
नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 7.8% की वृद्धि दर्ज की है। 31 अगस्त को जारी नए जीडीपी आंकड़ों के मुताबिक, वास्तविक जीडीपी 2025-26 की पहली तिमाही के 75.46 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 की पहली तिमाही में 81.36 लाख करोड़ रुपये हो गई। इसी अवधि में मौजूदा कीमतों यानी करेंट प्राइस पर जीडीपी 10.3% बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपये रही। वास्तविक जीवीए की वृद्धि 8.2%, निजी खपत 7.1%, स्थिर निवेश 11.9% और वास्तविक निर्यात 12% बढ़े। ये आंकड़े बाजार के अनुमान से भी बेहतर हैं।
लेकिन 7.8% की इस तेज वृद्धि ने एक दूसरी बहस को जन्म दे दिया है कि क्या यह आंकड़ा भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक रफ्तार को सही तरीके से दिखाता है? पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने पिछले साल की मौजूदा कीमतों पर जीडीपी को नई श्रृंखला में करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर करीब 80 लाख करोड़ रुपये किए जाने पर सवाल उठाए हैं। पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने पूछा है कि अगर वृद्धि इतनी तेज है तो इसका असर रोजगार, निजी निवेश और विदेशी पूंजी प्रवाह में उतना स्पष्ट क्यों नहीं दिख रहा।
कांग्रेस ने जीडीपी के आकलन की नई पद्धति बनाने की पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करने की मांग की है। दूसरी ओर, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने कहा है कि 7.8% की गणना नई और अधिक व्यापक सांख्यिकीय कार्यप्रणाली पर आधारित है और पुरानी तथा नई जीडीपी श्रृंखला के आंकड़ों को आपस में मिलाकर तुलना करना गलत है। इस विवाद को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि जीडीपी में मौजूदा कीमत, स्थिर कीमत, आधार वर्ष और डिफ्लेटर आखिर होते क्या हैं।
जीडीपी किसी अर्थव्यवस्था में एक निश्चित अवधि के दौरान उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को मापता है। लेकिन किसी वस्तु की कीमत और उसकी मात्रा दोनों बदल सकती हैं। इसलिए केवल रुपये में जीडीपी बढ़ने से यह पता नहीं चलता कि अर्थव्यवस्था ने वास्तव में कितना अधिक उत्पादन किया।
मान लीजिए किसी देश ने एक साल में 100 कारें बनाईं और प्रत्येक कार की कीमत 10 लाख रुपये थी। जीडीपी में इन कारों का योगदान 10 करोड़ रुपये हुआ। अगले साल कारों का उत्पादन 110 हो गया, लेकिन कीमत 12 लाख रुपये हो गई। अब जीडीपी 13.2 करोड़ रुपये हो जाएगी। यहां जीडीपी 32% बढ़ी, लेकिन उत्पादन केवल 10% बढ़ा। बाकी वृद्धि कीमत बढ़ने से आई।
इसीलिए जीडीपी को दो तरह से देखा जाता है। मौजूदा कीमतों पर जीडीपी या नॉमिनल जीडीपी में उस साल के वास्तविक बाजार भाव पर उत्पादन का मूल्य लगाया जाता है। स्थिर कीमतों पर जीडीपी या वास्तविक जीडीपी में कीमतों के बदलाव का असर हटाने की कोशिश की जाती है, ताकि मुख्य रूप से उत्पादन की मात्रा यानी मात्रा आधारित वृद्धि दिखाई दे। इसलिए चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली अप्रैल-जून तिमाही (Q1 FY27) में सरकार की बताई 7.8% जीडीपी ग्रोथ रीयल जीडीपी ग्रोथ है, जबकि मौजूदा कीमतों पर जीडीपी ग्रोथ 10.3% है जिसे नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ कहते हैं।
वास्तविक जीडीपी निकालने के लिए एक संदर्भ वर्ष चुना जाता है, जिसे आधार वर्ष कहा जाता है। भारत की पुरानी जीडीपी सीरीज में आधार वर्ष 2011-12 था। नई श्रृंखला में इसे बदलकर 2022-23 कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि आधार वर्ष समय-समय पर इसलिए बदला जाता है ताकि अर्थव्यवस्था की बदलती संरचना और बदलती कीमतों को ज्यादा बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित किया जा सके।
इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। मान लीजिए 2011 में किसी देश की अर्थव्यवस्था में टाइपराइटर का महत्व बहुत ज्यादा था और स्मार्टफोन का बहुत कम। 2023 तक स्थिति उलट गई। अगर वास्तविक जीडीपी की गणना के लिए बहुत पुराने कीमत ढांचे और आर्थिक भार का इस्तेमाल होता रहे, तो अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना को मापने में समस्या हो सकती है। इसलिए सांख्यिकीय एजेंसियां समय-समय पर आधार वर्ष बदलती रहती हैं।
लेकिन यहां महत्वपूर्ण अंतर है कि आधार वर्ष मुख्य रूप से वास्तविक जीडीपी की गणना से जुड़ा है। नॉमिनल जीडीपी में उस साल की मौजूदा कीमतें इस्तेमाल होती हैं। इसलिए सुभाष चंद्र गर्ग का सवाल है कि यदि आधार वर्ष बदलने से नॉमिनल जीडीपी का कोई सीधा संबंध नहीं है, तो अप्रैल-जून 2025 की मौजूदा कीमतों पर जीडीपी पुरानी श्रृंखला के 86.05 लाख करोड़ रुपये से नई सीरीज में लगभग 80 लाख करोड़ रुपये क्यों हो गई?
