉट मार्केट से ज्यादा खरीद करके करेंगी। उन्होंने कहा, 'अगर रूस से आने वाले 30% कच्चे तेल पर औसतन 2 डॉलर प्रति बैरल का डिस्काउंट मिलता था, तो अब वह डिस्काउंट नहीं मिल पाएगा, जो 0.6 डॉलर प्रति बैरल के बराबर होगा।' फिलहाल, रूसी तेल पर डिस्काउंट 2 से 4 डॉलर प्रति बैरल के बीच है।
पीडब्ल्यूसी इंडिया (PwC India) में पार्टनर (ऑयल एंड गैस) दीपक माहुरकर ने बताया, 'समस्या सप्लाई की नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार में तेल की लागत की है। मध्य-पूर्व, भूमध्य सागर और अमेरिका जैसे जगहों से तेल आ सकता है, लेकिन ये सप्लायर रूस की तरह भारत को डिस्काउंट नहीं देंगे।' उन्होंने माना कि इससे आयात बिल बढ़ सकता है, पर रूसी तेल की जगह लेने के लिए तेल की उपलब्धता कोई बड़ी समस्या नहीं होगी।
जब से डोनाल्ड ट्रम्प ने दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला है, उनका प्रशासन भारत पर रूसी तेल आयात रोकने का दबाव डाल रहा है। उनका तर्क है कि इन एनर्जी खरीद से रूस को यूक्रेन युद्ध के लिए फंडिंग मिलती है। हालांकि, भारत ने अपनी नीति स्पष्ट रखी है कि उसकी ऊर्जा खरीद उसके उपभोक्ताओं के हित पर आधारित है और वह तेल वहीं से खरीदेगा जहां से सस्ती दर पर मिलेगा।
ट्रम्प ने रूसी एनर्जी खरीदने पर भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ भी लगाया था, जिससे भारतीय वस्तुओं पर कुल टैक्स बढ़कर 50% हो गया, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ट्रम्प ने कहा कि भारत साल के अंत तक रूसी तेल आयात में लगभग 40% की कमी करेगा। उन्होंने कहा, 'जैसा कि आप जानते हैं, भारत ने मुझसे कहा था कि वे इसे रोक देंगे... यह एक प्रक्रिया है। आप तुरंत नहीं रोक सकते।'
पिछले महीने रूस से आयात कम हुआ था। वर्ल्ड रियल-टाइम डेटा और एनालिटिक्स प्रोवाइडर केपलर (Kpler) के डेटा के अनुसार, सितंबर में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 16 लाख बैरल प्रति दिन रहा, जो अगस्त के 16.9 लाख बैरल प्रति दिन से लगभग 5% कम था। हालांकि, इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि यह कमी व्यावसायिक कारणों से हुई, क्योंकि अगस्त के 3 डॉलर प्रति बैरल की तुलना में डिस्काउंट गिरकर करीब 2 डॉलर हो गया था।
भारत ने पिछले तीन सालों में अपनी खरीद को लगभग 40 देशों तक फैलाकर पहले ही स्रोतों बढ़ा लिया है। ईवाई-पार्थेनन इंडिया (EY-Parthenon India) में पार्टनर और एनर्जी सेक्टर लीडर गौरव मोडा ने कहा, 'पारंपरिक सप्लायर अपनी बड़ी हिस्सेदारी वापस पाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं और हाल के स्रोतों की जगह ले सकते हैं। मध्यम अवधि में यह भारत के फायदे के लिए मौजूदा और पिछले निर्यातकों के साथ नए अवसर और समीकरण खोल सकता है।'
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