हर देश को आर्थिक विकास के लिए पूंजी की जरूरत होती है, और केवल घरेलू स्रोतों से यह धन पूरी तरह जुटाना संभव नहीं होता। इसलिए विदेशों से आने वाला निवेश बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। विदेशी निवेश के दो मुख्य प्रकार हैं, जिन्हें फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) कहा जाता है।
अक्सर आपने न्यूज में शेयर बाजार में गिरावट के समय एफपीआई का नाम सुना होगा। हालांकि लोग जानते हैं कि दोनों विदेशी निवेश से जुड़े हैं, पर बहुत कम लोग इन दोनों में अंतर को ठीक से समझते हैं। इस आर्टिकल का उद्देश्य इन्हीं दोनों शब्दों को सरल रूप में समझना है और यह जानना है कि इनमें कौन सी बातें इन्हें एक-दूसरे से अलग बनाती हैं।
क्या है फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट?
एफडीआई वह निवेश है जिसमें कोई विदेशी निवेशक किसी दूसरे देश की किसी कंपनी में लंबे समय के लिए हिस्सेदारी लेता है। यह केवल पैसे लगाने भर का निवेश नहीं होता, बल्कि इसमें निवेशक उस देश में प्रत्यक्ष तौर पर व्यापार स्थापित करता है। इसमें फैक्ट्री लगाना, गोदाम बनाना, इमारत खरीदना या नई कंपनी शुरू करना शामिल हो सकता है। इस प्रकार का निवेश लंबे समय तक विदेशी अर्थव्यवस्था से जुड़कर चलता है।
क्योंकि एफडीआई में बड़े पैमाने पर धन लगता है, इसलिए इसे प्रायः बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बड़ी संस्थाएं या वेंचर कैपिटल फर्में करती हैं। एफडीआई को अधिक लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह केवल मुनाफे के उद्देश्य से नहीं, बल्कि उस देश के विकास में वास्तविक योगदान देने के लिए किया जाता है। इससे पूंजी, संसाधन, तकनीक, अनुभव और रणनीतियां जैसे लाभ देश को मिलते हैं। एफडीआई संयुक्त उद्यम, विलय और अधिग्रहण, या सहायक कंपनी स्थापित कर के किया जा सकता है।
जानिए फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट के बारे में
एफपीआई के अंतर्गत किसी विदेशी देश की वित्तीय संपत्तियों में निवेश किया जाता है, जैसे उस देश के शेयरों या बॉन्ड में पैसा लगाना। इन संपत्तियों को आसानी से खरीदा या बेचा जा सकता है।
एफपीआई का मुख्य उद्देश्य तेजी से लाभ कमाना होता है, इसलिए इसे अक्सर अल्पकालिक निवेश माना जाता है। इस कारण कई बार इसे एफडीआई जितना स्थाई और भरोसेमंद नहीं माना जाता, क्योंकि निवेशक जल्दी मुनाफा कमाकर अपना पैसा वापस निकाल सकते हैं।
भारत में एफपीआई के अंतर्गत विदेशी संस्थागत निवेशक, योग्य विदेशी निवेशक आदि आते हैं, जबकि एनआरआई इसमें शामिल नहीं होते। कोई भी विदेशी व्यक्ति या संस्था आसानी से एफपीआई कर सकता है। एफडीआई और एफपीआई दोनों ही तरीकों से विदेशी पूंजी देश में आती है।
इससे देश में धन का प्रवाह बढ़ता है और भुगतान संतुलन की स्थिति बेहतर होती है। लेकिन जब इसी निवेश से लाभ, रॉयल्टी या आय विदेश वापस जाती है तो भुगतान संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है। इस तरह दोनों प्रकार के विदेशी निवेश देश के विकास में भूमिका निभाते हैं, पर इनके उद्देश्यों और प्रभावों में अंतर होता है।