सरकार का कहना है कि फरवरी 2026 में केवल '2011-12 को 2022-23' से बदलने का ऊपरी काम नहीं हुआ था। नई जीडीपी श्रृंखला में आंकड़ों के नए स्रोत, नए वर्गीकरण, बेहतर कार्यप्रणाली, संशोधित कवरेज और बाद में उपलब्ध हुए नए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) जैसे सूचकांकों को भी शामिल किया गया। इसलिए ऐतिहासिक आकलनों का नई सांख्यिकीय ढांचे के तहत दोबारा आकलन किया गया।
29 अगस्त, 2025 को वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही की नॉमिनल जीडीपी का अनुमानित आंकड़ा 86.05 लाख करोड़ रुपये आया। यह अनुमान 2011-12 बेस सीरीज पर आधारित था। फरवरी 2026 में नई 2022-23 बेस सीरीज लागू हुई और इस आधार पर इस अनुमानित आंकड़े को 80.32 लाख करोड़ रुपये किया गया। आगे चलकर, जून 2026 में यह 80.44 लाख करोड़ रुपये हो गया और बाद में नए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) और उत्पादक मूल्य सूचाकांक (PPI) को शामिल करने के बाद घटकर लगभग 80 लाख करोड़ रुपये रह गया। इस तरह, Q1 FY2025-26 के नॉमिनल जीडीपी आंकड़े में चार चरणों में संशोधन किया गया।
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग को यही करीब 6 लाख करोड़ रुपये का अंतर खटक रहा है। उनका कहना है कि यदि पिछले साल की नॉमिनल जीडीपी 86 लाख करोड़ रुपये ही रखी जाती और इस साल की 88.27 लाख करोड़ रुपये से तुलना करने पर नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ करीब 2.6% है ना कि 7.8 प्रतिशत।
इस पर सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा कि 86.05 लाख करोड़ रुपये और 88.27 लाख करोड़ रुपये को एक साथ रखकर वृद्धि निकालना सही नहीं है, क्योंकि पहला आंकड़ा 2011-12 बेस सीरीज से आया है जबकि दूसरा नई 2022-23 बेस सीरीज से। नई श्रृंखला में वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही का तुलना करने योग्य आंकड़ा 80.32 लाख करोड़ रुपये था, जिसे बाद में 80 लाख करोड़ रुपये किया गया। इसलिए नई श्रृंखला में 88.27 लाख करोड़ रुपये की तुलना करीब 80 लाख करोड़ रुपये से की जानी चाहिए।
यहां दोनों पक्षों की बात के अलग-अलग हिस्से हैं। गर्ग का यह सवाल जायज है कि मौजूदा कीमतों पर जीडीपी के पुराने आकलन में इतना बड़ा बदलाव क्यों हुआ। लेकिन 86.05 लाख करोड़ रुपये को नई श्रृंखला के 88.27 लाख करोड़ रुपये के साथ रखकर 2.6% को 'वास्तविक जीडीपी ग्रोथ' कहना सही नहीं है, क्योंकि इसमें दो अलग सांख्यिकीय ढांचों के आंकड़ों को गड्डमड्ड किया जा रहा है। गर्ग को यह बताना चाहिए था कि अगर 2011-12 बेस सीरीज और पुरानी पद्धति से ही अप्रैल-जून तिमाही की जीडीपी का आकलन होता तो भी क्या यही आंकड़े आते। अगर नहीं तो उनका दावा भ्रामक और नितांत अतार्तिक है।
