
तेज होती हीटवेव, अचानक आने वाली बाढ़ और बारिश अब सिर्फ मौसम की खबर नहीं रहीं, बल्कि सीधे लोगों की कमाई पर असर डाल रही हैं। दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, किसान, मछुआरे से छोटे कारोबारी के लिए मौसम का एक झटका कई दिनों या हफ्तों की आमदनी छीन लेता है। काम बंद, फसल बर्बाद या दुकान ठप होने के बाद जब तक राहत आती है, तब तक जेब खाली हो चुकी होती है। ऐसे में Budget 2026 पेश होने से पहले चर्चा तेज है कि क्या सरकार अब ऐसे लोगों के लिए ऑटोमैटिक क्लाइमेट इंश्योरेंस जैसा कोई समाधान ला सकती है। इसमें आपदा के बाद इंतजार नहीं, बल्कि खतरे के साथ ही मदद मिल जाए।
क्लाइमेट इंश्योरेंस का आइडिया यह है कि नुकसान साबित करने की झंझट खत्म हो। अगर किसी इलाके में तापमान तय सीमा से ऊपर चला जाए, बहुत ज्यादा बारिश हो जाए या बाढ़-तूफान जैसी स्थिति बन जाए, तो बीमा अपने आप एक्टिवेट हो जाए। इसे पैरामीट्रिक इंश्योरेंस कहा जाता है। यानी मौसम के डेटा के आधार पर पैसा सीधे खाते में पहुंच सकता है। रोज कमाने वालों के लिए यह बेहद अहम हो सकता है, क्योंकि इनके पास न तो बचत होती है और न ही लंबे क्लेम प्रोसेस का इंतजार करने का वक्त। कुछ दिनों की मदद भी इन्हें फिर से काम पर लौटने की ताकत दे सकती है।
भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी अनौपचारिक सेक्टर में काम करती है, क्लाइमेट रिस्क सबसे बड़ा आर्थिक खतरा बनता जा रहा है। अभी सरकार आपदा के बाद राहत पैकेज देती है, लेकिन वह सीमित होती है और अक्सर देर से पहुंचती है। अगर Budget 2026 में क्लाइमेट इंश्योरेंस को सोशल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क का हिस्सा बनाया जाता है तो यह सिस्टम ज्यादा असरदार हो सकता है। खासकर हीटवेव, बाढ़ और सूखे से प्रभावित राज्यों में यह मॉडल गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
दूसरी ओर सवाल यह भी है कि इसका खर्च कौन उठाएगा? सरकार, बीमा कंपनियां या दोनों मिलकर? प्रीमियम कितना होगा और कवरेज किन लोगों तक पहुंचेगा? इन चुनौतियों के बावजूद एक्सपर्ट्स मानते हैं कि क्लाइमेट चेंज के दौर में सिर्फ राहत पर निर्भर रहना अब काफी नहीं है। जरूरत है ऐसी व्यवस्था की, जो आपदा आने से पहले ही आर्थिक सुरक्षा दे। यानी Budget 2026 अगर इस दिशा में कदम बढ़ाता है, तो यह रोज कमाने वालों के लिए सिर्फ एक स्कीम नहीं, बल्कि अनिश्चित मौसम में एक भरोसेमंद सहारा बन सकता है।
बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में Plutas.in के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर अंकुर इंद्रकुश का मानना है कि अब सरकार को प्री-फंडेड क्लाइमेट इंश्योरेंस को औपचारिक पॉलिसी का हिस्सा बनाना चाहिए। उनका कहना है कि 2024 में केरल के वायनाड में आई भीषण लैंडस्लाइड ने मौजूदा राहत व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया। जहां कुल नुकसान करीब 2,200 करोड़ रुपये आंका गया। वहीं, केंद्र सरकार की राहत सिर्फ 260 करोड़ रुपये तक सीमित रही। यही वजह है कि आपदा के बाद की बजाय पहले से तैयार रहने वाली व्यवस्था जरूरी है। विश्व बैंक की रिसर्च का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि पैरामीट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस अपनाने से क्लेम सेटलमेंट का समय 90 पर्सेंट तक घटाया जा सकता है।
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