
रुपया 90 के स्तर को पार कर गया। यह केवल एक संख्यात्मक गिरावट नहीं है। पिछले 15 साल में, रुपये का मूल्य 100 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है। सरकार को अपनी सुस्ती छोड़कर अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह के उपाय करने की आवश्यकता है ताकि रुपया न केवल इस स्तर के आसपास स्थिर हो बल्कि तेजी से कुछ मजबूती भी हासिल कर सके। शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 92 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया।
इसके साथ ही कच्चे तेल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तक देश का आयात, विदेशी शिक्षा और विदेश यात्रा महंगी होने की आशंका है। इस वजह से महंगाई भी बढ़ सकती है, हालांकि इससे निर्यातकों को कुछ राहत मिलने का अनुमान है। रुपये में इस महीने अब तक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 202 पैसे या दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। साल 2025 में विदेशी कोषों की लगातार निकासी और डॉलर की मजबूती के कारण इसमें 5 प्रतिशत की गिरावट आई थी।
रुपये में आई कमजोरी से आयतकों को नुकसान झेलना पड़ता है। उन्हें सामान के लिए ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। भारतीय आयात में कच्चा तेल, कोयला, प्लास्टिक सामग्री, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, वनस्पति तेल, उर्वरक, मशीनरी, सोना, मोती, कीमती और अर्ध-कीमती पत्थर तथा लोहा और इस्पात शामिल हैं। आयातित वस्तुओं के भुगतान के लिए आयातकों को अमेरिकी डॉलर खरीदने पड़ते हैं। रुपये में गिरावट के साथ, वस्तुओं का आयात महंगा हो जाता है।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपये का मतलब है कि विदेशी शिक्षा अधिक महंगी हो जाएगी, क्योंकि छात्रों को विदेशी संस्थानों द्वारा लिए जाने वाले प्रत्येक डॉलर के लिए अधिक रुपये देने होंगे। वहीं कमजोर स्थानीय मुद्रा का मतलब है कि यात्रा खर्च के लिए एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये देने होंगे। इससे विदेश यात्रा करना भी महंगा हो जाता है। अनिवासी भारतीय (एनआरआई) जो पैसा घर भेजते हैं, वे रुपये के मूल्य में अधिक पैसा भेजना होता है।
निर्यातकों को रुपये के अवमूल्यन से लाभ होने की संभावना रहकी है। इसकी वजह ये है कि उन्हें एक डॉलर से अधिक रुपये मिलेंगे। हालांकि, आयात पर निर्भर निर्यातकों को भारतीय मुद्रा के कमजोर होने से लाभ नहीं होगा। इस तरह देखा जाए तो कपड़ा जैसे कम आयात निर्भरता वाले क्षेत्रों को कमजोर रुपये से सबसे अधिक लाभ होना चाहिए, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उच्च-आयात वाले क्षेत्रों को सबसे कम लाभ होगा।
रुपये में गिरावट को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक लगातार विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता रहा है। वित्त वर्ष 2023-24 में आरबीआई ने 41.27 अरब डॉलर की शुद्ध खरीद की थी, लेकिन 2024-25 में रुख बदलते हुए 34.51 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री करनी पड़ी। मौजूदा वित्त वर्ष 2025-26 में भी मई को छोड़कर लगभग हर महीने डॉलर की शुद्ध बिक्री की गई है।
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