जहां तक बात सरकार की है तो उसका जवाब तकनीकी रूप से बिल्कुल सही है, लेकिन इससे बड़ा सवाल पूरी तरह खत्म नहीं होता। यदि नई पद्धति ने वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही की नॉमिनल जीडीपी को करीब 6 लाख करोड़ रुपये नीचे संशोधित किया है, तो सांख्यिकी मंत्रालय को संशोधन का क्षेत्र-दर-क्षेत्र मिलान देना चाहिए। इससे स्पष्ट होगा कि कितना बदलाव आंकड़े लेने के नए स्रोतों, आंकड़ों के विश्लेषण के तरीके, कवरेज, वर्गीकरण और नए कीमत सूचकांकों की वजह से आया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी सरकार से जीडीपी आकलन की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग की है।
पूर्व वित्त सचिव गर्ग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य गौरव बल्लभ के बीच हुई टीवी डिबेट में बल्लभ ने कहा कि अर्थव्यवस्था की कवरेज समय के साथ बदलती है। आज कृत्रिम मेधा (AI), इंटरनेट आंकड़ों की खपत, डिजिटल सेवाएं और दूसरी नई आर्थिक गतिविधियां 2011 की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। नई जीडीपी पद्धति इन बदली हुई गतिविधियों और आंकड़ों के नए स्रोतों को बेहतर ढंग से शामिल करने की कोशिश करती है।
यह तर्क एक स्तर पर सही है। जीडीपी कोई प्राकृतिक रूप से दिखाई देने वाली संख्या नहीं, बल्कि एक सांख्यिकीय अनुमान है। अर्थव्यवस्था में नई गतिविधियां आती हैं, पुराने उद्योगों का महत्व बदलता है और कंपनियों तथा सरकार के पास नए प्रशासनिक आंकड़े उपलब्ध होते हैं। नए जीएसटी रिकॉर्ड्स, कंपनी डेटाबेस, सर्वेक्षणों और दूसरे स्रोतों के इस्तेमाल से कवरेज और अनुमान बेहतर हो सकते हैं। सरकार ने नई श्रृंखला में ASUSE, PLFS, GST, PFMS आदि जैसे नए या आंकड़ों के बेहतर स्रोतों के इस्तेमाल को प्रमुख सुधार बताया है।
लेकिन अकेले एआई का उदाहरण गर्ग की आपत्ति का जवाब नहीं हो सकता। अगर नई पद्धति में एआई और डिजिटल गतिविधियों को बेहतर तरीके से शामिल किया गया, तो इससे जीडीपी का अनुमान ऊपर भी संशोधित हो सकता था। यह अपने आप नहीं बताता कि वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही की नॉमिनल जीडीपी 86.05 लाख करोड़ रुपये से घटकर 80 लाख करोड़ रुपये क्यों हुई। इसके लिए पूरे संशोधन का मात्रात्मक विवरण चाहिए।
नॉमिनल जीडीपी में कीमत और मात्रा दोनों का असर होता है। वास्तविक जीडीपी में कीमतों में बदलाव के असर को हटाने की कोशिश की जाती है। इन दोनों के बीच के कीमत प्रभाव को समझने के लिए जीडीपी डिफ्लेटर का इस्तेमाल होता है जिसे जीडीपी डिफ्लेटर = (नॉमिनल जीडीपी ÷ रीयल जीडीपी) × 100 के फॉर्म्युले से हासिल किया जाता है।
उदाहरण के लिए किसी अर्थव्यवस्था की नॉमिनल जीडीपी 110 रुपये है और वास्तविक जीडीपी 100 रुपये है, तो जीडीपी डिफ्लेटर 110 होगा। इसका अर्थ है कि आधार अवधि की तुलना में जीडीपी में शामिल वस्तुओं और सेवाओं के प्राइस लेवल में लगभग 10% का अंतर आया।
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 10.3% और वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8% है। इन दोनों के बीच निहित कीमत वृद्धि करीब 2.3% से 2.5% के आसपास बैठती है। यहीं से सवाल उठता है कि जब खुदरा महंगाई (CPI) करीब 3.9% और थोक महंगाई (WPI) 9% से ज्यादा थी, तो जीडीपी का कीमत प्रभाव इतना कम कैसे हो सकता है?
