
नीतीश कुमार ने जब साल 2015 में आरजेडी का साथ छोड़कर फिर एनडीए में शामिल होकर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तब विपक्ष के नेता लालू यादव ने कहा था कि नीतीश कुमार के मुंह में नहीं पेट में दांत है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और विपक्षी नेता होने के नाते उनका ये तंज था। लेकिन इस तंज में भी नीतीश की सही समय पर सही चाल की तारीफ छिपी है। बिहार में लगातार बदलते हालात के बावजूद नीतीश कुमार ने सूबे की सत्ता पर अपना कब्जा बरकरार रखा अब एक बार फिर उनके मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना बताई जा रही है। अगर नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं तो वो इसके साथ ही कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लगें। साल 2005 से 2025 तक के पांच विधानसभा चुनाव में नीतीश ने पांच ट्रंप कार्ड शो कर हर बार बाजी अपने नाम कर ली। आइए जानते हैं नीतीश कुमार के उन पांच घोषणाओं के बारे में जिसने नीतीश कुमार को अजेय बनाया और लगातार वे पांचवें टर्म के लिए बैक टू बैक पांच ट्रंप कार्ड चले जिसने उन्हें लैंडस्लाईड विक्ट्री दिलाई।
साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को लैंडस्लाइड विक्ट्री मिली है, उसके पीछे अमित शाह और जेपी नड्डा की कुशल रणनीति के साथ नीतीश कुमार की सही समय पर सही चाल ने भी बेहद अहम भूमिका निभाई है। बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से ठीक पहले महिलाओं को रोजगार के लिए 10 हजार रुपये की आर्थिक मदद की घोषणा की और चुनाव की घोषणा होने से पहले 25 लाख महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपये डाल दिए गए। चुनाव के तारीखों की घोषणा हुई और चुनाव प्रचार शुरू हुआ तब नीतीश कुमार ने विपक्ष पर बढ़त बनाने के लिए घोषणा कर दिया कि महिलाओं को ये 10 हजार रुपये लौटाने नहीं होगें।
चुनाव प्राचर में जब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के नेतृत्व में जब महागठबंधन के नेताओं ने जीविका दीदियों को 30 हजार रुपये महीने वेतन और हर घर नौकरी देने की घोषणा कर बढ़त बनाने की कोशिश की तब नीतीश कुमार ने विपक्ष की धार को कुंद करने के लिए ये भी घोषणा कर दी कि जिन महिलाओं को 10-10 हजार रुपये देने की घोषणा की गई है उन महिलाओं का रोजगार चल निकला तो उन्हें अपना रोजगार आगे बढ़ाने के लिए दो-दो लाख रुपये और दिए जाएंगे। इस तरह से चुनाव के बाद की घोषणा कर नीतीश ने करीब ढाई करोड़ मतदाताओं को सीधे तौर पर प्रभावित किया।
नीतीश कुमार ने स्व-रोजगार कार्यक्रम के तहत ना सिर्फ महिलाओं को लखपति दीदी बनाने की घोषणा की, बल्कि उन्हें ट्रेनिंग, आर्थिक मदद, लोन और यहां तक कि बाजार मुहैया कराने का भी वादा किया। नीतीश कुमार के इस दांव ने महिलाओं को सीधे प्रभावित किया। पहले से बिहार में महिलाओं के लिए जारी योजनाओं ने नीतीश की घोषणाओं पर भरोसा करने का बल दिया। दूसरी तरफ तेजस्वी प्रण के 30 हजार और हर घर नौकरी पर किसी को यकीन नहीं हुआ।
तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के घोषणापत्र को तेजस्वी प्रण नाम दिया था वो पूरे चुनाव प्रचार के दौरान ये भरोसा दिलाते रहे कि वो किसी भी कीमत पर अपना वादा पूरा करेंगे। लेकिन बिहार में पहले से जीविका मिशन के तहत मिल रहे लाभ ने महिलाओं को ज्यादा विश्वास जगया। वहीं नीतीश कुमार की बालिका छात्रा योजना, स्थानीय चुनावों में महिलओं को 50 प्रतिशत आरक्षण उसके बाद पुलिस भर्ती में 35 प्रतिश महिलाओं के लिए आरक्षण ने राम बाण असर डाला।
दलित, पिछड़ा और ओबीसी वर्ग की महिलाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग नीतीश कुमार को शराबबंदी को लेकर अपना भगवान मानता है। निम्म और निम्म मध्यम वर्ग के घरों में शराब पीकर लड़ाई झगड़े और कलह से आजादी शराबबंदी के बाद मिली। नीतीश कुमार के इस फैसले ने महिलाओं के मानस पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। इसी बीच जिस तरह से बिहार में जनसुराज संस्थापक प्रशांत किशोर के शराबबंदी पर से पाबंदी हटाने और तेजस्वी यादव के ताड़ी पर से बैन हटाने की घोषणाए की गईं वो भी नीतीश कुमार के पक्ष में गया।
इस तरह से नीतीश कुमार ने महिला वोटर्स पर एक अमिट छाप छोड़ी है। साल 2005 के बाद से लगातार महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर लिए जा रहे उनके फैसलों ने महिला मतदाताओं के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई। नीतीश कुमार की इस महीन राजनीतिक चाल को समझने में और उसके असर का आंकलन करने में विपक्षी दल के नेता पूरी तरह चूक गए और नतीजा सबके सामने है।
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