WPI Inflation July 2026: थोक महंगाई 9.78% पर आई, खाने-पीने की चीजें महंगी, ईंधन और बिजली में राहत

WPI Inflation July 2026: भारत की थोक महंगाई जुलाई में मामूली रूप से घटकर 9.78% पर आ गई। जून में यह 9.87% थी। नई 2022-23 बेस ईयर वाली WPI सीरीज में यह पहली बार है जब थोक महंगाई महीने-दर-महीने घटी है। राहत की बड़ी वजह फ्यूल और पावर तथा खाद्य वस्तुओं की महंगाई में कमी रही।

Jitendra Singh
पब्लिश्ड14 Aug 2026, 01:26 PM IST
WPI Inflation July 2026: जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की महंगाई 8.29% हो गई।
WPI Inflation July 2026: जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की महंगाई 8.29% हो गई।

WPI Inflation July 2026: भारत की अर्थव्यवस्था के लिए जुलाई के थोक महंगाई आंकड़ों में राहत और चिंता दोनों संकेत मिले हैं। जुलाई 2026 में होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) आधारित महंगाई 9.78% रही, जबकि जून में यह 9.87% थी। यानी थोक स्तर पर कीमतों की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है, लेकिन महंगाई अभी भी काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है।

सबसे अहम बात यह है कि सरकार की नई 2022-23 बेस ईयर वाली WPI सीरीज शुरू होने के बाद पहली बार महीने-दर-महीने थोक महंगाई में गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कीमतों का दबाव बढ़ना बिजनेस के लिए चिंता का संकेत है।

9.78% पर पहुंची थोक महंगाई

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में WPI महंगाई 9.78% रही। जून में यह 9.87% थी। यानी एक महीने में करीब 0.09 प्रतिशत अंक की मामूली कमी आई है। हालांकि इसे बड़ी राहत इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि थोक महंगाई अभी भी ऊंचे स्तर पर है। नई WPI सीरीज में जून का 9.87% स्तर अब तक का सबसे ऊंचा स्तर था। जुलाई में इसमें मामूली कमी आई है।

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फ्यूल और पावर में सबसे बड़ी राहत

जुलाई के आंकड़ों में सबसे बड़ी राहत फ्यूल और पावर ग्रुप से मिली है। इस कैटेगरी की महंगाई जुलाई में घटकर 20.05% रह गई, जबकि जून में यह 27.41% थी। यानी एक महीने में इसमें करीब 7.36 प्रतिशत अंक की बड़ी कमी आई है। बिजनेस के लिहाज से यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऊर्जा की कीमतों का असर ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और कई दूसरे सेक्टर की लागत पर पड़ता है।

खाद्य महंगाई में भी मामूली गिरावट

खाद्य वस्तुओं की थोक महंगाई भी जुलाई में थोड़ी कम हुई। जुलाई में फूड आर्टिकल्स की महंगाई 5.44% रही, जबकि जून में यह 5.49% थी। यानी इसमें मामूली सुधार हुआ है। हालांकि खाद्य कीमतों का असर सिर्फ थोक बाजार तक सीमित नहीं रहता। इसका असर आगे चलकर खुदरा बाजार और आम लोगों के खर्च पर भी दिखाई दे सकता है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों और मानसून की स्थिति पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

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मैन्युफैक्चरिंग ने बढ़ाई चिंता

थोक महंगाई के आंकड़ों का सबसे अहम बिजनेस एंगल मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ा है। जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की महंगाई बढ़कर 8.29% हो गई, जबकि जून में यह 7.48% थी। यानी करीब 0.81 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। यह कंपनियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बढ़ने पर कंपनियों के सामने दो विकल्प होते हैं—या तो लागत का बोझ खुद उठाएं या फिर उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालें। अगर कंपनियां कीमतें बढ़ाती हैं तो इसका असर डिमांड पर पड़ सकता है। वहीं अगर कीमतें नहीं बढ़ातीं तो प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है।

कौन-कौन से सेक्टर WPI बढ़ा रहे हैं?

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के मुताबिक जुलाई में WPI महंगाई के प्रमुख ड्राइवरों में मिनरल ऑयल यानी पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, फूड आर्टिकल्स, बेसिक मेटल्स, नॉन-फूड आर्टिकल्स, फूड प्रोडक्ट्स और केमिकल्स एवं केमिकल प्रोडक्ट्स शामिल रहे। इसका मतलब है कि कीमतों का दबाव अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में फैला हुआ है। खासकर मेटल, केमिकल और फूड प्रोसेसिंग से जुड़ी कंपनियों के लिए इनपुट कॉस्ट एक महत्वपूर्ण फैक्टर बनी हुई है।

होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का आम आदमी पर असर

थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो प्रोड्यूसर इसका बोझ कंज्यूमर्स पर डाल देते हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए WPI को कंट्रोल कर सकती है।

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जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। WPI में ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है।

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