यही इस बहस में सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करने वाला हिस्सा है। खुदरा महंगाई उस टोकरी की कीमतों को मापती है जिसकी खपत परिवार करते हैं। वहीं, थोक महंगाई वस्तुओं और उत्पादों की थोक कीमतों को देखती है और इसमें सेवाओं को नहीं जोड़ा जाता। इसके विपरीत जीडीपी डिफ्लेटर पूरी अर्थव्यवस्था की जीडीपी को कवर करता है और इसका निहित मूल्य प्रभाव नॉमिनल जीडीपी और वास्तविक जीडीपी के अनुपात से निकलता है। इसमें खपत के साथ निवेश, सरकारी खर्च, निर्यात के साथ-साथ बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और रीयल एस्टेट जैसी सेवाएं भी शामिल हैं।
इसलिए यदि थोक महंगाई 9% है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि जीडीपी डिफ्लेटर भी 9% होना चाहिए। किसी अर्थव्यवस्था में स्टील, कच्चे तेल और उद्योगों के लिए जरूरी कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हों, लेकिन आईटी सर्विसेज, बैंकिंग, टेलिकॉम या कुछ अन्य सेवाओं की कीमतें कम बढ़ रही हों, तो थोक महंगाई और जीडीपी डिफ्लेटर में बड़ा अंतर संभव है।
इस बिंदु पर सरकार का तर्क मजबूत है कि जीडीपी डिफ्लेटर को थोक या खुदरा महंगाई के बराबर मानना गलत है। लेकिन असली सवाल यह है कि जीडीपी डिफ्लेटर के पीछे इस्तेमाल किए गए क्षेत्रवार कीमत सूचकांक और उनके भार कितने पारदर्शी हैं और वे वास्तविक कीमत बदलाव को कितना सही शामिल करते हैं।
जीडीपी के ताजा आंकड़े में मैन्युफैक्चरिंग की नॉमिनल जीवीए वृद्धि 7.7% रही, जबकि वास्तविक जीवीए वृद्धि 9.2% रही। इससे मैन्युफैक्चरिंग का निहित जीवीए डिफ्लेटर करीब -1.5% निकलता है। आलोचकों का सवाल है कि जब मैन्युफैक्चरिंग उत्पादन और इनपुट, दोनों की कीमतें बढ़ रही थीं तो मैन्युफैक्चरिंग का कीमत डिफ्लेटर नकारात्मक कैसे हो सकता है।
सरकार कहती है कि ऐसा डबल डिफ्लेशन के कारण हुआ है। इसमें पहले उत्पादन को उसकी कीमत में बदलाव से समायोजित किया जाता है और फिर बीच में इस्तेमाल होने वाले इनपुट को उनके अलग कीमत बदलाव से समायोजित किया जाता है। इसका फॉर्म्युला है- वास्तविक जीवीए = वास्तविक उत्पादन − वास्तविक मध्यवर्ती खपत।
मान लीजिए किसी कारखाने का उत्पादन 100 रुपये से बढ़कर 110 रुपये हो गया। यानी नॉमिनल उत्पादन 10% बढ़ा। लेकिन उसकी लागत 60 रुपये से बढ़कर 75 रुपये हो गई। यानी इनपुट की कीमत ज्यादा तेजी से बढ़ी। नॉमिनल वेल्यु एडेड 40 रुपये से घटकर 35 रुपये रह गया। लेकिन डबल डिफ्लेशन में उत्पादन और लागत की कीमतों को अलग-अलग समायोजित किया जाता है। इसलिए रीयल वेल्यु एडेड की वृद्धि नॉमिनल वेल्यु एडेड वृद्धि से अलग होना पूरी तरह संभव और जायज है।
यानी, नकारात्मक निहित डिफ्लेटर का अर्थ यह नहीं है कि फैक्ट्री में बने सामान का बिक्री मूल्य अनिवार्य रूप से कम हो गया है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि कच्चे माल की कीमतें उत्पाद की कीमत की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ीं। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में वस्त्र, कपास ओटाई, बुनियादी धातु और रबर तथा प्लास्टिक उत्पादों जैसे क्षेत्रों में इनपुट कीमत वृद्धि ने इस घटना में भूमिका निभाई।
यहां सरकार का तर्क आर्थिक रूप से संभव है। लेकिन डबल डिफ्लेशन के पीछे इस्तेमाल किए गए उत्पादन और इनपुट कीमत सूचकांक, भार और क्षेत्रवार आंकड़े जितने साफ-सुथरे और पारदर्शी होंगे, उतना ही निष्पक्ष रूप से यह जांचा जा सकेगा कि -1.5% डिफ्लेटर वास्तव में आंकड़ों से निकलता है या किसी अनुमान से।
