India GDP: विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर का अनुमान बढ़ा दिया है। पहले 6.3% रहने का अनुमान था। इसे अब बढ़ाकर 6.6 फीसदी कर दिया है। यह वृद्धि भारत की आर्थिक मजबूती और विकास की संभावनाओं को दर्शाती है। इससे देश के भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत मिलते हैं। इसके साथ ही विश्व बैंक ने चेतावनी भी दी है। बैंक ने कहा है कि मज़बूत मांग, सामान्य होते खाने-पीने की चीज़ों के दाम और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण महंगाई बढ़ सकती है।
अप्रैल 2026 के अपने 'साउथ एशिया इकोनॉमिक अपडेट' में जारी इस ताजा अनुमान में, भारत की मौजूदा वित्त वर्ष की ग्रोथ का अनुमान अक्टूबर में लगाए गए पिछले अनुमान (6.3%) से बढ़ाया गया है। हालांकि, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से पैदा हुई चुनौतियों के कारण, आर्थिक ग्रोथ वित्त वर्ष 26 में अनुमानित 7.6% से धीमी रहेगी। विश्व बैंक का अनुमान है कि भारत दक्षिण एशिया में विकास का मुख्य इंजन बना रहेगा।
विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया की ग्रोथ रेट घटाई
बैंक ने कहा कि दक्षिण एशिया की कुल ग्रोथ 2025 के 7.0% से घटकर 2026 में 6.3% होने की संभावना है। इसका मुख्य कारण मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में आई रुकावटें हैं। हालांकि, 8 अप्रैल को ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच युद्ध विराम हो गया है। विश्व बैंक ने कहा कि 2027 में ग्रोथ के फिर से बढ़कर 6.9% होने की उम्मीद है। इससे दक्षिण एशिया उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र बना रहेगा।
RBI ने घटाया ग्रोथ अनुमान
FY27 में विकास दर घटकर 6.6% रहने का अनुमान है, जो मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष से पैदा हुई रुकावटों को दर्शाता है। विश्व बैंक ने कहा, "इन रुकावटों का असर कितना होगा, यह कहना बहुत मुश्किल है। दूसरे अनुमान लगाने वालों ने भी अपने विकास के अनुमानों को घटाकर 5.9% से 6.7% के बीच कर दिया है।
इससे पहले दिन में, भारतीय रिजर्व बैंक ने पश्चिम एशिया संकट से पैदा हुई ऊंची कमोडिटी कीमतों और सप्लाई चेन में रुकावटों की चिंताओं के चलते, वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत के GDP विकास अनुमान को घटाकर 6.9% कर दिया।
विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में आगे कहा कि गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (GST) की दरों में कमी से वित्त वर्ष 27 की पहली छमाही में उपभोक्ता मांग को बढ़ावा जारी रहेगा। लेकिन उसने चेतावनी दी कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव पड़ने और परिवारों की खर्च योग्य आय (disposable income) सीमित होने की आशंका है।