कृषि क्षेत्र के आकलन का तरीका मैन्युफैक्चरिंग से अलग है। कृषि में तिमाही वास्तविक जीवीए को पहले उत्पादन आंकड़ों के आधार पर स्थिर कीमतों पर आंका जाता है और फिर उत्पादक कीमत से जुड़ी जानकारी से मौजूदा कीमतों पर अनुमान निकाले जाते हैं। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार पहली तिमाही में कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन से संबंधित उत्पादन PPI में करीब 5% की वृद्धि रही और इससे कृषि क्षेत्र की निहित महंगाई करीब 3.9% रही। इसलिए मैन्युफैक्चरिंग और कृषि के डिफ्लेटर को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता। दोनों क्षेत्रों का उत्पादन ढांचा और सांख्यिकीय अनुमान पद्धति अलग है।
गणित के स्तर पर यदि पिछले साल की जीडीपी यानी हर के रूप में इस्तेमाल होने वाली संख्या कम हो और इस साल की जीडीपी अपेक्षाकृत ऊंची रहे, तो वृद्धि दर ज्यादा दिखाई दे सकती है। लेकिन जीडीपी के आकलन में सवाल यह है कि क्या पिछले साल की संख्या को जानबूझकर कम किया गया या नई पद्धति के तहत उसका बेहतर अनुमान निकाला गया। सरकार का कहना है कि वित्त वर्ष 2025-26 की अप्रैल-जून तिमाही का जीडीपी आंकड़ा एक बार नहीं, बल्कि संशोधन चक्र से गुजरते हुए चार बार बदले हैं। ये बदलाव आंकड़ों के नए स्रोतों, आकलन की नई पद्धति, नए कवरेज और नए सूचकांकों को शामिल करने से हुए।
सांख्यिकी मंत्रालय का यह भी तर्क है कि तिमाही जीडीपी मानक-संकेतक पद्धति पर आधारित है और फसल उत्पादन, सीमेंट उत्पादन, तैयार स्टील की खपत, वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री जैसे सैकड़ों मात्रा और मूल्य संकेतकों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए केवल पिछले साल के मानक को संशोधित करने से वर्तमान तिमाही की मूल आर्थिक गतिविधि अपने आप नहीं बढ़ जाती। सरकार का यह तर्क दमदार है, लेकिन आंकड़ों पर भरोसा पैदा करने के लिहाज से सबसे अच्छा जवाब यह होगा कि इन बदलावों को इस तरह सार्वजनिक किया जाए कि कोई स्वतंत्र विश्लेषक उन्हें सीधे-सीधे जांच सके।
16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया भी कहते हैं कि लंबे समय तक जीडीपी ग्रोथ को कृत्रिम रूप से बहुत ऊंचा रखना आसान नहीं होगा, क्योंकि आज बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े पेश किए गए तो आगे उसी ऊंचे आधार पर ग्रोथ दिखानी होगी। पनगढ़िया ने लगातार गलत तरीके से जीडीपी ग्रोथ बताने की आशंका पर सवाल उठाया है।
पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने जीडीपी की गणना के बजाय उसके व्यापक आर्थिक संकेतों पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि 7% से ज्यादा की शीर्षक वृद्धि के साथ कमजोर कॉरपोरेट निवेश, धीमा विदेशी निवेश और रोजगार के अभाव जैसी समस्याओं को मिलाना कठिन है। इसके जवाब में सरकार ने कहा कि अप्रैल-जून तिमाही में स्थिर निवेश (GFCF) 11.9% बढ़ा, निजी खपत 7.1% और निर्यात 12% बढ़े। सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं को भी वृद्धि के प्रमुख आधार के रूप में सामने रखा है।
यहां दोनों पक्षों को अलग-अलग सवाल पूछते हुए समझना चाहिए। जीडीपी ग्रोथ और रोजगार के अवसरों में वृद्धि एक ही चीज नहीं हैं। अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ सकती है, लेकिन उस वृद्धि में उन क्षेत्रों का योगदान कम हो सकता है जहां भारी संख्या में रोजगार पैदा होते हैं। इसी तरह जीडीपी ग्रोथ के साथ व्यापक आबादी का जीवन स्तर भी सुधरे, यह जरूरी नहीं है। इसलिए राजन का सवाल 7.8% को गलत साबित नहीं करता। ये बिल्कुल उचित सवाल हैं कि आने वाली तिमाहियों में भी जीडीपी ग्रोथ शानदार रही तो क्या कामगारों के वेतन बढ़ेंगे, रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा होंगे और क्या निजी निवेश में भी टिकाऊ तेजी देखने को मिलेगी?
नई 2022-23 बेस सीरीज में सरकार ने केवल आधार वर्ष नहीं बदला है, बल्कि आंकड़ों के नए स्रोत, वर्गीकरण और आकलन के नए तरीके भी शामिल किए हैं। इसमें नई पीपीआई सीरीज और बैंकिंग सेवाओं का मूल्य सूचकांक भी शामिल किया गया है। सरकार के अनुसार नई श्रृंखला में GST, PFMS, कंपनी संबंधी जानकारी, सर्वेक्षण और दूसरे प्रशासनिक आंकड़ों का इस्तेमाल बढ़ाया गया है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि संशोधित पीपीआई और आईआईपी उपलब्ध होने के बाद उन्हें जीडीपी के आकलन में शामिल किया गया, इसलिए मौजूदा कीमतों और स्थिर कीमतों पर आधारित दोनों अनुमान प्रभावित हो सकते हैं। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार, पीपीआई के इस्तेमाल से केवल वास्तविक अनुमान नहीं, कुछ मौजूदा कीमतों पर आधारित जीवीए अनुमान भी बदले हैं। ऐसा खासकर अद्यतन शुद्ध स्थिर पूंजी भंडार और स्थिर पूंजी की खपत जैसी गणनाओं के जरिए हुआ है।
यही बिंदु उस आम धारणा की सीमा सामने लाता है कि 'मौजूदा कीमतों पर जीडीपी पर आधार वर्ष का कोई असर नहीं हो सकता।' अधिक सटीक बात यह है कि सिर्फ आधार वर्ष का कीमत संदर्भ बदलने से नॉमिनल जीडीपी नहीं बदलती, लेकिन आधार वर्ष संशोधन के साथ यदि पूरा सांख्यिकीय ढांचा, आंकड़ों के स्रोत, वर्गीकरण, कवरेज और आकलन की कार्यप्रणाली संशोधित की जाए, तो ऐतिहासिक मौजूदा कीमतों पर आधारित अनुमान भी बदल सकते हैं।
| मुद्दा | विपक्ष/आलोचक का दावा | सरकार का उत्तर | मेरा निष्कर्ष |
|---|---|---|---|
| 7.8% की दरे बढ़ी जीडीपी | असली ग्रोथ इससे बहुत कम है | नई सीरीज में कैलकुलेशन सही है | अभी सरकार का पक्ष मजबूत |
| गर्ग का 2.6% | पुराने ₹86.05 लाख करोड़ से तुलना करने पर 2.6% | पुरानी और नई सीरीज को मिलाना गलत | गर्ग का 2.6% निष्कर्ष गलत/भ्रामक |
| ₹86 लाख करोड़ → ₹80 लाख करोड़ | सरकार ने बेस नीचे करके ग्रोथ बढ़ाई | आधार वर्ष/बदलावों/नए आंकड़ों के कारण बदलाव | सवाल वैध, लेकिन आंकड़ो से छेड़छाड़ का कोई प्रमाण अभी नहीं |
| जीडीपी डिफ्लेटर 2.3% | WPI >9%, इसलिए अंतर | जीडीपी डिफ्लेटर और महंगाई एक नहीं होते | सरकार का तकनीकी उत्तर बिल्कुल सही |
| मैन्युफैक्चरिंग डिफ्लेटर -1.5% | असंभव/संदिग्ध | डबल डिफ्लेशन पद्धति से संभव | सरकार का मेकनिजम विश्वसनीय; लेकिन पारदर्शिता जरूरी |
| निवेश | निवेश के आंकड़े कमजोर | GFCF +11.9%, प्राइवेट कैपेक्स भी बढ़ रहा | सरकार का Q1 डेटा मजबूत |
| रोजगार | 7.8% के बावजूद अच्छे रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं | रोजगार सूचकांक में सुधार है. दिशा सही है, लेकिन और सुधार की जरूरत | रघुराम राजन/विपक्ष का सवाल महत्वपूर्ण |
| महंगाई/क्रय शक्ति | GDP आम आदमी की स्थिति नहीं बताती | मांग मजबूत है | दोनों अलग बातें हैं, GDP बढ़े तो बड़ी आबादी की आर्थिक स्थिति भी सुधर जाए, ऐसा जरूरी नहीं |
| असमानता | आर्थिक विकास का लाभ असमान | जीडीपी की तेज वृद्धि | GDP समानता का पैमाना नहीं है, लेकिन आलोचना अपनी जगह सही है |
| सरकार ने फर्जीवाड़ा किया? | आकलन की पद्धति बदलकर जीडीपी वृद्धि दर बढ़ा दी | अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर खरा उतरने के लिए नई पद्धति लागू की गई है | आंकड़ों से छेड़छाड़ का कोई प्रमाण नहीं |
| अप्रैल-जून तिमाही का आंकड़ा टिकाऊ नहीं | 7.8% की वृद्धि दर टिकाऊ नहीं | मोमेंटम मजबूत है | दोनों में सावधानी; Q2-Q4 निर्णायक होंगे |
इस पूरे विवाद को तीन सवालों में समेटा जा सकता है। पहला, क्या सुभाष चंद्र गर्ग की ओर से पुरानी श्रृंखला के 86.05 लाख करोड़ रुपये और नई श्रृंखला के 88.27 लाख करोड़ रुपये को मिलाकर निकाला गया 2.6% ग्रोथ रेट उचित है? जवाब बिल्कुल सीधा और स्पष्ट है- नहीं। यह दो अलग सांख्यिकीय ढांचों के आंकड़ों की तुलना है।
दूसरा, क्या Q1 FY26 की नॉमिनल जीडीपी को 86.05 लाख करोड़ रुपये से करीब 80 लाख करोड़ रुपये संशोधित करने के कारण पर्याप्त रूप से स्पष्ट किए गए हैं? यह ज्यादा गंभीर और खुला सवाल है। सरकार ने व्यापक कारण बताए हैं, लेकिन क्षेत्र-दर-क्षेत्र संशोधन का मिलान इस विवाद को ज्यादा पारदर्शी तरीके से सुलझा सकता है।
तीसरा, क्या 7.8% वास्तविक वृद्धि में इस्तेमाल किया गया कीमत समायोजन विश्वसनीय है? यह परखने योग्य सवाल है। थोक महंगाई और जीडीपी डिफ्लेटर का अलग होना अपने आप में समस्या नहीं है और मैन्युफैक्चरिंग का निगेटिव डिफ्लेटर डबल डिफ्लेशन के कारण संभव है। लेकिन जीडीपी डिफ्लेटर के घटकों, भार और क्षेत्र स्तरीय कीमत आंकड़ों की स्वतंत्र जांच से ही तय किया जा सकेगा कि 7.8% में प्राइस मेजरमेंट का कितना प्रभाव है।
इसलिए फिलहाल उपलब्ध तर्कों के आधार पर 7.8% को खारिज करने के लिए निर्णायक सांख्यिकीय प्रमाण नहीं है, लेकिन नई श्रृंखला के बड़े ऐतिहासिक संशोधनों और डिफ्लेटर की कार्यप्रणाली पर अधिक विस्तृत पारदर्शिता की मांग का पर्याप्त आधार है। दूसरी ओर, 2.6% को 'वास्तविक जीडीपी ग्रोथ' बताना भी सही नहीं है, क्योंकि वह पुराने और नए सांख्यिकीय श्रृंखला को मिलाकर निकाला गया है। अगर आने वाली तिमाहियों में भी जीडीपी वृद्धि दर मजबूत रही तो ताजा जीडीपी डेटा पर उठे सवाल यूं ही काफूर हो जाएंगे। लेकिन, आगे मजबूत कारण के बिना जीडीपी ग्रोथ कमजोर पड़ी तो सवाल उठाने वाले सरकार पर और आक्रामक होंगे।
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